
गुणानंद जखमोला-
राष्ट्रीय सहारा देहरादून कल रात से छपना बंद हो गया। मैनेजमेंट ने कर्मचारियों को फोन कर कहा कि काम पर मत आओ। पत्रकार और कर्मचारी आफिस पहुंचे। रिपोर्टरों ने खबर लिखी और सब एडिटर्स ने पेज बनवाए, लेकिन अखबार नहीं छपा। मैनेजमेंट ने प्रेस कर्मचारियों को धमका दिया। सभी पत्रकारों से इस्तीफा मांगा गया है बदले में चार महीने का वेतन देने की बात कही है। लाखों पहले से ही बैकलॉग है और यह रकम भी सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर ही मिलेगी।
सहारा डूब गया। यह तो होना ही था, हालांकि टाइटेनिक जैसा विशाल था तो वक्त लगा। 2014 से ही इसमें दिक्कत थी। सहाराश्री के जेल जाने के बाद जहाज में छेद हो गया था। सुमित राय जैसे निकम्मे लोगों ने केवल अपना लाभ देखा। मिसमैनजमेंट और अय्याशी कम नहीं हुई। वहीं मुझ जैसे पत्रकारों को वेतन अधूरा मिलता था और मेहनत पूरी लगती थी। सेलरी समय पर न मिलने और कम मिलने से मैं बेहद दुखी था। सहारा ज्वाइन करने और देहरादून आने का डिसिजन गलत लग रहा था।
उदंड था तो 2016 में तीन दिन की हड़ताल भी करवाई। वो पत्रकार जो आज डीएलसी में सहारा के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने जा रहे हैं, उस दिन वो मेरे साथ नहीं थे। हड़ताल तोड़कर अंदर चले गये थे। मैंने तय कर लिया था कि अब सहारा तो क्या मैं किसी भी लाला की नौकरी नहीं करूंगा।
2016 में जिस दिन सहारा छूटा, बैंक में मात्र 1200 रुपये थे। बच्चे द एशियन जैसे महंगे स्कूल में पढ़ रहे थे। किराये का घर था। समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करूं। एक अजनबी शहर में था। परिवार के अलावा कोई नहीं जानता था। दोस्तों की बात याद आ रही थी कि दिल्ली का समुद्र छोड़कर देहरादून जैसे कुएं में क्यों जा रहा है?
एक मासिक मैगजीन उत्तरजन टुडे निकालने का फैसला किया। कमिश्नर एसएस पांगती और पीसी थपलियाल जी मदद के लिए आगे आए। कई महीने तक दोनों ने मैगजीन के प्रकाशन में वित्तीय सपोर्ट किया। डरा हुआ था, तो पहले दो साल मैंने मैगजीन में किसी भी लेख में अपना नाम तक नहीं दिया। दो साल बाद ही मैंने लेख में अपना नाम लिखा जब लगा चला लूंगा।
देहरादून ने मुझे अपना लिया। बलूनी ग्रुप के चेयरमैन डा. नवीन बलूनी और एमडी विपिन बलूनी ने सबसे पहले मैगजीन के लिए सपोर्ट किया। यह उनका एहसान है मुझ पर। उत्तरजन टुडे को इस फरवरी में 10 साल हो जाएंगे। मुझे उत्तराखंड के लोगों से असीम प्रेम और सहयोग मिला है। मैंने भी अपनी दादी से किया वादा निभाया है कि पहाड़ की आवाज बनना। मैं इंग्लिश जर्नलिज्म कर रहा था तो दादी ने कहा कि इसे पढ़ेगा कौन? मैंने हिन्दी को अपनाया और आज गर्व से कहता हूं कि हिन्दी ने मुझे न केवल रोजी-रोटी दी बल्कि मान-सम्मान और पहचान भी दी है।
पहले दिल्ली और फिर सहारा छोड़ने का मेरा फैसला सही था। आज मेरे पास 11 लोगों की टीम है। हम सब मिलकर आगे बढ़ रहे है बिना झुके, बिना बिके। मंजिल दूर है पर कदम आगे बढ़ रहे हैं। सहारा बंद होने पर साथियों के लिए दुख हो रहा है लेकिन मैं सहारा मैनेजमेंट का शुक्रिया भी अदा करना चाहता हूं कि उसने मुझे सही में मुझे पैरों पर खड़ा होना सिखा दिया।


