मनीष सिंह-
सवाल जो नहीं पूछे गए!…. भारत दौरे पर आए ब्लादिमीर पुतिन का स्वतन्त्र भारतीय पत्रकारों के लिए उनका इंटरव्यू अरेंज किया गया। उन्होंने सवाल पूछे। पुतिन उस सोवियत संघ के राष्ट्रपति नहीं। वे दुनिया के दूसरे ध्रुव के लीडर भी नहीं। मगर दुनिया के सबसे शक्तिशाली राजनेताओं में हैं। उनकी रीढ़, जुबान और साहस कोई दायरा नहीं देखता।
खुलकर बात करने वाला निर्णायक शख्स। इसलिए सोच-समझकर बोलता है। और बात पर टिकता है। प्रशंसा का मूड नहीं। बस बता रहा हूँ – कि ऐसे शख्स के मुंह से कुछ निकलवा लेना, भारत की विदेश नीति के लिए एक राह खोल सकता है।
पुतिन एक ऐसे देश के मुखिया हैं जो अकूत तेल और खनिज सम्पदा पर बैठा है। मिलिट्री पावर है। हमें देने के लिए बहुत कुछ है। तो जो बातें सार्वजनिक रूप से नहीं निकलतीं, अपने देश के पत्रकार उन्हें निकलवाने की कोशिश करते हैं। क्या निकलवाने की कोशिश होनी चाहिए थी?
कुछ सवाल नीचे हैं।
1. क्या रूस भारत को नॉर्दर्न सी रूट का स्थायी साझेदार बनाएगा? क्या चेन्नई-व्लादिवोस्तोक समुद्री कॉरिडोर को मिलकर विकसित करने पर विचार कर रहा है?”
आर्कटिक में रूस को अकेले अरबों डॉलर लगाने हैं। भारत साझेदार बने तो स्वेज से 40% सस्ता, चीन-मुक्त नया यूरोप रूट हमारे हाथ में आ जाएगा।
2. क्या रूस भारत के साथ मिलकर BRICS में स्वर्ण- आधारित नई भुगतान प्रणाली विकसित करेगा?”
अमेरिका ने गोल्ड से डॉलर अलग करके नोट छापने की फैक्ट्री बना ली है। वहां रूस के 300 अरब डॉलर फ्रीज हैं। अगर पुतिन हाँ कहें, तो दुनिया के डी-डॉलराइजेशन में भारत मुख्य खिलाड़ी बन जाएगा।
3. यूक्रेन युद्ध के बाद की नई विश्व व्यवस्था में, क्यारूस चाहता है कि भारत एक स्वतंत्र ध्रुव बने? या वह या अमेरिका/चीन के साथ पूरी तरह खड़ा हो?
रूस को डर है कि क्वाड के जरिए भारत अमेरिकी खेमे में चला जाएगा। पुतिन की हाँ, भारत की स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी को रूसी बैकिंग दे देगी।
4. क्या रूस भारत को S-500, Su-57, हाइपरसोनिक मिसाइल और परमाणु पनडुब्बी की पूरी तकनीक मेक-इन-इंडिया के तहत ट्रांसफर करेगा?
प्रतिबंधों से रूस की अर्थव्यवस्था दबी है। उसे भारत से बड़े ऑर्डर चाहिए। हाँ हुई तो 8-10 साल में भारत पाँचवीं पीढ़ी की सेना बन जाएगा।
5. “सांस्कृतिक-ऐतिहासिक रूप से भारत-रूस संबंध चीन से कहीं गहरे हैं। क्या रूस मानता है कि लंबे समय में भारत, चीन से ज्यादा विश्वसनीय साझेदार साबित हो सकता है?
पुतिन डिप्लोमैटिक लेकिन सकारात्मक जवाब देंगे। वे जानते हैं कि चीन उनकी भी जमीन हड़प रहा है और भविष्य में वह प्रतिद्वंद्वी बनेगा।
6. UNSC के विस्तार में क्या रूस खुलकर भारत की वीटो पावर वाली स्थायी सदस्यता का समर्थन करेगा?
रूस UNSC में अकेला पड़ रहा है। उसे भारत जैसा स्थायी साथी चाहिए। पुतिन की हाँ हमारी सीट को लगभग पक्का कर देगी।
7. अगर कल NATO-रूस या अमेरिका-चीन के बीच विश्व युद्ध हुआ, तो क्या रूस भारत की तटस्थ किंतु रूस-मित्र नीति का सम्मान करेगा?”
रूस को आश्वासन चाहिए कि भारत उसका साथ नहीं छोड़ेगा। हाँ मिली तो भारत को भविष्य के बड़े युद्ध में “सुरक्षित तटस्थता” का लाइसेंस मिल जाएगा।
8. क्या रूस भारत को अगले 20-25 साल तक डिस्काउंटेड दर पर तेल, गैस, कोयला और यूरिया की गारंटी दे सकता है?”
यूरोप का बाजार रूस ने खो दिया। भारत उसका सबसे बड़ा, भरोसेमंद खरीदार है। उनकी मजबूरी में हमारी 2047 तक की ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा छिपी है।
सवाल और भी बुने जा सकते थे। पर ऐसे सवाल “ट्रेक्टर-ट्रॉली भिड़ंत” और “आप थकते क्यों नहीं” करने वाले पत्रकारों को नहीं सूझते। सोचिये, इनका करियर का सबसे बड़ा इंटरव्यू था। क्या पूछा..?
“आपके कार्यकाल में जितने भारतीय प्रधानमंत्री रहे, उनमें सबसे महान कौन लगता है?”
अपेक्षा क्या थी? पुतिन मुट्ठी भांजकर “अबकी बार 400 पार, मोदी है तो मुमकिन है” का नारा लगाएँगे?
जवाब मिला: “किसी दूसरे देश के नेताओं को इस तरह वर्गीकृत करना अशोभनीय है।” शुद्ध वेस्टेड ऑपर्च्युनिटी।
विदेश मंत्रालय ने सवाल देखे भी होंगे, एप्रूव भी किए होंगे। फिर भी ये पूछा गया। उन्हें तो सवालों की फेहरिस्त बनाकर, और मनमाफिक उत्तर न आने पर, काउंटर क्वेश्चन भी बनाकर देने चाहिए थे। लेकिन नहीं।
नोएडा की सोनपरियां और साउथ ब्लॉक के बाजेवाले, पितृपूजन से आगे सोच नहीं पाते। तो भारत के भाग्य में चेन्नई-व्लादिवोस्तोक सी-रूट नहीं, गैस-तेल-यूरिया के दीर्घकालिक सस्ते सौदे नहीं, BRICS करेंसी भी नहीं।
बस “पुतिन ने मोदी की तारीफ की” – यही हमारी विदेश नीति का लक्ष्य हो गया है। और पुतिन का मलमूत्र कौन उठाकर ले गया, यही ब्रेकिंग न्यूज रहेगी।


