अलविदा राजे….. शब्द चित्रों का चितेरा चला गया… 35 साल के रिश्ते के बाद दोस्त ने अचानक बेवफाई कर दी । राजशेखर सबको छोड़ के दुनिया से रुखसत हो गया । आज की सुबह ही मनहूस है जो अपने साथ ये दुख भरी खबर ले कर आई है।
कोई 28 साल पहले उस कमबख्त ने हमसे वादा किया था – अजी तू यार गजब्बे हो जी, तोहरे ऊपर कहानी लिखब… शीर्षक होई “लगी लौ खुदा से वली हो न पाए”…..
तब से हर साल हम तगाता करते .. कब लिखोगे बे कहनियां? वो बोलता – तुम गुरु हर वक्त कुछ नया कर जाते हो तो समझ नहीं आता है कहानी खत्म कैसे होगी, तू पहिले थक जाओ तब हम लिखेंगे ।
शीर्षक छोड़ कर कथाकार चला गया है… साथ में अधूरी कहानी भी…
35 साल की स्मृतियाँ आँखो के सामने 10X की गति से कोलाज बना रही हैं…मेरी पहली डाक्यूमेंट्री की स्क्रिप्ट लिखने वाला एक बेरोजगार लड़का जिसकी साइकिल मेरे घर के बाहर से चोरी हो गई …
स्टेज पर थैंक्यू मिस्टर ग्लाड नाटक में रोंगटे खड़े कर देने वाला अभिनेता , गोरखपुर के अखबार जगत में सांस्कृतिक रिपोर्टिंग को नया आयाम देने वाला पत्रकार, नए फ़लक की तलाश में अचानक घर छोड़ कर कलकत्ता से होता हुआ नोएडा पहुंच जाने वाला इंसान जो टीवी खबरों को अपने कलम से जिंदा करता लेकिन अंदर के साहित्यकार को हाशिए पर छोड़ देने की कसक हमेशा परेशान करती ।
बीते तीन सालों में कई बार योजनाएं बनी, मैं जोर देता एक उपन्यास लिख दो राजे, टल जाता, एक फिल्म की स्क्रिप्ट पर हमने साथ काम करना शुरू किया था वो भी अधूरी है…
सब कुछ अधूरा ही तो है, हमेशा रह जाता है…. आदमी मुसाफ़िर है, आता है जाता है आते जाते रस्ते में यादें छोड़ जाता है….
RIP #Rajsekhar
My friend, colleague in IBN7 and above all a great character Raj Sekhar Tripathi is no more. Reel full of memories with you in IBN. You left too soon mate. A bindas insaan with indepth knowledge. A friend who always reminded me that we are related as well.
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I still remember my last day in IBN when you came to me and said- You have been a tiger here and be the tiger throughout your life. Rajasekhar, I have kept your words in letter and spirit. Life got busier since then and we could meet only a few times after that. But, your laughter, your knowledge and your intrinsic earthen nature left a strong imprint. Love you dost!
