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दिल्ली

केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देकर 27.3 एकड़ में फैला हजारों करोड़ कीमत का जिमखाना क्लब खाली करने का आदेश दिया!

White colonial-style government building with flagpoles, a vintage green-and-yellow taxi parked in front, and people near the entrance.

शीतल पी सिंह-

दुनिया की सबसे बड़ी ग़रीबों की आबादी वाले देश का प्रधानमंत्री आखिर कितना बड़ा “घर” चाहता है?

भारत की प्रति व्यक्ति आय दुनिया के विकसित देशों की तुलना में बहुत ही कम है। करोड़ों लोग किराये के घरों, झुग्गियों, अधूरी कॉलोनियों और गांवों की टूटी छतों में जीवन काट रहे हैं। लेकिन इसी देश की राजधानी के सबसे महंगे हिस्से में सत्ता का भूगोल लगातार फैलता जा रहा है।

अब ताज़ा मामला है दिल्ली के ऐतिहासिक Delhi Gymkhana Club का।

केंद्र सरकार ने आदेश दिया है कि 27.3 एकड़ में फैला यह क्लब 5 जून 2026 तक अपनी जमीन सरकार को सौंप दे, क्योंकि यह इलाका “राष्ट्रीय सुरक्षा”, “डिफेंस इंफ्रास्ट्रक्चर” और “पब्लिक सिक्योरिटी” के लिए जरूरी है।

दिलचस्प बात यह है कि यही क्लब प्रधानमंत्री आवास 7 Lok Kalyan Marg के बिल्कुल बगल में स्थित है।

सवाल उठना स्वाभाविक है: आखिर एक ऐसे प्रधानमंत्री को, जिनका कोई पारिवारिक उत्तराधिकार नहीं है, राजधानी के हृदय में कितनी जमीन चाहिए?

पिछले वर्षों में प्रधानमंत्री सुरक्षा क्षेत्र के नाम पर कई सरकारी बंगले पहले ही सुरक्षा घेरे में समाहित किए जा चुके हैं। अब जिमखाना क्लब पर कार्रवाई ने इस आशंका को और मजबूत किया है कि लुटियंस दिल्ली का बड़ा हिस्सा धीरे-धीरे एक विस्तारित सत्ता-परिसर में बदला जा रहा है।

सरकार “राष्ट्रीय सुरक्षा” कहती है। आलोचक पूछते हैं — सुरक्षा कहाँ खत्म होती है और सत्ता का विस्तार कहाँ शुरू होता है?

और अब ज़रा इस जमीन की कीमत समझिए।

दिल्ली के प्रीमियम सेंट्रल ज़ोन में जमीन की कीमत लगभग ₹180 करोड़ से ₹220 करोड़ प्रति एकड़ या उससे भी अधिक बताई जा रही है।

यदि इसी आधार पर दिल्ली जिमखाना क्लब की 27.3 एकड़ जमीन का अनुमान लगाया जाए, तो इसकी कीमत लगभग: ₹4,900 करोड़ से ₹6,000 करोड़+ बैठती है।

यानी एक ऐसा भूखंड जिसकी कीमत कई छोटे राज्यों के वार्षिक शहरी विकास बजट के बराबर हो सकती है।

और यह सब उस देश में हो रहा है जहाँ: लाखों युवाओं के पास रोजगार नहीं, शहरों में सस्ती आवास योजना अधूरी, किसान कर्ज़ में, और मध्यम वर्ग EMI तथा महंगाई में पिस रहा है।

दिल्ली जिमखाना क्लब की अपनी आलोचनाएँ भी रही हैं। यह औपनिवेशिक दौर का अभिजात्य क्लब था, जिसकी सदस्यता दशकों तक सत्ता, नौकरशाही और ऊँचे वर्ग के नेटवर्क का प्रतीक बनी रही। इसकी membership waiting list पर Reddit और अन्य मंचों पर लोग 20–30 वर्षों तक प्रतीक्षा की बातें करते रहे हैं।

लेकिन प्रश्न यह नहीं है कि Gymkhana elite था या नहीं। प्रश्न यह है: क्या लोकतंत्र में हर “elite space” का अंत अंततः राज्य के और भी बड़े elite space में होना चाहिए?

ब्रिटिश साम्राज्य ने दिल्ली के बीचोंबीच सत्ता का एक सामंती नक्शा बनाया था। विडंबना देखिए — आज उसी क्षेत्र में लोकतांत्रिक भारत की सत्ता पहले से भी अधिक विशाल, अधिक नियंत्रित और अधिक बंद होती जा रही है।

कभी कहा जाता था कि प्रधानमंत्री “प्रधान सेवक” है। लेकिन अगर प्रधान सेवक के लिए हजारों करोड़ की जमीन, दर्जनों बंगले, विस्तारित सुरक्षा क्षेत्र और लगातार फैलता हुआ सत्ता परिसर चाहिए — तो फिर राजा और प्रधान सेवक में फर्क कहाँ बचता है?

दिल्ली जिमखाना की कहानी सिर्फ़ एक क्लब की कहानी नहीं है। यह पिछले बारह सालों में बनाए गए नए भारत की कहानी है !

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