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सुख-दुख

राजशेखर बहुत सहज और ओरिजिनल पीस थे, उन्हें चिता पर लेटा देख कलेजा कचोट उठा!

राजशेखर ने लंबा समय न्यूज 18 इंडिया में बिताया। इंडिया टीवी में लंबे वक्त तक रहे। उनकी प्रतिभा बेजोड़ थी, सोच बेहद साफ थी। स्क्रिप्ट शानदार लिखते थे और इन सब पर भारी थी वायस ओवर के लिए उनकी आवाज…

Man with glasses and mustache wearing a blue striped polo shirt, seated indoors in a neutral room setting.

विकास मिश्रा-

राजशेखर से करीब महीने भर पहले बात हुई थी। बात किसी और मित्र को लेकर थी। एक ऐसे मित्र के बारे में जो बार-बार डिप्रेशन में जाते थे। उनको राजशेखर ने भी समझाया था, मुझसे भी कहा था समझाने को। करीब आधे घंटे तक बातचीत हुई थी, लेकिन राजशेखर ने भनक तक नहीं लगने दी कि एक बड़ी बीमारी उन्हें भीतर से खाने पर आमादा है।

2005 में प्रिंट मीडिया में करीब 10 साल की पारी खेलने के बाद जब मैंने दिल्ली में चैनल-7 (अब न्यूज 18 इंडिया) ज्वाइन किया था, तब राजशेखर से न्यूजरूम में भेंट हुई थी। परिचय हुआ। पता चला कि न सिर्फ गोरखपुर के हैं, बल्कि गोरखपुर वाले हमारे परिवार में भी आना जाना है। कई गुण मिले तो मित्रता भी हो गई। चैनल 7 ज्वाइन करने के बाद मैंने मयूर विहार फेज 3 में किराये पर फ्लैट लिया। राजशेखर तब यहां अकेले रहते थे कई बार मेरे घर आए, भोजन किए, फिर परिवार के सदस्य की तरह ही हो गए। कुछ ही दिन बाद मैंने अपने फ्लैट के पास ही राजशेखर को भी फ्लैट दिलवा दिया।

चैनल-7 छूटा, लेकिन राजशेखर से रिश्ता हमेशा ताजा रहा। हफ्ता नहीं तो 15 दिन में फोन पर बातचीत हो जाती थी। अक्सर मुलाकात भी होती थी। राजशेखर बहुत सहज और ओरिजिनल पीस थे। जो दिल में रहता था, उसे अपनी खरखराती बुलंद आवाज में कह ही देते थे। हंसते-हंसते खरी खरी सुना देते थे। एक बार मैंने न्यूजरूम में कमीनापन करने वाले एक सहकर्मी की बड़ाई कर दी, कह दिया कि बहुत मेहनत करते हैं। राजशेखर ने टोका- अब खेल न बतियावा मरदे।

राजशेखर मुझसे उम्र में करीब दो साल छोटे थे। फोन करके कहते थे- अरे भइया को प्रणाम पहुंचे। लेकिन मेरी पत्नी को वे दुलहिन कहते थे। उनके इस संबोधन पर हमारी पत्नी बहुत खुश होती थीं।

राजशेखर के लिए एक संबोधन अनायास ही बन गया था-लफंदर। दरअसल हुआ यह कि राजशेखर घर खरीदने जा रहे थे, लेकिन हिचक रहे थे। हमारी बात अक्सर भोजपुरी में ही होती थी। फोन पर मुझसे सलाह मांगी। मेरे मुंह से निकला-तोहरे जइसन लफंदर मनई अगर अपने परिवार खातिर घर खरीद लेई त एहसे बड़ा काम परिवार के खातिर और कुछ होई नाहीं। राजशेखर बहुत हंसे इस बात पर। अक्सर फोन पर बात करते कहते- अरे मरदवा ऊ तोहरे मुंहा से लफंदर सुनले बहुत दिन होइ गइल। मैं हंसते हुए कहता- लफंदर तो आप हैं ही।

राजशेखर ने लंबा समय न्यूज 18 इंडिया में बिताया। इंडिया टीवी में लंबे वक्त तक रहे। उनकी प्रतिभा बेजोड़ थी, सोच बेहद साफ थी। स्क्रिप्ट शानदार लिखते थे और इन सब पर भारी थी वायस ओवर के लिए उनकी आवाज। दबकर बहुत वह रह नहीं सकते थे और नौकरी के आखिरी कुछ महीनों में लगा कि आत्मसम्मान दांव पर है, लिहाजा इस्तीफा देकर चले आए।

