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फ्लेवर्ड ORS के कारोबार के खिलाफ अकेले खड़ी रही इस बाल रोग विशेषज्ञ को सिस्टम ने हरा दिया!

Headline: 'Tired of fighting alone': Doctor who campaigned against fake ORS goes off Instagram; collage shows a woman doctor and a spoon with powder over a glass of water, logo top-right.

नाज़िया खान-

हैदराबाद की प्रसिद्ध बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. शिवरंजनी संतोष ने आठ साल तक लगातार लड़ाई लड़ी। उनका बस यह कहना था कि स्टैंडर्ड WHO फॉर्मूला को जो फॉलो करे, उसे ही ORS कहा जाए, न कि हर फैंसी ड्रिंक को। आजकल कितने ही फ्रूट-बेस्ड, भर-भर के शुगर वाले ड्रिंक्स ख़ुद को Oral Rehydration Solution बताकर बेच रहे हैं।

अब वे थक चुकी हैं। हाल ही में उन्होंने इंस्टाग्राम छोड़ दिया और IAP से इस्तीफ़ा दे दिया। उन्होंने कहा, “मैं अकेले लड़ते-लड़ते थक गई हूँ। जिस तरह से IAP मेरे साथ व्यवहार कर रहा है, वह असहनीय है।”

ORS डायरिया और डिहाइड्रेशन के इलाज के लिए दुनिया का सबसे सस्ता और प्रभावी उपाय है। WHO द्वारा तय किया गया इसका सही फॉर्मूला सोडियम, पोटैशियम, ग्लूकोज़ और पानी का सटीक अनुपात होता है। यह आंतों में पानी और नमक के अवशोषण को बढ़ाता है और जान बचाता है।

लेकिन कई कंपनियां फलों के कन्सन्ट्रेट, आर्टिफिशियल फ्लेवर्स, बहुत सारी शुगर और दूसरी चीज़ें मिलाकर अलग-अलग फ्लेवर वाले ORS, Smart ORS, Hydra ORS अलाने-फ़लाने नामों से बेच रही हैं।

ये ड्रिंक्स WHO स्टैंडर्ड फॉर्मूला नहीं होते हैं और दस्त में बच्चों को देने पर हालत और बिगाड़ देते हैं।

ज़्यादा शुगर ऑस्मोटिक प्रेशर बढ़ा देती है, जिससे शरीर से और ज़्यादा पानी खिंच जाता है। नतीजा, दस्त बढ़ना, डिहाइड्रेशन की कंडीशन गंभीर होना और जान तक पर बन सकती है।

डॉ. संतोष ने देखा कि उनके क्लीनिक में डायरिया वाले बच्चों की हालत ORS लेने के बाद भी ख़राब हो रही थी। उन्होंने सिर्फ़ सोशल मीडिया पर ही अवेयरनेस नहीं फैलाई, उन्होंने तीन जनहित याचिकाएं भी लगाईं, FSSAI को लेटर लिखा, कोर्ट से लेकर हैल्थ मिनिस्ट्री तक, जहाँ, जो हो सकता था, वहाँ तक पहुँचीं।

फिर अक्टूबर 2025 में FSSAI ने देशव्यापी आदेश जारी किया कि केवल WHO स्टैंडर्ड वाले असली ORS ही “ORS” नाम का इस्तेमाल कर सकते हैं। फल-आधारित या नॉन-स्टैंडर्ड ड्रिंक्स पर यह नाम प्रतिबंधित है।

यह एक बड़ी जीत थी, लेकिन कंपनियों का कार्टल कम है के। सब लूप होल निकालना पता हैं उन्हें। बस फिर हुआ यह कि ब्रांडिंग बदलकर (जैसे ORSL, EZRL आदि) फिर से भ्रम पैदा करने की कोशिश की।

डॉ. संतोष ने IAP सम्मेलन में ऐसी कंपनियों के स्टॉल के ख़िलाफ़ भी आवाज़ उठाई, लेकिन सपोर्ट ही नहीं मिला।

वे चाहतीं तो मोटी फ़ीस लेकर एसी चैंबर में प्रेस्क्रिप्शन लिखती रहतीं बाक़ी सब डॉक्टर्स की तरह। क्यों सुख की जान दुःख में डाली हमारे बच्चों के लिये। क्योंकि उनको लगा कि वे कर सकती हैं, इसलिये किया।

ऐसी एक-एक आवाज़ लाखों बच्चों की जान बचा सकती है। उम्मीद तो नहीं है कि सर कारी एजेंसियां और मेडिकल संस्थाएं इस दिशा में कोई ठोस क़दम उठाएंगी।

ख़ैर, लेकिन पैरेंट्स के लिए ज़रूरी सलाह है कि असली ORS, WHO फॉर्मूला वाले ही ख़रीदें। फैंसी पैकेट वाले “ORS ड्रिंक”, फ्लेवर्ड इलेक्ट्रोलाइट या फ्रूट बेस्ड ड्रिंक्स दस्त में न दें।

आज हर फील्ड में यही हालत है कि सुधीजन ख़ामोश होते जा रहे हैं। समझदारी, बुद्धिमानी ख़तरनाक है। चुप रहने में ही भलाई है। यहीं देख लीजिये, आप कोई हैल्थ टिप्स देंगे, लोग यह समझने लगेंगे कि आप अपनी ब्रांडिंग कर रहे हैं, प्रमोशन कर रहे हैं, अपनी दुकानदारी जमाने की फ़िराक़ में हैं, तो मन करता है, छोड़ो यार भाड़ में जाए सब परोपकार। जिसे जो करना है करे, पर फिर दिल नहीं मानता। बच्चों का दुःख तो वैसे ही नहीं देखा जाता। लगता है किसी का भला हो जाए तो क्या ही बुराई है। बाक़ी तो सब एक्सपर्ट हैं ही, सबको सब आता है।

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