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महाकुंभ मेले में विशेष सुविधा के ऑफर पर मार्क टली बोले- ‘मैं धक्के खाकर काम करने वाला पत्रकार हूँ!’

हेमंत शर्मा-

वे आवाज़ के दिनों के निडर और बेबाक़ बादशाह थे. भरोसे और विश्वसनीयता के एवरेस्ट. वह भारत को कई भारतीयों से ज्यादा जानते थे. सर विलियम मार्क टली अब नहीं हैं. लेकिन चालीस बरस तक हमारे लिए वही बीबीसी थे. उनका जाना पत्रकारिता के एक युग का अंत है. पढ़ते वक़्त जिन घटनाओं से अपनी ख़बरों पर समझ बनी. वह मार्क टली की ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो को फॉंसी, इन्दिरा गॉधी की हत्या और सिख दंगो पर उनकी रिपोर्टिंग सुनकर बनी थी.

वह रेडियो का ज़माना था. खड़े होकर रेडियो सुनना पड़ता था क्यों कि तब थोड़ी थोड़ी देर में रेडियो की सुई खिसक जाती थी. उस समय सर मार्क हमारे लिए किंवदंती थे. कभी मिलूँगा और उनके साथ काम करूँगा. यह सोचा नहीं था. प्रधानमंत्री राजीव गॉधी के खिलाफ वीपी सिंह के अभियान और अयोध्या आन्दोलन की रिपोर्टिंग में उनके साथ काम करने और लम्बी बतकही का मौक़ा मिला. मेल जोल बढा. फिर निज़ामुद्दीन में सतीश जी ( सतीश जैकब ) के साथ कई दफ़ा उनके यहॉं जाना हुआ. सतीश जी वर्षों तक उनके सहयोगी रहे. बाद में मेरे साथ कुछ समय इंडिया टीवी में रहे.

कोलकाता के टालीगंज में जन्म के बाद अंतिम सॉंस तक वे भारत में रहे. भारत उनका पसंदीदा देश था. रेल से यात्रा कर देश को जानना और स्थानीय व्यंजन उन्हें भाते थे. बीबीसी ब्यूरो चीफ का पद लगभग तीन दशकों तक शानदार ढंग से संभाला, जब तक 1994 में उन्होंने इस्तीफा नहीं दिया. इस दौरान टली संतुलित, गहन अंतर्दृष्टि और गहरी संवेदनशीलता वाली रिपोर्टिंग के पर्याय बन गए थे. उनकी संयमित आवाज़ और तथ्यपरक रिपोर्टिंग ने भारत के आधुनिक इतिहास के महत्वपूर्ण घटनाओं को विश्वसनीयता दी. 1975–1977 का आपातकाल, 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या और उसके बाद सिख विरोधी दंगे, ऑपरेशन ब्लू स्टार, 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस और उसके परिणाम, आर्थिक उदारीकरण, तथा असंख्य चुनाव और सामाजिक उथल-पुथल के दौर में वे एक भरोसेमंद आवाज़ थे.

आपातकाल के दौरान भारत से निष्कासित होने बावजूद, टली ने निष्पक्ष पत्रकारिता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता कभी नहीं छोड़ी. 2002 में उन्हें नाइटहुड से सम्मानित किया गया और 2005 में भारत सरकार ने उन्हें पद्म श्री और फिर पद्मभूषण दिया. बीबीसी छोड़ने के बाद टुली ने कई किताबें लिखी. उनकी किताबों No Full Stops in India (1988), The Heart of India (1995), India in Slow Motion (2002, जिलियन राइट के साथ सह-लेखन),में भारत की यथार्थवादी तस्वीर है.

बहुत याद आएंगे आप. उनकी स्मृतियों को प्रणाम.


उर्मिलेश-

सलाम मार्क टली!

