
शैलेंद्र प्रताप सिंह-
इस्तांबुल टर्की यात्रा : टर्की के राष्ट्रपति एर्दोआन के ऊपर दो आरोप प्रमुख हैं जिनमें एक है कि वह वोट की ख़ातिर मुस्लिम राजनीति कर रहे हैं और दूसरा यह कि वह तानाशाह बन रहे हैं ।
टर्की की ही प्रसिद्ध लेखिका Ece Temelkuran की किताब पढ़ रहा था । किताब है , ‘How to Lose a Country: The Seven Steps from Democracy to Dictatorship’ — यह आज की दुनिया में लोकतंत्रों के पतन को समझने वाली सबसे महत्वपूर्ण पुस्तकों में से एक मानी जाती है। यह एक तरह की “राजनीतिक चेतावनी” है, जिसमें लेखिका बताती हैं कि कैसे लोकतंत्र धीरे-धीरे, लगभग अनदेखे ढंग से, अधिनायकवाद (authoritarianism) की तरफ फिसल जाता है।
लेखिका ने अपने देश तुर्की में लोकतांत्रिक संस्थाओं के टूटते हुए देखा। वे कहती हैं कि आज तुर्की में जो हुआ, वही क्रम दुनिया के तमाम देशों में दोहराया जा रहा है। लोकतंत्र एक दिन में नहीं खोता; यह सात साफ़ दिखने वाले चरणों से होकर गिरता है। किताब का उद्देश्य ऐसे संकेतों को पहचानना है।
- शालीनता (Decency) का पतन होता है ॥ पहला हमला सभ्यता पर होता है। राजनेता खुलेआम झूठ बोलने लगते हैं, समाज को शर्मिंदा करने वाली भाषा का उपयोग होने लगता है, और असभ्यता को “सच बोलना” कहा जाता है। इससे जनता की नैतिक सीमा टूटती है।
लेखिका के अनुसार टर्की के राष्ट्रपति एर्दोआन ने अपने शुरुआती दौर में विपक्ष और पत्रकारों के लिए कठोर शब्दों का उपयोग शुरू किया। धीरे-धीरे यह सब सामान्य बन गया।
2- अधिनायकवादी नेता अपनी कहानी गढ़ते हैं। राजनीतिक कथा पर कब्ज़ा (Seize the Narrative) करते है । हम बनाम वे, देशद्रोही बनाम राष्ट्रवादी, असली लोग बनाम नकली लोग की कहानी बतायी जाती । यह कथा भावनाओं को संचालित करती है।
लेखिका के अनुसार टर्की के राष्ट्रपति एर्दोआन ने “असली तुर्क” बनाम “एलिट तुर्क” की कहानी बनाई। सामान्य जनता को कहा गया कि “हमारी लड़ाई उन पर है जिन्होंने आपको सालों दबाया।” - विपक्ष का दानवीकरण (Demonise Your Opponents) किया जाता है । विपक्ष को दुश्मन बना दिया जाता है। उन पर देशविरोधी, भ्रष्ट, विदेशी एजेंट जैसे आरोप लगाए जाते हैं। इससे विपक्ष की वैधता ही ख़त्म हो जाती है।
लेखिका के अनुसार टर्की के राष्ट्रपति एर्दोआन ने विपक्षी पार्टियों को “अमेरिकी एजेंट”, “FETO समर्थक”, या “आतंकवादी” कहा गया। - संस्थाओं में सेंध (Undermine Institutions) लगायी जाती है । न्यायपालिका, मीडिया, विश्वविद्यालय, चुनाव आयोग — इन सबको धीरे-धीरे कमजोर किया जाता है। उन पर विश्वास कम किया जाता है, और अपनी निष्ठावान नियुक्तियाँ की जाती हैं। संस्थाएँ औपचारिक रूप से मौजूद रहती हैं—लेकिन अंदर से खोखली हो जाती हैं।
लेखिका के अनुसार टर्की में न्यायपालिका, मीडिया, विश्वविद्यालय — सभी पर सरकारी दबाव बढ़ता जा रहा है । हजारों पत्रकार निकाले गए या गिरफ्तार हुए। - चुनावों पर पकड़ (Take Control of Elections) बनायी जाती है । चुनाव होते तो हैं, परन्तु निष्पक्ष नहीं रहते। ग़ैर-बराबरी की मीडिया कवरेज, विरोधियों पर मुकदमे, मतदाता दमन, और चुनावी तंत्र में बदलाव — इन सबके द्वारा सत्ता की वापसी लगभग तय कर दी जाती है।
लेखिका के अनुसार टर्की मीडिया का 80% हिस्सा सत्ता-समर्थक हो गया, जिससे मुकाबला असमान हुआ। - डर पैदा करते है । (Create a Climate of Fear) । लोग खुलकर विरोध करने से डरने लगते हैं। सोशल मीडिया निगरानी, ट्रोल आर्मी, सरकार की आलोचना पर मुकदमे — सब मिलकर नागरिक स्वतंत्रता को सिकोड़ देते हैं। डर अदृश्य हो सकता है, पर असर गहरा होता है।
