पंकज शुक्ला-
कॉक्रोच जनता पार्टी के फॉलोअर्स इस समय देश का सबसे बड़ा विमर्श हो सकता है। ये सिस्टम से नाराज़ युवा भी हो सकते हैं, नौकरियां की तलाश में भटकते लोग भी हो सकते हैं और ये लोग भी हो सकते हैं जिन्हें ख़ुद को ‘कॉक्रोच’ कहे जाने का सबसे ज़्यादा गुस्सा है..
गांव वाले घर को बंद कर शहर के लिए निकलते समय मुझे किचेन में दो कॉक्रोच दिखे। लेकिन, मैंने न उन्हें मारा, न उन पर लाल वाला हिट छिड़का या न ही कुछ और, मैं बस उन्हें उनके हाल पर छोड़ चला आया। कुछ कुछ वैसे ही जैसे नौकरियों से जुड़े सिस्टम ने इस देश के युवाओं को छोड़ा हुआ है।
भारत की राजनीति में इस समय सबसे बड़ी बहस न संसद में चल रही है, न टीवी डिबेट में, और न ही किसी चुनावी रैली में। देश का सबसे जीवंत राजनीतिक प्रयोग इस समय इंस्टाग्राम की रीलों में हो रहा है, जहां ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ नाम का एक डिजिटल तंत्र अचानक भारतीय लोकतंत्र की दीवारों पर चढ़ता दिखाई दे रहा है।
जिस देश में राष्ट्रीय पार्टियां वर्षों तक पदयात्राएं निकालकर, लाखों कार्यकर्ता जोड़कर और करोड़ों रुपये खर्च करके अपना जनाधार बनाती रही हैं, वहां एक मीम-पार्टी ने कुछ ही दिनों में भारतीय जनता पार्टी के इंस्टाग्राम फॉलोअर्स को पीछे छोड़ दिया। राजनीति के पुराने खिलाड़ी अभी यह समझ ही रहे हैं कि यह मज़ाक है, आंदोलन है, मार्केटिंग है या एल्गोरिद्म का चमत्कार, लेकिन तब तक इंटरनेट की जनता इसे नई विपक्षी प्रजाति घोषित कर चुकी है।
स्थिति इतनी दिलचस्प है कि अब भारत की सबसे बड़ी राजनीतिक बहस विचारधारा नहीं, बल्कि रील एंगेजमेंट बन चुकी है।
कांग्रेस पार्टी, जो कभी गांव-गांव की चौपालों में राजनीति करती थी, आज इंस्टाग्राम पर लगभग 1.3 करोड़ फॉलोअर्स के साथ सबसे आगे मानी जाती है। बीजेपी लगभग 87 लाख के आसपास है। आम आदमी पार्टी अभी भी 20 लाख से नीचे की डिजिटल आबादी में संघर्ष कर रही है। लेकिन इन सबके बीच कॉकरोच जनता पार्टी ने अचानक 1 करोड़ के आसपास पहुंचकर राजनीति की पूरी सोशल मीडिया व्याकरण बदल दी।
यहां सबसे बड़ा व्यंग्य यही है कि भारत की मुख्यधारा राजनीति दशकों से युवाओं को भविष्य कहती रही, लेकिन इंटरनेट ने उन्हीं युवाओं को ‘कॉकरोच’ बनाकर सबसे बड़ा डिजिटल जनसमूह तैयार कर दिया।
कॉकरोच जनता पार्टी का पूरा सौंदर्यशास्त्र ही असफलताओं की राजनीति पर आधारित है। यहां बेरोजगारी उपलब्धि है, आलस्य पहचान है, और सिस्टम से निराशा सदस्यता शुल्क। उनके मीम्स में नौकरी नहीं मिलने का दर्द भी है और उस दर्द पर हंसने की बेशर्मी भी।
शायद यही वजह है कि यह आंदोलन युवाओं को नकली नहीं लगता। यह पहली ‘पोस्ट-होप पॉलिटिक्स’ है, जहां लोग बदलाव की उम्मीद से नहीं, बल्कि सामूहिक थकान से जुड़ रहे हैं।