मशहूर पत्रकार मार्क टली का दिल्ली में निधन हो गया। लंबे समय तक वह भारत में BBC के ब्यूरो चीफ रहे। बीबीसी की औपचारिक सेवा से अवकाश-प्राप्ति के बाद भी वह पत्रकार और लेखक के रूप में काफी समय तक सक्रिय रहे। वह तकरीबन 90 वर्ष के थे और कुछ महीनों से अस्वस्थ चल रहे थे। उनका निधन भारतीय पत्रकारिता की बड़ी क्षति है।

जिन दिनों हम जैसे लोग पत्रकारिता में आये, मार्क टली देश के एक बेहद प्रतिष्ठित और सक्रिय पत्रकार के रूप में स्थापित हो चुके थे। देश के शीर्ष पदों पर बैठे सत्तारूढ नेता हों या विपक्ष के बडे नेता हों, मार्क टली के लिए इनके पास पहुंचना और खबरें हासिल करना बहुत आसान था। उन्होंने अपने जीवन में खूब घूमा, खूब लिखा और खूब बोला! कहने को तो वह अंग्रेज थे क्योंकि अंग्रेज मा-पिता की संतान थे पर सच पूछिये तो वह पक्के भारतीय थे। कलकत्ता में जन्मे अंग्रेज हिंदोस्तानी!

मार्क ने रिपोर्टिंग और विश्लेषण के अलावा कई किताबें लिखीं। मैंने सबसे पहले उनकी ‘अमृतसर: मिसेज गांधी लास्ट बैटिल’ पढ़ी थी, जो उन्होंने अपने दोस्त-सहयोगी सतीश जैकब के साथ लिखी। द हार्ट ऑफ इंडिया, इंडिया स्लो मोशन, नो फुल स्टॉप इन इंडिया और नॉन स्टॉप इंडिया सहित कई किताबें हैं उनकी!

सच पूछिये तो भारत सहित समूचे दक्षिण एशिया में मार्क अपनी रिपोर्टिंग और विश्लेषणात्मक खबरों के लिए अस्सी के दशक में ही ‘लिजेंन्ड’ बन चुके थे। भारत के हर प्रमुख नेता और अनेक गणमान्य लोगों से उनके अच्छे प्रोफेशनल सम्बन्ध रहे। एक बार मैं चुनाव रिपोर्टिंग के लिए आंध्र प्रदेश में था और अविभाजित आंध्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू से मिलने का समय लेकर उनके घर पहुंचा. पता चला, अभी नायडू साहब मार्क टली से गुफ़्तगू कर रहे हैं। अगर भूल नहीं रहा तो मार्क उन दिनों बीबीसी से रिटायर हो चुके थे और संभवत: वह कोलकाता से छपने वाले ‘द टेलीग्राफ’ के लिए चुनाव पर लगातार लिख रहे थे। उनके बाहर निकलने के बाद मैं अंदर बुलाया गया। वह विदेशी मूल के ऐसे भारतीय पत्रकार थे जिसे लोगों की सिर्फ प्रतिष्ठा और प्रशंसा मिलती थी। आमतौर पर कोई निजी कारक या किसी तरह की ‘नकारात्मकता’ उनका पीछा नहीं करती थी।

निस्संदेह, भारत में BBC को मार्क और उनकी टीम के कारण गांव से राजधानी तक अभूतपूर्व प्रतिष्ठा मिली। नवभारत टाइम्स के एक युवा रिपोर्टर के तौर पर एक बार मैं बिहार के गया जिले में किसी खास मामले की रिपोर्टिंग करने गया था। वहां अपने एक संपर्क सूत्र के यहां पहुंचा तो देखा उनके दरवाजे पर सात-आठ लोग खामोशी से बीबीसी की बुलेटिन सुन रहे हैं। अपने संपर्क सूत्र से बातचीत करने के लिए हमें बीबीसी की बुलेटिन खत्म होने का इंतजार करना पड़ा, जबकि उन दिनों बिहार में नवभारत टाइम्स के नये संस्करण की भी काफी प्रतिष्ठा थी। लेकिन बीबीसी के समाचारों की विश्वसनीयता सबसे ऊपर थी। तब माना जाता था कि किसी मुद्दे या घटना पर बीबीसी ने कोई समाचार दे दिया तो वह ‘अटल सत्य’ है! भारत में बीबीसी की रिपोर्टिंग को यह प्रतिष्ठा मार्क और उनकी टीम ने दिलाई!

ब्रेकिंग न्यूज के मामले में भी मार्क और उनकी टीम का शानदार रिकॉर्ड रहा। दुनिया को इंदिरा गांधी की नृशंस हत्या की पहली खबर बीबीसी से ही मिली थी। यह मार्क टली ही थे, जिन्होंने 31 अक्टूबर 1984 को श्रीमती गांधी की नृशंस हत्या की खबर सबसे पहले प्रसारित की।

हालांकि सत्ता-प्रतिष्ठान के अंदर की कई बड़ी और जरूरी खबरों के मामले में उन दिनों भारत के अंग्रेजी और कुछ भाषायी अखबारों का रिकॉर्ड भी अपेक्षाकृत बेहतर था और वैसी कई खबरों को ब्रेक करने के मामले में बीबीसी पीछे रह जाता था। लेकिन उन खबरों के अपने फॉलोअप से वह फिर श्रोताओं के बीच लोकप्रियता बरकरार रखता था। मार्क एक अच्छे प्रोफेशनल थे, पर उन्हें ‘पत्रकारिता का भगवान’ बनाना भी गलत होगा क्योंकि किसी भी पेशे का कोई ‘भगवान’ नहीं होता। उनकी रिपोर्टिंग और निजी बातचीत में भी मैंने महसूस किया कि हमारे बीच के अनेक अच्छे पत्रकारों की तरह उनकी पत्रकारिता में भी कई दफा निजी पसंद या नापसंद झलकती थी। उनके दौर में या उनके बाद भारत में बीबीसी जैसे संस्थानों ने जाहिर वजहों से सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर देश के बहुसंख्यक आम लोगों या उनकी पैरोकारी करती राजनीति (सोशल डेमोक्रेट्स, सामाजिक न्यायवादी या वामपंथियों) के प्रति उतनी सदाशयता कभी नहीं दिखाई जितनी प्रभावशाली अमीरों-कुलीनों की राजनीति के साथ दिखाई!

प्रोफेशनल कामकाज के दौरान हम मार्क से कई बार मिले। लेकिन वह प्रोफेशनल ही रही। लेकिन निजी मुलाकात काफी बाद में हुई। कुछ साल पहले की बात है। संभवत: 2015 की। कलिंगा लिटरेचर फेस्टिवल के किसी शुरुआती कार्यक्रम में मार्क और प्रभु चावला के साथ मैं भी एक पैनेलिस्ट था। वह डिस्कशन भारतीय मीडिया के किसी खास पहलू पर केंद्रित था। संयोगवश हम लोग भुवनेश्वर के एक ही होटल में रुके थे। ओडिशा में हम लोग दो या तीन दिन रहे। साथ में खाना-पीना और घूमना भी हुआ।

कार्यक्रम के बाद शाम होने से कुछ पहले मार्क मेरे कमरे में आये और अपने खास अंदाज वाली हिंदी में बोले: चलते हैं बाहर कहीं बियर पियेंगे! फाइव स्टार में मुफत की बियर छोडकर हम अपने पैसे की बियर पीने एक ढाबेनुमा गोल आकार वाले बार में गये , जहां शराब की गंध के साथ सिगरेट और बीड़ी के धुंए के मेल से विचित्र कॉकटेल बन रहा था! वहां निम्न मध्य वर्गीय साधारण लोग दारू पी रहे थे। अमीर न होने के बावजूद मुझे जगह बिल्कुल पसंद नहीं आई। सिगरेट के धुंए से मैं खांसने लगा था! मार्क ने बाहर निकलकर गाड़ी के ड्राइवर को खूब सराहा! हम ऐसी ही जगह बियर पीना चाहते थे! मैंने इस पर असहमति जताई तो मार्क हंसने लगे!