लेखिका के अनुसार टर्की में सरकार की आलोचना करने वाले हजारों लोग जेल गए। ट्वीट करना जोखिम भरा बन गया। राष्ट्रपति एर्दोआन अपने प्रमुख प्रतिद्वंद्वी मेयर इस्तांबुल को एक वर्ष से अधिक से जेल में डाले हुये है । - लोकतंत्र का नया नामकरण (Redefine Democracy) करते है । नेता लोकतंत्र को ही पुनर्परिभाषित कर देता है – “मैं ही जनता हूँ”, “मैं ही राष्ट्र हूँ”, “मेरी जीत ही लोकतंत्र है।” यहाँ तक पहुँचते पहुँचते लोकतंत्र का खोल बचता है, पर आत्मा खत्म हो जाती है।
लेखिका के अनुसार टर्की के राष्ट्रपति एर्दोआन के विरोध को “तुर्की का विरोध” कहा गया। - किताब कहती है कि लोकतंत्र तानाशाही से एक झटके में नहीं गिरता , बल्कि समाज धीरे-धीरे आदत डाल लेता है— झूठ सहने की, असभ्यता स्वीकार करने की, संस्थाओं के बिखरने को सामान्य मान लेने की। लेखिका बार-बार चेतावनी देती हैं कि “यह सब हमारे सामने ही हो रहा है—बस हम इसे सामान्य मान लेते हैं।”
समाज जब हर छोटे बदलाव को “चलो, इतना तो चलता है” कहकर टालता रहता है तो मतलब वह स्वयं भी तानाशाही की मदद करता है ।
ये सारे लक्षण जम्बूद्वीपे भरतखण्डे में स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर हो रहें है! मोशा के नेतृत्व यही सब चरणबद्ध तरीकों से आगे बढ़ रहा है। -रमेश कुमार
बहुत अच्छा आलेख । और यह सब कुछ हमारे देश में घटित होता दिख रहा है । चेतावनी के साथ-साथ यह लेख चेता भी रहा है । -शशिभूषण यादव
यह तो भारत की ही दास्तान है। ऐसा प्रतीत होता है कि मोदी तुर्की से मार्ग दर्शन प्राप्त कर रहे है। -मनमोहन शर्मा
आपने जिस किताब का जिक्र किया है, मैं भी उसे पढ़ चुका है. उसे पढ़ते हुए मेरी आंखों के सामने बार-बार अपने देश के घटनाक्रम किसी वृत्तचित्र की तरह उभरते रहे! आप बहुत अच्छा यात्रा-वृत्तांत लिख रहे हैं.काफी दिन से अलग-अलग देशों की यात्राओं के आपके वृत्तांत पढता आ रहा हूं. हमारे यहां, खासतौर पर हिंदी में यात्रा-वृत्तांत को सफर का ब्योरा भर मान लिया जाता रहा है. पर यात्रा-वृत्तांत का दायरा बहुत बड़ा है और बड़ा होना चाहिए. तभी उसकी प्रासंगिकता और उपयोगिता है. इस्तांबुल से आपने जो लिखा है और ECE TEMELKURAN की जिस किताब का जिक्र किया है; वह सिर्फ टर्की के लिए नहीं पूरी दुनिया के लिए बहुत मौजू और महत्वपूर्ण है. हम भारतीयों को तो यह किताब जरूर पढ़नी चाहिए. 2023 में मुझे यह पढने को मिली. निस्संदेह, एक बेहतरीन किताब! बहुत-बहुत शुभकामना! खूब घूमिये और खूब लिखिये!
-उर्मिलेश



राजवीर रतन
December 29, 2025 at 5:10 pm
आंखें खोल के 1947 के बाद अपने ही देश को देखा होता तो तुर्की लेखिका का उदाहरण देने की जरूरत ही नहीं पड़ती। लोकतंत्र में हमेशा से छेद ही छेद रहे हैं। देश में हमेशा ही सरकारें अल्पमत की रही हैं। जो सत्ता में रहा, उसने लोकतंत्र के छेदों को अपने ढ़ंग से इस्तेमाल किया।
बस फर्क इतना है कि आज सोशल मीडिया है तो अब हर किस्म कि संवाद आम लोगों के बीच होने लगा है। पहले तो लोग जान ही नहीं पाते थे कि सत्ता क्या कर रही है!
हां, आज सच के अलावा झूठ को भी सच बना कर पेश करने वाले खूब पैदा हो गये हैं। गुट के लोग उसपर मुहर भी बेधड़क लगाते झूठ कै मजबूत कर रहे हैं। और एआई के दौर में आम समझ के आदमी के लिये वास्तविकता और झूठ में अंतर करना कठिन हो या जा रहा है।