नौकरी के लिए बहुत जगह प्रयास नहीं किया, बहुत लोगों से कहा भी नहीं। बीच में इंडिया डेली न्यूज चैनल में गए, लेकिन कुछ ही महीने बाद उसे भी छोड़ दिया। कई यू ट्यूब चैनल्स में भी राजशेखर विशेषज्ञ के रूप में नजर आए। वे व्यस्त रहने के लिए कुछ करना चाहते थे, कुछ नया करना चाहते थे। कहते थे कि बच्चे तो अपने भर का कर ही लेते हैं, लेकिन ऐसी स्थिति न हो कि मुझे उनसे कुछ कहना पड़े। फेसबुक पर उन्होंने दास मलूका के तौर पर कुछ वीडियो भी बनाए, लेकिन वह सिलसिला भी रुक गया।

राजशेखर बहुत ही मिलनसार थे, लेकिन विरोधाभास यह भी था कि वे किसी से मिलने जुलने के लिए ज्यादा निकलते भी नहीं थे। पिताजी की मृत्यु के बाद उनके भीतर एक बदलाव भी दिख रहा था। एकांतप्रिय भी हो चले थे। अकेलापन भी उन्हें खा ही रहा था।

राजशेखर के नाम में राज था। उन्होंने राज तो किया, लेकिन बहुत कुछ राज रखा। अपने शरीर के भीतर पलती बीमारी का जिक्र अपने जिगरी मित्रों से भी नहीं किया। मुझसे तक नहीं बताया। लंबे समय तक अस्पताल में भर्ती थे, लेकिन बताया तक नहीं। शुक्रवार की सुबह मुकुंद शाही का फोन आया। पूछा-दादा राजशेखर भाई के बारे में सुने..? एक सेकेंड में मुझे लगा कि शायद राजशेखर ने कहीं ज्वाइन कर लिया, लेकिन अगले ही पल मुकुंद ने कहा-राजशेखर भाई नहीं रहे। भरोसा नहीं हुआ इस बात पर। सपने में भी नहीं सोच सकता था, लेकिन सच सामने था।

शुक्रवार की दोपहर हम सब नोएडा के श्मशान घाट पर थे। वहां का आलम बता रहा था कि राजशेखर व्यक्ति कैसे थे। चैनल-7 के वक्त के सभी साथी मौजूद थे। संजीव पालीवाल, आशुतोष, संदीप चौधरी, ऋचा अनिरुद्ध, प्रशांत टंडन, प्रभात शुंगलू, अमित पांडेय, दारेन शाहिदी, विक्रांत यादव, समीर अब्बास, स्मिता शर्मा, समीर चटर्जी, अतीत मिश्र…

किस-किस का नाम गिनाऊं, सौ से ज्यादा पत्रकार वहां मौजूद थे। कुछ उनके निजी मित्र थे। अमिताभ श्रीवास्तव, अपूर्व श्रीवास्तव, भड़ास वाले यशवंत, उमेश चतुर्वेदी, कुमार विनोद और साहित्यकार अशोक पांडेय भी वहां पहुंचे थे। सबकी आंखें नम थीं और जुबां पर राजशेखर के ठहाकों का जिक्र, उनसे जुड़े तमाम किस्से। राजशेखर अच्छे स्टोरीटेलर थे। वहीं पता चला अच्छे अभिनेता भी थे।

Large bonfire with burning stacked logs under a pavilion, orange flames licking the wood.
Crowd of people in light-colored traditional Indian clothing standing in a shaded park, with banners along a fence in the background.

राजशेखर की चिता सज चुकी थी, चेहरा खुला हुआ था। जिसके चेहरे पर हमेशा मुस्कान से चश्मा थोड़ा ऊपर चला जाता था, वही शख्स बेजान.. आंखे मूंदे लेटा हुआ था। देखकर कलेजा कचोट उठा। सभी ने चिता पर लकड़ियां रखीं। बड़े बेटे ने मुखाग्नि दी। थोड़ी देर में चिता धधक उठी। राजशेखर भाई देखते ही देखते पंचतत्व में विलीन हो गए और यादों की थाती हम लोगों के लिए छोड़ गए। ईश्वर से प्रार्थना है कि वे इस लफंदर को अपनी शरण में लें और परिवार को दुखों का यह भार वहन करने की क्षमता भी दें।

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