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इस तरफ़ जाने से पहले इसे ज़रूर पढ़ें : उत्तराखंड में लोहे की सलाखों और जाल से हो रही घायल पहाड़ों की मरहम पट्टी!

पहाड़ यात्रा से लौटे वरिष्ठ पत्रकार अनेहस शाश्वत की रिपोर्ट

अनेहस शाश्वत-

क्या उत्तराखंड में लोहे की सलाखों और जाल से हो रही घायल पहाड़ों की मरहम पट्टी? ये वो सवाल है जो उत्तराखंड की सरकार से पूछा जाना चाहिये लेकिन कोई पूछ नहीं रहा। तब फिर ये सवाल मैं क्यों पूछ रहा हूँ, चलिए आप को बताता हूँ। अभी करीब 15 दिन पहले मैं पहाड़ों की यात्रा पर निकला।

पहाड़ की चार साल पहले की यात्रा से मैं समझ चुका था कि हरिद्वार और ऋषिकेश सरीखे पहाड़ अब मैदान जैसे हो चुके हैं, वही गर्मी बाज़ारों में, वैसी ही भगदड़ और सड़कों पर वैसे ही जाम और हां पर्यटकों के साथ जम कर लूटपाट अलग से। इस विषय पर एक दिन मित्रों से चर्चा चली तो कई ने कहा अब ठण्डक के लिए पहाड़ों पर थोड़ा और ऊपर जाना पड़ता है।

बहुत दिनों से घूमने निकला भी नहीं था सो सोचा कि लाओ जोशी मठ तक चला जाए ठण्डक भी मिलेगी और मन हुआ तो बद्रीनाथ तक भी चला जाएगा। बस साहब यहीं से नए अनुभवों और मुसीबतों की नई यात्रा शुरू हुई।

इस यात्रा से मेरी समझ में आया कि दरअसल पहाड़ यात्रा का पूरा सीन ही अब बदल चुका है, जिसके बहुत बुरे परिणाम पर्यावरण के लिहाज से पहाड़ों को भोगने पड़ रहे हैं और स्थितियां जैसी बन गई हैं उनमें सुधार नहीं हुआ तो पहाड़ों पर भीषण भूस्खलन का बहुत लंबा दौर चलेगा।

सबसे बड़ा बदलाव जो पहाड़ों की यात्रा में आया है वो ये है कि अब लोगों ने अपनी गाड़ियों से पहाड़ों की यात्रा करनी शुरू कर दी है और सरकारी बसें अब इक्का दुक्का ही दिखती हैं। नतीजे में पहाड़ पर आप कहीं भी जाएं आपको हजारों गाड़ियों के जाम में कहीं भी फंसना पड़ सकता है। खुद मैं हरिद्वार से जोशी मठ तक की यात्रा में कई जगह घंटों-घंटों जाम में फंसा रहा।

जाहिर सी बात है जब इतनी गाड़ियां चलेंगी तो उसमें से निकला पेट्रोल और डीजल का धुंआ प्रदूषण फैलाएगा ही। नतीजे में अब आपको पहाड़ों पर ठंडी हवा के झोंके नहीं वरन पेट्रोल और डीजल के धुएं से गंधाती हवा के झोंके मिलेंगे। अब जब इतने यात्री पहाड़ों पर पहुंच रहे हैं तो उनके रुकने की व्यवस्था भी होगी ही। नतीजे में सारे पहाड़ पांच से सात मंज़िल तक के होटलों से पटे पड़े हैं हिमालय जो कि सबसे कच्चा पहाड़ माना जाता है वहां पर इतने सारे और सात मंज़िल तक के होटल बनाने की स्वीकृति किसने और कैसे दी, ये भी एक सवाल है जिसका जवाब कोई देने को तैयार नहीं।

Steep rocky hillside reinforced with white safety netting beside a road; orange warning sign on a striped post.
जनता की आँखों में धूल झोंककर कमाई कर रही धामी सरकार

