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सुख-दुख

चैनल7 में राजशेखर भैय्या ने तब मेरी टाइपिंग देख माथा पकड़ लिया, बोले- ‘अबे ओ अंग्रेज, ये हिन्दी चैनल है, इतना फास्ट अंगरेजिया बतिया रहे हो’, फिर..

निमिष कुमार-

ऐसे थे हमारे राजशेखर भैय्या, Channel-7 ‘ज़िंदगी लाइव’ वाले

Facebook ने परेशान करना शुरू किया, कारण- कुछ हाईप्रोफाइल फोटो डाल दिए थे। खुद ही डिलिट कर दिए facebook वालों ने। गजब है। लड़कर अपने एकाउंट का कंट्रोल वापस लिया, तो Vikas Mishra जी की पोस्ट सामने आई। पढ़ा तो भरोसा ही नहीं हुआ। अब भी नहीं हो रहा है। राजशेखर भैया चले गए। विकास जी ने भैय्या और उन्हें अग्नि को समर्पित करते का फोटो डाल दिया। दिमाग सुन्न है।

Male reporter holding a microphone with news channel logos in a newsroom setting; looking at camera with glasses and mustache

दो दशक से ज्यादा वक्त हो गया, जब पहली बार उन से सामना हुआ। चैनल-7 के न्यूजरूम में। HR से ज्वाइनिंग की सारी खानापूर्ति करके, HR मैनेजर राधा से गपियाके, एचआर ऑफिसर लड़के से दोस्ती गांठकर जब न्यूजरूम पहुंचा, तो बॉस Sanjeev Paliwal सर को रिपोर्ट किया। ‘ज्वाइन कर लिया?’ जाओ राजशेखर से मिलो। फिर खुद ही केबिन से आए, और उन्हें आवाज देकर बुलाया और कहा- ये निमिष है, तुम्हारे साथ रहेंगे। देखो।’ और संजीव सर पलटकर केबिन में चले गए। न्यूजरूम में चर्चा होती थी, संजीव सर को कभी किसी ने हंसते देखा है? मुस्कराते हुए?

तो हम हैंडओवर कर दिए गए राजशेखर भैय्या के। उन्होंने बाकी फौज से मिलवाया- ये अनुराग, ये अतुल, ये हेमंत और तमाम लड़कियां। पूछा- टाइपिंग आती है। अपन ने उत्साह से सर हिलाया। डेक्सटॉप दिया गया और हम लिखना शुरू। राजशेखर भैय्या ने माथा पकड़ लिया- अबे ओ अंग्रेज, ये हिन्दी चैनल है, इतना फास्ट अंगरेजिया बतिया रहे हो, हिन्दी आती है या नहीं। हिन्दी … समझे किसे कहते हैं। हिन्दी। अपनी हवा टाइट। जो साथियों को जिम्मा दिया गया, इसकी हिन्दी टाइप अंग्रेजी जैसे करवाओ। एक हफ्ते में हमने हिन्दी में गति पकड़ी और दूसरे हफ्ते से शुरू हो गए धांय धांय लिखना।

वो हमारे line manager थे आज की भाषा में। मतलब कब आना, कब जाना, कब छुट्टी लेना, सब राजशेखर भैय्या के हवाले। जल्दी ही समझ गए कि अपन भारतीय मीडिया में ‘अनाथ’ हैं, याने बिना Godfather वाले। ना किसी मंत्री, बड़े नेता के फोन से आए, ना किसी बड़े स्वंयभू संपादक की सिफारिश से। तो राजशेखर भैय्या ही हमारे God brother हो गए। खूब संभाला। खूब।

चैनल्स के न्यूजरूम दरअसल निकृस्टतम राजनीति का अखाड़ा होते हैं, दुनिया भर में। BBC हो या CNN, सब जगह हालात एक समान। हिन्दी पत्रकारिता में जबरदस्त गुटबाजी होती है, तो वो वहां भी थी। अरे यूपी के ही भतेरे गुट थे, बरेली गुट, बनारस गुट, गोरखपुर गुट और जाने क्या-क्या। राजशेखर भैय्या ये राजनीति नहीं करते थे, लेकिन समझते बहुत अच्छे से। उन्होंने न्यूजरूम की उस घटिया, टुच्ची, गंद मारती राजनीति के हर मोहरे को लेकर समझाया- बेटा (जब भावुक हो जाते थे, तो ऐसे ही बात करते) समझ। नौकरी बचानी है, तो ये सब समझ।

