Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

दिल्ली

पत्रकार नीलांजना भौमिक केस में हाईकोर्ट का यह आदेश तथ्यात्मक रिपोर्टिंग करने वालों के लिए बड़ी जीत है!

दिल्ली हाईकोर्ट ने टाइम्स मैगज़ीन की पूर्व ब्यूरो चीफ और वरिष्ठ पत्रकार नीलांजना भौमिक के खिलाफ 2014 में दायर मानहानि केस को रद्द करते हुए कहा है कि तथ्यों पर आधारित रिपोर्टिंग को आपराधिक मानहानि नहीं कहा जा सकता।

जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने फैसले में स्पष्ट किया कि किसी पत्रकार द्वारा तथ्यों को किस तरह प्रस्तुत किया जाता है, यह उसकी लेखन शैली है—और यदि रिपोर्ट सही तथ्यों पर आधारित है, तो शिकायतकर्ता की मानहानि का दावा नहीं बनता।

मामला क्या था?

शिकायतकर्ता रवि नायर, जो South Asia Human Rights Documentation Centre (SAHRDC) चलाते हैं, ने नवंबर 2014 में भौमिक और कुछ अन्य के खिलाफ शिकायत दायर की थी। आपत्ति टाइम्स मैगज़ीन में 14 दिसंबर 2010 को प्रकाशित आर्टिकल—“भारत के नॉन-प्रॉफिट्स की जवाबदेही जांच के दायरे में”—को लेकर थी। इस आर्टिकल में भारत के NGO सेक्टर में कथित अनियमितताओं और फंडिंग से जुड़ी चिंताओं का उल्लेख था। नायर का आरोप था कि लेख में उनके और उनके संगठन के बारे में ऐसे संकेत दिए गए, जैसे वे मनी लॉन्ड्रिंग में शामिल हों—जो उनके मुताबिक मानहानिकारक था।

शिकायत यह भी कहती थी कि यह आर्टिकल बाद में किसी ब्लॉग/वेबसाइट (ngopost.org) पर पुन: प्रकाशित हुआ, जिससे उनकी “प्रतिष्ठा को क्षति” पहुँची।

पत्रकार का पक्ष

भौमिक ने कहा कि लेख तथ्यों और उपलब्ध सरकारी रिकॉर्ड पर आधारित था। इसमें कहीं भी यह नहीं कहा गया कि शिकायतकर्ता या उनका संगठन दोषी पाए गए थे। उन्होंने दलील दी कि यह रिपोर्टिंग उनकी पत्रकारिता के दायरे में की गई थी और किसी भी तरह की दुर्भावना नहीं थी। साथ ही, शिकायत चार साल बाद दाखिल की गई, जो Limitations Act के तहत समयसीमा से बाहर है।

हाईकोर्ट ने क्या कहा?

कोर्ट ने सभी आरोपों को खारिज करते हुए कहा—

सिर्फ इसलिए कि किसी तथ्यात्मक रिपोर्ट में शिकायतकर्ता का नाम आया या कोई टिप्पणी उन्हें पसंद नहीं आई, इससे मानहानि का अपराध सिद्ध नहीं होता। शिकायतकर्ता का यह कहना कि आर्टिकल में “संकेत” या “इशारे” थे—मानहानि का मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त नहीं है।

आर्टिकल में दिए गए तथ्य जांच या सरकारी रिपोर्टों पर आधारित थे। रिपोर्ट में कहीं भी यह नहीं कहा गया था कि शिकायतकर्ता मनी लॉन्ड्रिंग में लिप्त पाए गए। शिकायतकर्ता ने 2010 में आर्टिकल पढ़ लिया था, फिर चार साल बिना कार्रवाई के कैसे बैठे रहे—यह खुद मामले को लिमिटेशन के तहत ख़त्म कर देता है।

अंतिम आदेश

हाईकोर्ट ने कहा— “याचिकाकर्ता नीलांजना भौमिक के खिलाफ मानहानि का कोई मामला नहीं बनता। शिकायत समयसीमा के खिलाफ है। अतः आपराधिक शिकायत और समन आदेश रद्द किए जाते हैं।”

इस तरह कोर्ट ने पत्रकार को पूरी राहत देते हुए मानहानि का मामला खारिज कर दिया।

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन