इरशाद दिल्लीवाला-
76 साल का आदमी फिर ज़मीन से खड़े होकर शुरुआत करने जा रहा है। यह है प्रणय रॉय और उनका DeKoder…. इस उम्र में… जब ज़्यादातर लोग ठहर जाते हैं, तब एक आदमी फिर से चल पड़ा — और उनके साथ हैं Radhika Roy — जिनके माथे की लाल बिंदी इस बार भी एक नए “नीले डिकोडर” में चमकती हुई दिखाई देती है।
कभी NDTV के जरिए उन्होंने भारतीय पत्रकारिता को “स्टूडियो” से “विश्वसनीयता” तक पहुँचाया था। ग्राफिक्स, डेटा, चुनाव विश्लेषण — ये सब शब्द उन्होंने आम दर्शक की भाषा बना दिए। भारत में चुनावी रात को “इवेंट” बनाने का श्रेय अगर किसी को जाता है, तो वह प्रणय रॉय ही हैं।
और आज — वही व्यक्ति फिर से मैदान में है। बड़ी टीम नहीं, भारी-भरकम स्टूडियो नहीं… बस एक माइक, एक मोबाइल — और पत्रकारिता का पुराना जुनून।
मात्र चंद लोगों की टीम के साथ प्रणय बहुत सालों बाद ग्राउण्ड पर रिपोर्टिंग करते हुए नजर आए। ऑफिस में पुरानी साथी निधि राजदान है और ज़मीन पर कुछ नये चेहरे। अभी बहुत थोड़े से फॉलोवर है लेकिन अगले 1 साल में प्रणय रॉय इसे देश का मुख्य मीडिया हाउस बना देगें यह हम सब जानते है।
इस हफ्ते वायरल हुई उनकी तस्वीर में वह कहते हैं — “पत्रकारिता के लिए सिर्फ एक माइक और मोबाइल चाहिए।”
यह वाक्य साधारण लग सकता है, लेकिन जब यह उसी व्यक्ति के मुंह से निकलता है जिसने कभी भारत को “मॉडर्न न्यूज़ टेक्नोलॉजी” से परिचित कराया था — तो यह एक घोषणा बन जाता है।
जैसे वह कह रहे हों — “माध्यम बदल सकता है, लेकिन मर्म नहीं।” अभी फॉलोवर्स कम हैं, शोर कम है, संसाधन सीमित हैं… लेकिन — प्रणय रॉय जब भी शुरू करते हैं, तो कुछ भी “छोटा” नहीं रहता।

सौ फ़ीसदी सच्चा या सौ फ़ीसदी झूठा कोई भी नहीं होता। लेकिन जब भी कोई अपने सच वाले हिस्से में होता है तो बेहद ख़ूबसूरत लगता है। तमाम असहमतियों के बावजूद रॉय साहेब ये तस्वीर मुझे बहुत पसंद आई। -शशि सिंह
मनीष सिंह-
रामचन्द्र कह गए सिया से..
नई दिल्ली टेलीविजन, याने एनडीटीवी वो नर्सरी रहा, जहां से हिंदुस्तान के सबसे बड़े टीवी पत्रकार निकले। रविश कुमार, राजदीप सरदेसाई, अर्नब गोस्वामी, दिबांग, राहुल कंवल, निधि कुलपति, बरखा दत्त, श्रीनिवास जैन, निधि राजदान, सर्वप्रिया सांगवान.. प्रणब रॉय की संस्था ने नर्चर किये।
लंबे समय तक यह चैनल गम्भीर- शांत डिस्कशन, और सादे रंगों के साथ, देखने सुनने योग्य बना रहा। अगर आपको शोर के बीच प्रमाणित खबर, या उसका विश्लेषण सुनना हो, तो एनडीटीवी अकेला स्टॉप था। और यही गुण उसका काल बन गया।
इसके मालिक, प्रणव और राधिका रॉय पर छापे पड़े, कम्पनी के शेयर टूटे, इन्वेस्टर ने हाथ खींचा। सरकारी माल बेचकर बड़े हुए व्यापारी ने चैनल जबरन खरीद लिया। बिकते ही सारे मामले बन्द हो गए, और केस खत्म हो गया। राधिका-प्रणव बरी हो गए। लेकिन इसके साथ एनडीटीवी नाम के चैनल का म्यार भी खत्म हो गया। अब जो है, दर्जनों सरकारी भोंपुओं के बीच एक और भोंपू है।
भारत, अकूत प्रतिभाओं से भरा देश है। विज्ञान, अर्थशास्त्र, आईटी, इंजीनियरिंग, बायोटेक में भारत के लोगों की वैश्विक मांग है। लेकिन वे सुंदर पिचाई बन सकते है, बिल गेट्स नहीं। नौकर बन सकते है, मालिक नहीं। उद्योग नहीं शुरू कर सकते, संस्थान नहीं खड़े कर सकते। अनलेस, कि सरकार (नेता) आपको फैसिलिटेट करे। यह तभी होगा, जबकि आप उसके साथ विविध प्रकार के लेनदेन में भागीदार हों।
इसका चरम स्तर पर पहुँचा, जब मामला आपके फेसिलिटेशन से बढ़कर, आपके प्रतिस्पर्धी को क्रश करने तक आ गया। याने आप शुरू करें, लेकिन जैसे ही बड़े बनेंगे- पूर्वस्थापित की नजर में खटकेंगे। वे पहले से नेता के साथ है, सरकार का अनौपचारिक हिस्सा है। तब लूट लिए जाएंगे। मिटा दिए जाएंगे, बेचने को मजबूर कर दिये जायेंगे। तब क्या आश्चर्य की भारत में बड़े उद्यम खड़ा करना टैलेंट का नहीं.. राजनीतिक सेटिंग का मसला है।
प्रणब रॉय का मसला, इस विधा का क्लासिक केस है। सैकड़ो करोड़ का संस्थान, और पचासों सम्मानित पेशेवर पत्रकार पैदा करने वाला मेंटर, आज एक मोबाइल और माइक लेकर, सत्तर पार की उम्र में कवरेज कर रहा है। पांव पांव चल रहा है। पेशे का फर्ज निभा रहा है। उसकी पांव की धूल बराबर चेले, रंगीन स्टूडियो में बैठकर पैकेज ले रहे हैं। और उनके कर्मों से पत्रकारिता की रैंकिंग, दुनिया के देशो में डेढ़ सौ वे पायदान पर उतर गई है।
उन्हें देखता हूँ, और फिर इस तस्वीर को- जहां प्रणव एक माइक, और एक मोबाइल लिए किसी अनाम डिजिटल चैनल के लिए कवरेज कर रहे है। तो मुंह से “हे राम” निकलता है। और वो फिल्मी गाना भी याद आता है- रामचन्द्र कह गए सिया से, ऐसा कलयुग आएगा। हंस चुगेगा दाना दुनका.. कौआ मोती खायेगा।
Salute sir, NDTV may have been taken away from Prannoy Roy, but he never left journalism. His recent interview using a mobile phone as a mic is going viral. -मुजाहिर आलम
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