सुभाष सिंह सुमन-
मोदीजी के IT सेल ने कहा कौआ कान ले गया। उसके बाद मैं अच्छे-खासे पढ़े-लिखे और समझदार लोगों को कौए के पीछे दौड़ लगाते देख रहा हूँ। एक ग्राफिक घुमा दिया गया कि सीजेपी के ज्यादातर फॉलोअर्स पाकिस्तान और बांग्लादेश से हैं। लोग अब उसे गले में लटकाये घूम रहे हैं वेदवाक्य बनाकर। मुझे प्रथमदृष्टया ही वह IT सेल का हथकंडा लग रहा था। यह उनके मोडस ऑपरेंडी का अभिन्न हिस्सा है कि उठती आवाज को संदिग्ध बना दो। अन्ना आंदोलन में ठगे जा चुके लोगों के कान तुरंत खड़े हो गये। यह उचित भी है। दूध से जले हैं, छाछ भी फूंककर पीने को जायज ठहराया जा सकता है। लेकिन छाछ को फूंकने के लिए भट्ठी की हवा नहीं दे सकते हैं न! इतनी तो खुली रहे दृष्टि। ऐसा कोई टूल नहीं है, जो किसी इंस्टा अकाउंट के फॉलोअर्स का ऑरिजिन बता दे। इसके लिए हर फॉलोअर का प्रोफाइल खोलकर देखना होगा। यह संभव नहीं है। मतलब घुमाया जा रहा ग्राफिक शुद्ध फर्जी है।
इसी तरह सीजेपी से जुड़े लोगों के आप नेताओं के साथ की पुरानी तस्वीरें घुमायी जा रही हैं। इससे भी क्या साबित हो जाता है? मोदीजी की कई तस्वीरें आसाराम के साथ हैं। इससे क्या सिद्ध हो जाता है? ये सब आईटीसेलियों के घिनौने हथकंडे हैं। चैतन्य मित्र कौए के पीछे भागने से पहले अपने कान चेक कर लें एकबार। फिर भाजपाई मित्रों के चहेते कपिल मिश्रा भी तो उधर से ही आये हैं। मिश्रा जी तो दिल्ली विधानसभा में मानसी सोनी कांड की सीडी तक चला चुके हैं। ऐसे और भी लोग हैं, जो कल पापी थे, आज पूज्य हैं।
रही बात सीजेपी की, तो मुझे यह आंदोलन बनता नहीं दिखता। सबसे पहले तो यह पैरोडी पार्टी है। CJI का बयान नितांत गदहपन था और उसका सशक्त प्रतिकार अति आवश्यक था। वह उद्देश्य सीजेपी ने सिद्ध कर दिया। फिर इसने यह भी सिद्ध कर दिया कि बड़ी आबादी ने अंधभक्ति की पट्टी उतार दी है। ये दोनों बड़ी अच्छी बातें हैं।
अब इसके आगे क्या? मैं अपना व्यक्तिगत बताऊँ, तो सत्ता परिवर्तन के आंदोलनों और अभियानों में मुझे कभी रुचि नहीं जगेगी। व्यवस्था परिवर्तन की बात करे कोई तो कुछ ऊर्जा खपाई जाये। सत्ता परिवर्तन के लिए मौजूदा विकल्प ही उचित हैं। हमने स्वतंत्र भारत में दो बार आंदोलनों के गर्भपात से निकले राजनीतिक दलों का हश्र देखा है। जेपी के आंदोलन से जितने निकले, सबने समाजवाद को जीवित ही कब्र में दाब दिया। फिर अन्ना ब्रो के आंदोलन से केजरीवाल मसीहा बने। आज देश में इतनी बुरी स्थिति होने के बाद भी आंदोलन खड़ा होने की संभावना नहीं बन पा रही, इसका पाप इसी मसीह को लगेगा।
जो लोग सत्ता में परिवर्तन चाहते हैं, मौजूदा विकल्पों में ही रास्ता खोजें। कांग्रेस समेत तमाम दल जमीन पर उतरें। पसीना बहाएं। इसमें आपका भी भला है और कुछ-कुछ देश का भी।


दो दिन पहले तक कॉकरोचों से रसोई में केवल महिलाएं डरती थी, आज पूरी सरकार और विपक्ष की घिग्घी बन्ध गई। जनता अपनी पर आती है तो बड़े से बड़े ठेकेदारों की लंका लगा देती है।
भाजपा को यह अहम और बहम हो गया है कि उसके राज में सब खुश हैं जबकि जनता मजबूरी में भाजपा को वोट दे रही है क्योंकि सामने विपक्ष निकम्मा और निठल्ला होने के साथ सोशल मीडिया के जरिये ही सत्ता पाना चाहता है जबकि धरातल पर कोई काम नहीं करना चाहता।
कांग्रेस तो इस इंताजर में है कि लोग भाजपा से तंग होकर उनकी सरकार बना देंगे। इस भरम में तो राहुल गांधी बूढ़े हो जाएंगे ये कभी नहीं होने वाला।
-नवीन रमण
प्रकाश के रे-
एक ग्रैंडफ़ादर कॉकरोच का बयान : हालात कितने ख़राब हैं, इसका अंदाज़ा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि एक ऑनलाइन मीम कैंपेन ने सत्ता और विपक्ष दोनों को एक साथ बिदका दिया है.
कुछ बालकों ने एक महामहिम की टिप्पणी पर सोशल मीडिया में छुरछुरी छोड़ दी. निराश, नाराज़ और नाख़ुश लाखों बच्चे उस छुरछुरी के ज़रिये अपनी भड़ास निकालने लगे. उसमें कुछ युवा और बड़ी उम्र के लोग भी शामिल हुए.
कॉकरोच जनता पार्टी एक सोशल मीडिया प्रतिक्रिया है. वह प्रतिक्रिया क्यों आई, इस पर विचार करने की जगह बच्चों की कुंडली बाँचने का सिलसिला चल पड़ा, ज्ञानी लोग डीप स्टेट से लेकर विदेशी पैसा और अंदर के खेल पर जुगाली करने लगे.
डरिये, अगर लौंडों ने इस मोमेंट का राजनीतिक इस्तेमाल कर लिया या फिर पार्टी बना ली, तो क्या होगा! समस्या पर फ़ोकस हो, अपनी दुकान बचाने पर नहीं. बाज़ार बढ़ेगा, तो नई दुकानें खुलेंगी. यह नहीं रुकेगा. नतीजे के बारे में किसी को पता नहीं होता, अपने होश और हिसाब से लोग चलते हैं.

रवीश कुमार 2011 में भी इसी तरह “सही सवाल” है बोलकर खेल कर गए थे,अब भी वही कर रहे है । ज्ञात हो कि अभिजीत दीपके कॉकरोच जनता पार्टी के अध्यक्ष है और परम आदरणीय रवीश कुमार जी उन्हें वेलिडेशन दे रहे है । -दिलीप सिंह राजपुरोहित