अगले दिन लंच के लिए हम पुरी में थे। हमें कोणार्क भी जाना था। ड्राइवर ने हमें एक ऐसे रेस्टोरेंट ले गया, जिसका नाम.संभवत: वाइल्ड ग्रास था। उसके मालिक पढे-लिखे इंसान थे। मार्क को फौरन पहचान गये। उन्होंने हम तीनों को बेहतरीन लंच कराया। बिल चुकता करने लगा तो लेने से साफ मना कर दिया।

उसी दिन मार्क टली हमें (साथ में स्तम्भकार और राष्ट्रपति के आर नारायणन के ओएसडी रह चुके एस एन साहू भी थे) चाय पीने के लिए पुरी स्थित एक ऐसे होटल लेकर गये जो रेलवे का था या रेलवे ने अपने उस होटल को किसी कांट्रैक्टर को दे रखा था। वहां पता चला कि मार्क का ओडिशा और खासतौर पर पुरी से खास रिश्ता है। उनके पिता संभवत: रेलवे से सम्बद्ध किसी कार्पोरेशन की नौकरी के लिए ही ब्रिटेन से भारत आये थे। उन्होंने कलकत्ता और दार्जिलिंग में ज्यादा वक्त तक काम किया। वह पुरी भी आते-जाते रहे। परिवार कलकत्ता में बसा था। इसलिए मार्क का जन्म कलकत्ता में ही हुआ। फिर वह ब्रिटेन में भी रहे।

लेकिन अंतत: मार्क ने अपना देश भारत को ही चुना। 1935 में यहीं जन्मे और आज 25 जनवरी को यहीं से विदा हुए!

मार्क गजब की शख्सियत थे! अच्छे और दिलचस्प इंसान थे। उन्होंने खूब घूमा और खूब लिखा-बोला। वन्डरफुल जिंदगी बिताई! सर विलियम मार्क टली आपके जाने का हमें गहरा दुख है! बहुत कम निजी मुलाकातों के बावजूद आप हमारी यादों में बने रहेंगे! कोणार्क में हम दोनों ने धूप से बचने के लिए जो हल्के लाल रंग का हैट खरीदा था, उसे आज मैं खोज रहा था! बड़े प्यार से आपने मेरे सिर पर उसे रखा। आज वह नहीं मिला जैसे आप फिर कभी नहीं मिलेंगे लेकिन उसे मैं खोज रहा था ताकि आपका वह स्पर्श महसूस कर सकूं!

सलाम और श्रद्धांजलि मार्क टली!


अशोक कुमार शर्मा-

भारतीय पत्रकारिता पर अपनी निष्कलंक बेदाग और न्याय पूर्ण रिपोर्टिंग की छाप छोड़ने वाले महान पत्रकार सर मार्क टली का निधन हो गया।

मैंने अपनी सेवा के 40 वर्षों में अनेक बार उनके साथ निकटता से काम करने का सौभाग्य पाया। मुझे देखकर उन्हें प्रसन्नता भी होती थी। हर बार वह कोई नई बात बता जाते थे। एक अवसर पर मैंने एक पत्रिका के लिए 1998 में उनका लंबा साक्षात्कार भी लिया था। जिसे मैं कभी पीडीएफ के रूप में शेयर करूंगा। सबसे खास बात यह है कि उसे साक्षात्कार में ब्रिटेन और भारत दोनों के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान प्राप्त करने वाले मार्क ने भारत के भविष्य में बहुत आस्था जताते हुए कहा था कि यदि भारत सरकार यहां की प्रशासनिक सेवाओं को जनता की सेवा के हिसाब से प्रशिक्षित करेगी तब यह देश वाकई में बहुत तेज गति से आगे बढ़ेगा। दुर्भाग्य यह है कि अंग्रेजों ने इस देश के लोगों को गुलाम बनाए रखने के लिए जो प्रशासनिक व्यवस्था आजाद की थी इस का अंधानुकरण अभी भी किया जा रहा है।

जब मैं महाकुंभ 2010 के दौरान उत्तराखंड में मुख्यमंत्री का विशेष कार्य अधिकारी था, तब मुख्यमंत्री Dr.Ramesh Pokhriyal Nishank की सर्वोच्च प्राथमिकता यह थी कि देश-विदेश के किसी भी पत्रकार को महाकुंभ के दौरान किसी भी प्रकार से कोई असुविधा ना हो पाए। उस कुंभ मेला में मार्क टली न जाने कब आए और कब अपना कवरेज करके हरिद्वार और ऋषिकेश की सीमा पर स्थित एक बड़े होटल में भोजन करने चले गए।