दिलचस्प बात यह है कि पारंपरिक पार्टियां अब भी सोशल मीडिया को डिजिटल पोस्टर-बैनर समझती हैं। उनके इंस्टाग्राम अकाउंट पर वही पुरानी प्रेस कॉन्फ्रेंस, वही मंच, वही भाषण, वही राष्ट्रवाद बनाम धर्मनिरपेक्षता की स्क्रिप्ट चलती रहती है। जबकि, कॉकरोच जनता पार्टी इंस्टाग्राम को मनोरंजन की भाषा में समझती है।
वहां हर पोस्ट एक मीम है, हर मीम एक राजनीतिक तंज है, और हर तंज एक वायरल रील में बदल जाता है। यह नई राजनीति कैमरे के सामने भाषण नहीं देती, कैमरे को ही मज़ाक बना देती है।
भारतीय राजनीति का यह सबसे बड़ा सांस्कृतिक संक्रमण है। पहले नेता जनता तक पहुंचते थे, अब एल्गोरिद्म पहुंचता है। पहले कार्यकर्ता पोस्टर लगाते थे, अब बेरोजगार युवा मीम बनाते हैं। पहले राजनीतिक नारे दीवारों पर लिखे जाते थे, अब वे इंस्टाग्राम बायो में दिखाई देते हैं।
और शायद सबसे बड़ा व्यंग्य यह है कि जिन युवाओं को वर्षों तक सोशल मीडिया पर समय बर्बाद करने वाली पीढ़ी कहा गया, वही पीढ़ी अब सोशल मीडिया पर सबसे तेज़ राजनीतिक शक्ति बनकर उभरी है।
हालांकि यह भी सच है कि इंस्टाग्राम फॉलोअर्स वोट बैंक नहीं होते। रील्स चुनाव नहीं जितातीं। मीम्स बूथ मैनेजमेंट नहीं करते। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि भारतीय राजनीति का सांस्कृतिक मूड अब टीवी स्टूडियो नहीं, इंटरनेट तय कर रहा है।
‘कॉकरोच जनता पार्टी’ शायद कभी चुनाव न लड़े। शायद यह कुछ महीनों बाद गायब भी हो जाए। शायद यह केवल एक वायरल इंटरनेट घटना बनकर रह जाए। लेकिन इसने भारतीय राजनीति को एक असहज आईना जरूर दिखा दिया है कि देश का युवा अब भाषण नहीं सुनना चाहता, वह सिस्टम पर मीम बनाना चाहता है।
और, लोकतंत्र के इतिहास में शायद पहली बार, ‘कॉकरोच’ कहलाना अपमान नहीं, डिजिटल पहचान बन गया है।

उर्मिलेश-
अन्ना-केजरीवाल रहे हों या आज की ‘काकरोच जनता पार्टी’ हो; हाल के वर्षों में ऐसे “स्वतंत्र अभियानों” के पीछे अक्सर कोई ‘योजना’ या कोई पूर्व-निर्धारित एजेंडा निकल आता है. जन-असंतोष का फ़ायदा उठाकर अपने को ‘फ्री थिंकर’ या ‘पूरी तरह स्वतंत्र’ बताने वाले ऐसे नवगठित संगठन पर्दे के पीछे के कुछ ताकतवर छुपे रुस्तमों का समर्थन पाकर मैदान में जम जाते हैं! अराजनीतिक मिजाज वाले या रंग-बिरंगे फ्री-थिंकर किस्म के ईमानदार लोग भी इनके मायाजाल में फंस जाते हैं! फिर ऐसे संगठन चुनाव जीतकर किसी क्षेत्र-विशेष में शासक-वर्ग की बी. या सी. टीम बनकर सत्तासीन हो जाते हैं. इनके उभार के समय ‘लिबरल्स’ और केंद्रीय सत्ता से नाराज मीडिया का एक हिस्सा इनके लिए नगाड़ा बजाता है! कुछ समय बाद पोल खुलने लगती है..फिर सारे नगाड़े चुप हो जाते हैं!
