अभिषेक श्रीवास्तव-
(कॉकरोचों के मध्य कामरेड विषयक)
एक बार एक सम्मेलन में हमारे प्रिय कवि असद ज़ैदी ने मरहूम नामवर सिंह के बारे में बड़ी मारक बात बड़ी सहजता के साथ कही थी। यह नामवरजी के गुजरने से पहले का प्रसंग है। उस कार्यक्रम में आयोजक और मॉडरेटर के नाते मैं मंच पर ही था और असदजी वक्ता थे।
वे बोले (मेरी याददाश्त के आधार पर): हर बार नामवरजी किसी के बारे में कुछ बोल देते हैं या कहीं चले जाते हैं, तो लोग हैरत से कहते हैं- अरे, नामवरजी ऐसा कैसे कर सकते हैं? नामवरजी को क्या हो गया है? अरे भाई, नामवरजी यही हैं, ऐसे ही हैं, उन्हें कुछ नहीं हुआ है।
यह प्रसंग मुझे उन लोगों के संदर्भ में याद आया जो कल जंतर मंतर पर दीपांकर भट्टाचार्य के दिखने पर चौंक कर बोल/लिख उठे: अरे, दीपांकर ने ये क्या कर दिया? उन्हें क्या हो गया है? वे ऐसा कैसे कर सकते हैं? एक कम्युनिस्ट पार्टी का महासचिव हाशिये के प्रगतिशीलों में वही कद रखता है जो कद नामवर सिंह का साहित्य के हाशिये पर जीने वाले प्रगतिशीलों के बीच था। साम्य गहरा है, और असद ज़ैदी वाला प्रसंग ही इसका जवाब है। दीपांकर ऐसे ही हैं, उन्हें कुछ नहीं हुआ है।

असल में, जब किसी पार्टी की संरचना और उसका कार्यक्रम परस्पर असंगत हो जाता है, तो ऐसे दृश्य सामान्य हो जाते हैं। इससे क्या फर्क पड़ता है कि भाकपा-माले (लिबरेशन), माकपा या कि भाकपा अपनी संरचना में कम्युनिस्ट पार्टियां हैं, यदि उनका प्रोग्राम कम्युनिस्ट नहीं? यही फर्क हर पार्टी को एक ढर्रे पर ले आता है। जब आपके पास अपनी विचारधारा और अपने ढांचे के अनुकूल प्रोग्राम नहीं होगा, तो आप दूसरे के प्रोग्राम में जगह बनाने की कोशिश करेंगे ही। इसको आप टैक्टिक्स कहते हैं। ये वास्तव में आपके प्रोग्राम फ्रंट पर आलस, कल्पनाशीलता के संकट और उद्यमहीनता का परिचायक है।
इस पैमाने पर देश के वाम स्पेक्ट्रम में कौन सा ऐसा संगठन, समूह या दल है जो खुद के कम्युनिस्ट होने का दावा कर सके? दूसरों के लिबरल प्रोग्राम में ताकझांकी, लोकप्रियता की बैसाखी, और झंडे बैनर की लाली से तो ये दावा पुख्ता नहीं हो सकता।
यही हुआ था २०११ में, याद कीजिए, जब माले ने भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में घुसने की कोशिश की और कविता कृष्णन को अन्ना के मंच से धकेल दिया गया था। लोग भूल गए शायद, मैंने लिखा था। दर्ज है। तब भी किसी को अपमानित महसूस नहीं हुआ जब २०१४ के चुनाव के दौरान बनारस में आप पार्टी के एडमिरल रामदास और उनकी पत्नी वामपंथियों की गोले में बैठाकर रामजी राय और सुनील यादव जैसे सीनियर लोगों की हाजिरी ले रहे थे, उनसे परिचय पूछ रहे थे। मैं फ्रस्ट्रेट हो के निकल आया था बाहर, गो कि दोनों पार्टियों से मेरा कोई लेना देना नहीं था। उसी दौरान चारू भवन में दीपांकर से लंबी चर्चा हुई थी अन्ना आंदोलन को लेकर, उस समय भी उनकी वही दलील थी जो आज है। कोई पछतावा नहीं, कोई सबक नहीं।
ये सवाल बिल्कुल अलग है कि कॉकरोच परिघटना क्या है, इसके पीछे कौन है और इसे कैसे समझा जाय। इस पर बात होती रहेगी, अगर यह सिलसिला टिक गया। असल सवाल ये है कि बाकी समूह, जो इस व्यवस्था में प्रतिरोध के मौके, जगहें और वक्त तलाशने में लगे हुए हैं उनके पास अपना सकारात्मक प्रोग्राम क्यों नहीं है? हर दूसरे दिन माले के कार्यालय सचिव का मेल आता है जिसमें औसतन दो पैरा की विज्ञप्ति होती है। उस विज्ञप्ति में केवल घटनाओं की प्रतिक्रिया होती है, पार्टी के अपने प्रोग्राम का कोई जिक्र शायद ही कभी होता हो। ऐसा क्यों?
अब काल कवलित हो चुके हमारे एक पुराने ट्रेनर कहते थे कि हवा चलती है तो तिनके भी उड़ते हैं, जो शांत मौसम में अपनी चालक शक्ति से उड़ सके वो हेलीकॉप्टर है। कहां है लेफ्ट के संगठनों की आंतरिक चालक शक्ति? माना कि देश का युवा असंतुष्ट है, नाराज है, तो उसमें आप क्यों नहीं घुस रहे? किसी केजरीवाल या दीपके को क्यों आना पड़ रहा है? इसलिए क्योंकि प्रोग्राम की दरिद्रता के साथ-साथ आपके संगठन भी मूलतः अलोकतांत्रिक हैं, कम्युनिस्ट नहीं। कम्युनिस्ट ढांचे के नाम पर बरसों लोकतांत्रिक केंद्रीयता के जोर से कार्यकर्ताओं को भरमाते और दबाते रहने का ही नतीजा है कि पार्टी के महासचिव को अब सड़क पर उतर के अपना चेहरा दिखाना पड़ रहा है।
कॉकरोच मोमेंट इन सवालों पर सोचने का मौका दे सकता है, बशर्ते कोई सोचने को राजी हो। कॉकरोचों का क्या होगा इस पर दिमाग खपाने के बजाय ये सोचिए कामरेड दीपांकर, कि ऐतिहासिक रूप से जिन्होंने व्यवस्था की सफाई का राजनीतिक दायित्व अपने हाथों में लिया था, उनके पास आगे का अपना प्रोग्राम क्या है। नहीं है, तो बनाइए, वरना देर हो जाएगी।
वैज्ञानिक तथ्य है कि कॉकरोच कभी भी अकेले नहीं आते। वे अपने साथ ३३ किस्म के अलग-अलग बैक्टीरिया भी लेकर आते हैं। आज तक हम लोग नहीं जान पाए पूरी तरह कि २०११ में जो लोग व्यवस्था बदलने आए थे उनके साथ कौन-कौन से बैक्टीरिया चिपके हुए थे। हां, दूध का जला छाछ फूंक के पीता है, इसीलिए हमारे जैसे लोग पिछले सबक से सचेत हैं। आप न तो सचेत दिखते हैं, न ही डरे हुए।
ये बात परेशान करने वाली है। खासकर उन्हें, जो लोग भले किसी को अपना चेयरमैन नहीं मानते, लेकिन बदलाव के विचार में बेशक अक्षुण्ण आस्था रखते हैं।
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