
दिल्ली यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स (DUJ) ने भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की कथित टिप्पणी पर कड़ी आपत्ति जताई है। संगठन ने कहा कि बेरोजगार युवाओं, सोशल मीडिया पत्रकारों और एक्टिविस्ट्स को “कॉकरोच” और “समाज का परजीवी” बताना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और असंवेदनशील है।
DUJ ने अपने बयान में कहा कि एक सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने कथित तौर पर कहा था कि आज कई बेरोजगार युवा “कॉकरोच” की तरह हैं, जिन्हें रोजगार नहीं मिलता तो वे मीडिया, सोशल मीडिया, RTI एक्टिविज्म या दूसरे एक्टिविज्म में आकर व्यवस्था पर हमला करने लगते हैं। पत्रकार संगठन ने इन टिप्पणियों को न्यायपालिका के सर्वोच्च पद पर बैठे व्यक्ति के लिए अनुचित बताया।
संगठन ने कहा कि यह बयान उन लाखों युवाओं और पत्रकारों के संघर्ष का अपमान है जो मौजूदा आर्थिक हालात और बेरोजगारी के बीच अपनी पहचान बनाने की कोशिश कर रहे हैं। DUJ के मुताबिक देश में बढ़ती बेरोजगारी खुद सरकारी सर्वेक्षणों में सामने आ चुकी है, लेकिन इसके लिए युवाओं को दोषी ठहराना गलत है।
DUJ ने मुख्यधारा की मीडिया पर भी सवाल उठाए। संगठन ने कहा कि बड़े मीडिया संस्थान कॉरपोरेट हितों और सरकारी दबाव में काम करते हैं, जिसके कारण कई अनुभवी और स्वतंत्र सोच वाले पत्रकारों को पिछले एक दशक में नौकरी से बाहर होना पड़ा। ऐसे अनेक पत्रकार अब यूट्यूब, फेसबुक, इंस्टाग्राम और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के जरिए स्वतंत्र पत्रकारिता कर रहे हैं।
संगठन ने कहा कि मीडिया में कॉन्ट्रैक्ट आधारित रोजगार व्यवस्था ने मिड-कैरियर और वरिष्ठ पत्रकारों को असुरक्षित बना दिया है। वहीं पत्रकारिता संस्थानों से निकलने वाले हजारों युवा स्थायी रोजगार नहीं पा रहे हैं और सोशल मीडिया के जरिए अपने करियर की शुरुआत करने को मजबूर हैं।
DUJ ने कहा कि सोशल मीडिया आज लोकतंत्र में वैकल्पिक आवाजों का मंच बन चुका है, जहां आम नागरिक सत्ता और व्यवस्था पर सवाल उठाते हैं। संगठन के मुताबिक इसे “परजीवी” या “कॉकरोच” कहना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है।
बयान में न्यायपालिका से अपील की गई कि वह बेरोजगार और अल्परोजगार युवाओं, पत्रकारों और वकीलों के संघर्ष को समझे, न कि उन्हें अपमानजनक शब्दों से संबोधित करे। साथ ही DUJ ने देशभर के पत्रकारिता छात्रों और बेरोजगार युवाओं के साथ एकजुटता जताते हुए कहा कि लोकतंत्र में व्यवस्था से सवाल करना एक जरूरी अधिकार है और युवाओं को इसे जारी रखना चाहिए।
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जब एक संवैधानिक लोकतंत्र के मुख्य न्यायाधीश महोदय देश के बेरोज़गार युवाओं, आरटीआई कार्यकर्ताओं, मीडिया कर्मियों और असहमति व्यक्त करने वालों की तुलना “कॉकरोच” और “परजीवी” से करते हैं, तो यह केवल व्यक्तिगत आक्रोश का मामला नहीं रह जाता!