इसीलिए अन्ना-केजरीवाल के भ्रष्टाचार-विरोधी नियोजित अभियान से हम कत्तई प्रभावित नहीं हुए. क्योंकि जो सच श्रीमन प्रशांत भूषण जैसों को वर्षों बाद पता चला; वह मुझे कैंपेन के शुरू में ही पता चल गया था. इसका कारण ये नहीं कि प्रशांत भूषण से ज्यादा रिसोर्स-फुल आदमी हूं. कत्तई नहीं!
हमें असलियत पता चल गई क्योंकि हमारे मोहल्ले में ही उनका(अन्ना-केजरी वालों का) का एक बहुत महत्वपूर्ण Camp Office था. केजरीवाल से मेरी पहली मुलाकात वहीं दो बेड रूम के एक छोटे से फ्लैट में हुई थी! पहली मुलाकात में ही वह मुझे बेहद महत्वाकांक्षी, एरोगेंट, घुटा हुआ और अविश्वसनीय व्यक्ति लगा!
ऐसे कथित स्वतंत्र-चेता चेहरों के पीछे अक्सर कोई ‘ख़ूँख़ार योजना’ निकल आती है जो दशकों से बन रहे जन-असंतोष का फ़ायदा उठाकर शासकों की किसी B या C टीम को कुछ दिन के लिए सत्ता पर बिठा देती है! कुछ दिन तक लिबरल्स इनकी दुंदुभी बजाते हैं. फिर चुप हो जाते हैं!
इसलिये काकरोच जनता पार्टी (KJP) को भी पहले समझने की कोशिश करूंगा. सुना है, इंटरनेट से उतरकर उसके कुछ कर्ता-धर्ता हमारे बीच यानी समाज में अपनी भौतिक उपस्थिति बनाने की योजना बना रहे हैं.
कल उनका एक कथित मैनिफैस्टो दिखा. फौरन पढ़ गया! इसका पाठ संदेह जताने वाला है! एक पैरे के एक संकल्प पर मेरी निगाह टिक गई! एक पंक्ति भी बुदबुदाया: ‘आप लोग कौन हो भाई!’
इसलिए जांच-परख कर ही ‘काकरोच जनता पार्टी’ पर बोलूंगा.
15 मई को CJI द्वारा युवाओं को “Parasite” और “Cockroach” कहे जाने की चर्चा के बाद सोशल मीडिया पर एक नया डिजिटल-राजनीतिक व्यंग्य उभरकर सामने आया “Cockroach Janta Party” यानी CJP.
इस पहल की शुरुआत बोस्टन यूनिवर्सिटी में पढ़ रहे भारतीय छात्र अभिजीत दिपके (@abhijeet_dipke) ने की है।
महज 5 दिनों में ही CJP के इंस्टाग्राम पर 2 मिलियन फॉलोअर्स हो चुके हैं, जो Gen-Z की डिजिटल ताकत को दिखाता है।व्यंग्य और गंभीर राजनीति के मिश्रण के साथ CJP ने अपना 5 सूत्रीय घोषणा पत्र भी जारी किया है।
इस डिजिटल आंदोलन के जरिए युवाओं, छात्रों और बेरोजगारों से जुड़े मुद्दों को उठाने की कोशिश की गई है —
- किसी भी मुख्य न्यायाधीश को रिटायरमेंट के बाद राज्यसभा सीट या सरकारी पद न दिया जाए।
- दलबदल करने वाले नेताओं पर 20 साल तक राजनीति करने पर रोक लगे।
- महिलाओं को संसद में सीधे 50% आरक्षण मिले।
- वोट कटने जैसी घटनाओं पर मुख्य चुनाव आयुक्त की जवाबदेही तय हो।
- बड़े उद्योगपतियों के मीडिया चैनलों के लाइसेंस की समीक्षा हो और स्वतंत्र पत्रकारिता को बढ़ावा मिले।
सोशल मीडिया पर CJP को लेकर बहस तेज है।
कुछ लोग इसे युवाओं की नाराज़गी की आवाज़ बता रहे हैं, तो कुछ इसे केवल एक डिजिटल व्यंग्य मान रहे हैं।-अंकित शुक्ला