जब इस सवाल का जवाब कोई देने को तैयार नहीं तो ये भी जानिए पहाड़ों पर अत्यधिक दबाव से भूस्खलन का दौर जब शुरू होगा और लाखों जाने जाएंगी तो उसका जवाब भी कोई नहीं देगा.. तय जानिए। जहाँ तक मुझे याद आता है चार धाम यात्रा का कॉन्सेप्ट ये था कि जीवन के सारे काम निपटा देने के बाद न्यूनतम संसाधनों के साथ चार धाम यात्रा का प्रावधान धार्मिक लिहाज से था। निश्चित रूप से हमारे पूर्वजों में ये समझ रही होगी कि हिमालय जैसे कच्चे पहाड़ पर जितना कम बोझ डाला जाए उतना ही बेहतर।

अब सनातन के इस नए हल्ले में जब संसाधन भी भरपूर है जिसको देखो वही भक्ति भाव से नहीं पर्यटक भाव से चार धाम यात्रा करने निकल पड़ा है। नतीजे में पहाड़ पर आप कहीं भी जाएं, शोर है गंदगी है भगदड़ है और लंबे-लंबे जाम हैं। अब चूंकि भक्ति भाव है ही नहीं तो बाजारों में लूट का माहौल है। खराब क्वालिटी का बेकार खाना आपको बेहद महंगे दाम पर मिलता है उसी को भक्ति भाव या पर्यटक भाव जिस भाव से चाहें खाने की मजबूरी आपको पूरी पहाड़ यात्रा में देखने को मिलेगी, इससे बचने का कोई उपाय नहीं है।

ऐसा नहीं है कि प्रकृति अपने ऊपर हो रहे इस अत्याचार की शिकायत नहीं कर रही। खूब कर रही है और दिखावे के तौर पर उसका इलाज भी किया जा रहा है लेकिन इस इलाज से किसकी आँखों में धूल झोंकने का प्रयास हो रहा है, ये कोई नहीं बताने वाला। हरिद्वार से जोशी मठ की यात्रा के दौरान आपको पहाड़ों की पूरी की पूरी चेन दिखेगी जिसको लोहे के बड़े-बड़े सरियों और लोहे के ही जाल से रोकने की कोशिश की जा रही है। अब ये मुझे नहीं मालूम कि ये टेक्नोलॉजी भूस्खलन रोकने में कितनी कारगर है लेकिन इतना जरूर मालूम है कि लोहे के बड़े बड़े सरियों और जाल के माध्यम से भूस्खलन रोकने की नौबत अगर आ गई है तो स्थिति सच में गंभीर है।

मुझे नहीं लगता लोहे के सरिये और जाल अगर पहाड़ गिरता है तो उसे रोक पाएंगे। वैसे भी दो चार पहाड़ हों तो भी गनीमत, वहां तो पूरी की पूरी पहाड़ों की श्रृंखला को ही लोहे के सरियों और जाल से रोकने की कोशिश हो रही है। ये स्थिति गंभीर है और संकेत दे रही है कि पहाड़ों को बचाने की गंभीर शुरुआत होनी चाहिए। लेकिन पहाड़ों पर जो माहौल है और पर्यटन और धार्मिक यात्राओं को बढ़ावा देकर पैसे कमाने की जो होड़ है उससे लगता नहीं कि पहाड़ बचेंगे।

कहना तो नहीं चाहता था लेकिन सनद रहे इसलिए कह रहा हूं पहाड़ों पर भारी भूस्खलन के भीषण दौर के लिए तैयार रहिए और इस बात के लिए भी कि उस दौर में सरकारी सहायता नहीं के बराबर लोगों तक पहुंचेगी। वैसे भी जो सरकारें हिमालय जैसे कच्चे पहाड़ पर अंधाधुंध सात सात मंज़िल के होटल स्वीकृत कर रही हैं, वो अपनी ही बुलाई आपदा में किसी की क्या ही मदद करेंगी।

लेखक अनेहस शाश्वत वरिष्ठ पत्रकार हैं, कई अख़बारों में वरिष्ठ पदों पर कार्यरत रहे हैं, लखनऊ में स्थायी निवास है.

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