-Abhishek Dube
प्रदीप श्रीवास्तव-
सुबह सोकर उठते ही स्तब्ध करने वाली सूचना मिली कि वरिष्ठ पत्रकार प्रिय मित्र राजशेखर जी Rajshekhar Tripathi नहीं रहे। अभी पिछले महीने गोरखपुर से संबंधित एक खबर के लिए उन्होंने मुझे फ़ोन किया तो बात ख़बर को छोड़कर हर उस विषय पर हुई जो स्मृतियों के किसी कोनें में वर्षों से दबा था। जो तब बाहर आता है जब काम का बोझ कुछ कम होता है, जब कोई प्रिय, बहुत प्रिय यादों की पोटली लेकर अचानक सामने आ जाता है।
1998 में मैं हिंदुस्तान अखबार में गोरखपुर में रिपोर्टर था। राजशेखर जी राष्ट्रीय सहारा गोरखपुर में थे, उम्र में थोड़े से बड़े। हमारी कुछ बीटें कामन थीं।
रिपोर्टिंग के लिए आकाशवाणी या किसी बड़े सांस्कृतिक आयोजनों में हम लोग उन्हीं की वेस्पा स्कूटर से एक साथ जाते थे। देर शाम, रात के सांस्कृतिक कार्यक्रमों से कभी-कभी रिपोर्टिंग की ‘कमान’ मुझे सौंपकर कुछ देर के लिए वे ‘भूमिगत’ हो जाते थे और जब वापस आते थे तो एकदम बदले हुए और बहुत ही अच्छे मूड में।
बीच में ‘भूमिगत’ होने और अच्छे मूड का राज उन्होंने बहुत दिन बाद ‘लेकिन तुम यह मत करना’ हिदायत के साथ बताया। फिर समय बदला राजशेखर जी दिल्ली गए और मैं हिंदुस्तान से अमर उजाला फिर जागरण, अमर उजाला में देश के कई शहरों में घूमता रहा।
मैं कहीं भी रहा। मुरादाबाद, मुजफ्फरपुर, रांची, गोरखपुर। काम की व्यस्तता के बीच भी राजशेखर जी ने हमेशा संपर्क बनाए रखा। मैं रांची जागरण में था तो राजशेखर जी ने एक बार फ़ोन किया और बोले- प्रदीप माफ़ करना मैं तुम्हारा नाम भूल रहा हूं। फिर कुछ पल मौन रहने के बाद ठठाकर हंसे और बोले कि यार बीच-बीच में मिलते, बतियाते रहो नहीं नहीं तो वक्त के धुंध में नाम चेहरा सब भूल जाएगा। तय हुआ कि गोरखपुर में मुलाकात होगी। पिछले महीने बात हुई तो उन्होंने कहा कि अब दिल्ली आओ यहीं मुलाक़ात होगी।
लेकिन अब उनसे कभी मिलना नहीं होगा। काश जाने से पहले एक बार मिलना हो पाया होता, काश आपका अंतिम दर्शन कर पाया होता। आप बहुत याद आएंगे मित्र।
वीरेश विक्रम सिंह-
वरिष्ठ पत्रकार ,राजशेखर त्रिपाठी के निधन की खबर भीतर तक दुखी कर गई। जब मैं India TV में था, तब वे Deputy Executive Editor थे। सच कहूँ तो पत्रकारिता में बहुत कम लोग ऐसे मिलते हैं जिनमें ज्ञान, भाषा, व्यक्तित्व और इंसानियत — सब एक साथ इतनी सहजता से मौजूद हो । राजशेखर सर उन्हीं विरले लोगों में थे।
वो सच मायनों में “फक्कड़” इंसान थे — बेफिक्र, जीवंत, बेहद आत्मीय। उनकी भाषा पर अद्भुत पकड़ थी, voice-over ऐसा कि शब्द भी जीवंत हो उठें। राजनीति से लेकर साहित्य और समाज तक, शायद ही कोई विषय हो जिस पर उनकी समझ गहरी न हो।
हम लोगों की मौज भी खूब लिया करते थे, लेकिन उस अपनत्व में हमेशा स्नेह छिपा होता था।
Anand Kumar को गोलुआ नाम उन्होंने ही दिया था
उनसे Facebook और WhatsApp के जरिए लगातार संवाद बना हुआ था। मन में यह तय था कि जुलाई में मुलाकात होगी… लेकिन क्या पता था कि उससे पहले ही उनके ना होने की खबर सुननी पड़ेगी।र
राजशेखर सर जैसे लोग सिर्फ पत्रकार नहीं होते, वे अपने साथ एक पूरा दौर, एक भाषा और एक आत्मीयता लेकर चलते हैं।
उनका जाना व्यक्तिगत क्षति जैसा लग रहा है विनम्र श्रद्धांजलि।