अपन रडार पर थे। बिना Godfather वाले। पूरा एक साल नाइट शिफ्ट में भेज दिया गया। नियम था- 15 दिन से ज्यादा कोई नाइट शिफ्ट नहीं करेगा। ये labour law था, लेकिन किसी को वहां घंटा फर्क पड़ता।

राजशेखर भैय्या ने समझाया- टिके रहो। तप कर निकलोगे तो सोना बन जाओगे। दुश्मनों के वार से भी फायदा ले लो। और अपन ने वही किया। खूब सिखा। सबसे पहले आता, क्योंकि प्राइम टाइम की शिफ्ट से चार्ज लेना होता। सबसे बाद में जाता, क्योंकि शिफ्ट की रिपोर्ट बनाकर भेजनी होती। राजशेखर भैय्या ने समझाया- न्यूज गई तेल लेने, ये क्लर्की अच्छे से सीख लो।.. रेडियो से थे, तो वाइस ओवर टेस्ट दिलवाया, अपन पास। राजशेखर भैय्या की सरदर्दी कम हुई। ‘अरे ओ निमीषवा. इन्हां आओ, ये वाइस ओवर करो।’

धीरे-धीरे हालात ये हुए, कि ऊपर वालों ने तक महसूस किया कि चैनल के न्यूज पैकेज में 70 फीसदी एक ही आवाज में होते हैं। कारण था- सारे आउट स्टेशन न्यूज की पैकेजिंग नाइट में होती थी, और अपन एक मात्र वाइस ओवर वाले होते थे। ये राजशेखर भैय्या की सीख थी।

जब कभी अपने को निपटाने की बात होती, वो बोल देते- निकाल दो, लेकिन इतनी लंबी नाइट शिफ्ट कौन करेगा? इतने वाइस ओवर कौन करेगा? पूरी रात काम करके शिफ्ट रिपोर्ट की क्लर्की कौन करेगा? रायटर्स, APTN की अंग्रेजी फीड से हिन्दी न्यूज पैकेज इस अंग्रेज के बाद कौन बनाएगा? बिजनेस की स्टोरियों को कौन बनाएगा? अपनी नौकरी बच जाती।

जब नाइट शिफ्ट में आते, तो सुबह साथ निकलते। उन्हें घर छोड़ते हुए मैं अपने घर निकल जाता। चैनल के मालिक बदले, तो बॉस बदले। न्यूजरूम के समीकरण बदले। अपन Zee News निकल लिए। ZEE Business में। लेकिन राजशेखर भैय्या की सिखाई बातें नहीं भूले।

उनकी कितनी बातें हैं, जो शायद ही कोई जानता होगा। कैसे परिवार, आर्थिक परिस्थितियों के चलते कोई कितना समझौता कर लेता है, जबरदस्त टैलेंट होकर भी नकारो के अधीनस्थ काम करना स्वीकार कर लेता है। उनके नॉलेज, स्क्रिल के सामने बच्चे ठहरने वाले उनसे दुगुनी – तीन गुनी तनख्वाह पाते थे, बड़े पदों पर बैठे थे, लेकिन राजशेखर भैय्या को इन सबसे घंटा कोई फर्क पड़ता था। जब बात होती, हंस कर टाल देते। बाबू, जिंदगी में आगे सब सीख जाओगे।

मुझसे एक अलग ही नाता था- क्योंकि मैं उस बेल्ट से नहीं था, जिस बेल्ट के लोगों की हिन्दी जर्नलिज्म में दादागिरी चलती थी। अपन तो Alice in Wonderland वाली हालत में थे, और राजशेखर भैय्या ये समझ चुके थे। एक और बात थी- मुझसे कुछ भी शेयर करने में कोई खतरा नहीं था, अपन किसी को जानते नहीं थे, ना ही कभी उनके गांव तरफ जाते.. तो बेखौफ होकर बातें बताते। जिस बीमारी की बात अब हो रही है, ये परेशानी उन्हें तब से थी। मैं कई बार उन्हें घर छोड़ते वक्त मेडिकल शॉप से होकर जाता। पूछता- भैय्या इतनी दवा। हंस कर टाल देते। ज़िंदगी बहुत सारी जिम्मेदारियों के साथ आई थी, और राजशेखर भैय्या उन्हें बिना किसी को बताए चुपचाप निभा रहे थे। कोई महत्वाकांक्षा नहीं, ना एंकर बनने की, ना रिपोर्टर बनने की। कहते थे- अरे बस ज़िंदगी चलते रहे।

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