मैं वहां पर उनसे मिलने के लिए गया तो यह देखकर हैरत में पड़ गया कि वह केवल सलाद खा रहे थे। जब मैं उनसे पूछा कि यह होटल तो कुंभ मेला से बाहर है और यहां पर सब लोग नॉन वेजिटेरियन भी खा लेते हैं लेकिन आपने सलाद ही खाया है। तो उन्होंने जवाब दिया कि भले ही कोई ना देख रहा हो और नियम भी न लागू हो, तब भी मेरी अंतरात्मा तो मुझे देख रही है। मेरी जिंदगी में मेरा यह सिद्धांत रहा है कि मैं कोई गलत काम ना करूं। मुझे इस देश और इसकी संस्कृति से प्यार है।

संयोग से उनसे मेरी दूसरी मुलाकात कुछ समय बाद ही हो गई। जब मैं उत्तराखंड से लौटा तब मुझे प्रयाग में 2013 के महाकुंभ मेला का मुख्य प्रभारी जनसंपर्क और मीडिया बना दिया गया। उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री अखिलेश यादव के भी सीधे निर्देश थे कि अंतरराष्ट्रीय स्तर की व्यवस्थाएं कुंभ मेला में 24 घंटे सुनिश्चित की जाएं। अपनी आदत के अनुसार मैंने कुंभ मेला परिसर में ही अपना स्थाई निवास बनाए रखा। एक दिन बहुत सुबह बीबीसी के उत्तर प्रदेश प्रमुख Ram Dutt Tripathi के साथ अचानक ही मार्क टली वहां आ पहुंचे। इतनी सुबह उन्हें उम्मीद नहीं थी कि सरकारी मशीनरी काम कर रही होगी। लेकिन मुझे काम करता देखकर उन्हें हैरत नहीं हुई। उन्होंने बताया कि रामदत्त जी ने पहले ही से मुझे बता दिया था कि आप यहां पर तैनात हैं।

मैंने मार्क से पूछा कि यदि आपको कुछ विशेष सुविधा की आवश्यकता हो तो मैं प्रबंध कर देता हूं। लेकिन उन्होंने कहा कि मैं धक्के खाकर काम करने वाला पत्रकार हूं। आप अपना काम कीजिए मैं रामदत्त त्रिपाठी के साथ अपना मिशन पूरा करके चला जाऊंगा। यह कहने के बाद वह हंसने लगे। उन्होंने वहां पर राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पत्रकारों के लिए की गई व्यवस्थाओं पर बहुत संतोष भी जताया।

उनसे अंतिम मुलाकात 2019 में इंडियन ऑयल भवन में आयोजित एक राष्ट्रीय सम्मेलन में हुई थी जिसमें वह मुख्य वक्ता थे और मैं आयोजकों के साथ सहयोग कर रहा था। मुझे दूर से ही देखकर उन्होंने पास बुला लिया और स्टेज पर खड़े होकर मेरे साथ फोटो खिंचवाया। जब मैं जाने लगा तब उन्होंने मुझसे कहा कि भारत बदल रहा है। उम्मीद है यह अच्छी दिशा में जाएगा।

उनके आकस्मिक निधन की सूचना मुझे किसी मित्र ने दी तो मुझे विश्वास नहीं हुआ और मैं उनके पुराने साथी राजेंद्र त्रिपाठी को फोन करके पूछा। राम दत्त जी ने बताया कि उन्हें हार्ट स्ट्रोक की समस्या थी और दो बार उन्हें दिल के दौरे पड़ चुके थे। 90 वर्ष की अवस्था हो चुकी थी और स्वास्थ्य साथ नहीं दे रहा था।

ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे और उनके परिजनों को इस अपार दुख को सहन करने की शक्ति प्रदान करें। भले ही वह एक ब्रिटिश नागरिक थे परंतु किसी भी मामले में उन्हें भारत माता का सपूत कहा जा सकता है।

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