संजय कुमार सिंह
आज के अखबारों की लीड तृणमूल कांग्रेस संसदीय दल की टूट पर खबर होनी चाहिए थी। भारतीय नाविकों के लापता होने पर अमेरिका का विरोध, प्रधानमंत्री का शोक संदेश भी होना चाहिए था। पर सिर्फ खबर है कि लापता नाविक मारे गए। अमेरिकी हमले में नाविकों का मारा जाना उनकी मौत भर नहीं है, अमेरिका से भारत के संबंधों पर सवाल भी है। अमेरिका भारत के साथ कैसा व्यवहार कर रहा है, क्यों कर रहा है उससे संबंधित एक नया सवाल है। लेकिन अखबारों में जवाब नहीं है। सोशल मीडिया पर किसी ने लिखा है, हमले में मौत कहना वैसे ही है जैसे कहा जाए कि डकैती हुई थी, वह थैला खो गया जिसमें सारा माल रखा था। देश में जो राजनीतिक स्थिति है, मीडिया का जो हाल बना दिया गया है उसमें सरकार का समर्थन कोई नई बात नहीं है। अफसोस इसका है कि तीन नाविकों के निधन पर प्रधानमंत्री ने शोक संदेश जारी नहीं किया है। अमेरिका से बात तो नहीं ही की है। विश्व गुरु का यह हाल चौंकाता है पर खबर नहीं है और उन्हीं अखबारों में नहीं है जहां होटल में आग लगने से विदेशियों की मौत पर शोक जताने और मरने वालों को दो लाख तथा घायलों को 50 हजार का मुआवजा दिए जाने की खबर पहले पन्ने पर प्रमुखता से थी। इसकी जगह अमर उजाला ने आज लिखा है, भारत की अमेरिका को चेतावनी – नाविकों की सुरक्षा के साथ कोई समझौता नहीं। मुझे लगता है कि अमेरिकी हमले में अगर भारतीय नाविक मारे गए तो इसीलिए कि अमेरिका को अपनी चिन्ता थी और अब जो कहा गया है या छपा है उसका कोई मतलब नहीं है, अमेरिका अपनी सुरक्षा से तो समझौता नहीं ही करेगा। दूसरी ओर, पहले हम कहीं भी युद्ध रुकवा देने का दावा करते थे अब ट्रम्प से बात नहीं कर पा रहे हैं कि वह ईरान को बख्श दे या लड़े-मरे, भारत को बख्श दे। युद्ध सबके लिए बुरा है, का ज्ञान अगर ट्रम्प को नहीं दिया जा सकता है तो काहे के विश्व गुरु और नहीं बनें तो कैसे बनेंगे? लेकिन अखबारों में यह सब नहीं हो सकता है और नहीं है। नहीं होना तो सब जानते हैं लेकिन विदेश मंत्रालय ने कहा – हमले चिन्ताजनक, तुरंत रोकें। ठीक है कि जो खबर है उससे जुड़ी चीजें कैसे छोड़ दी जाएं लेकिन कांग्रेस से जुड़ी खबर में कांग्रेस का पक्ष छोड़ दिया जाता है या छूट जाता है। मैंने यहां इसपर लिखा भी है। उदाहरण भी मिल जाएंगे।
मुझे लगता है कि टीएमसी सांसदों को अपने पाले में करने की भाजपा की कोशिश, ऑपरेशन लोटस मुश्किल में है। सांसद कीर्ति आजाद ने लिखा है कि उन पर दबाव डालने के लिए उनकी सुरक्षा वापस ले ली गई है। फिर भी वे डरने-झुकने वाले नहीं हैं। शत्रुघ्न सिन्हा ने कहा है कि वे ममता बनर्जी के साथ ही रहेंगे क्योंकि जब वे पटना से चुनाव हार गए या उन्हें हराया गया तो ममता दीदी ने ही उन्हें मौका दिया। कहने की जरूरत नहीं है इसमें भाजपा से नाराजगी भी होगी और यह सब खबर नहीं है। लेकिन ऑपरेशन लोटस के शुरुआती संकेत सोमवार को आए थे और गुरुवार तक लोकसभा सांसदों के मामले में कुछ हुआ नहीं तो खबर बनती है। द टेलीग्राफ में खबर है भी लेकिन दिल्ली के अखबारों में नहीं है। कहा जा सकता है कि बंगाल की खबर दिल्ली में पहले पन्ने पर क्यों हो। यह ठीक भी है लेकिन भाजपा की जरूरत हो या उसका हित साधना हो तो मद्रास (चेन्नई) की खबर भी पहले पन्ने पर छपती रही है। लगातार कई दिनों तक। अगर यह खबर नहीं है तो खबर यह भी है कि मोदी सरकार अपने ही किए में फंस गई है। 2029 जीतना उसके लिए जरूरी है और 2029 जीतना सुनिश्चित करने के लिए वह जो सब कर रही है या उसे करना पड़ रहा है उसमें वह विपक्ष की नाराजगी तो बढ़ा ही रही है उसके नए, मजबूत विरोधी सामने आ रहे हैं। शत्रुघ्न सिन्हा इनमें एक नजर आ रहे हैं। कीर्ति आजाद पहले से मैदान में हैं। भाजपा के बिहारी सांसद पानी डालने की कोशिश में हैं यह खबर भले नहीं है लेकिन सार्वजनिक है।
देशबन्धु की आज की लीड के अनुसार, कांग्रेस ने देश भर के अपने प्रभारियों और प्रदेश अध्यक्षों की बैठक की और इसमें मोदी सरकार के खिलाफ आंदोलन करने की रणनीति तैयार की गई है। इसी महीने के अंतिम सप्ताह से मोदी सरकार के खिलाफ देशव्यापी अभियान शुरू करने का निर्णय किया गया है। राज्यसभा चुनाव के लिए मीनाक्षी नटराजन का पर्चा खारिज किए जाने से राहुल गांधी खासे नाराज हैं – यह दिख रहा है और उन्होंने कहा है कि (भाजपा ने) अब वोट चोरी के बाद सीट चोरी कर ली। आपत्तिजनक या चिन्ता की बात यह है कि भाजपा का इको सिस्टम इसे सही ठहराने या कांग्रेस के विरोध को गलत बताने की कोशिश कर रहा है। इसलिए इस समय मीडिया की बड़ी और महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती थी लेकिन वह विज्ञापनों के लिए लार टपकाता रहता है। नवोदय टाइम्स में टीएमसी की खबर लीड के बराबर में है लेकिन शीर्षक वह नहीं है जो खबर है या जिसकी चर्चा मैंने ऊपर की है। शीर्षक है, टीएमसी और टूटी। राज्यसभा सदस्यों के इस्तीफे की खबर है लेकिन लोकसभा में टीएमसी से अलग टीएमसी का समूह नहीं हो सकता है इसलिए अलग हुए दलों को कांग्रेस में विलय करना होगा। संख्या पूरी होनी चाहिए सो अलग है। कल आए बयानों से संख्या पर शक है और टूटा हुआ समूह अगर रक्षा के लिए या डर कर भाजपा में मिलने जा रहा है तो इस बात की भी संभावना है कि पूरे तृणमूल का विलय कांग्रेस में हो जाए। यह कानून और संख्या का मामला है और आज इस पर खबर होनी चाहिए थी लेकिन सिर्फ द टेलीग्राफ में पहले पन्ने पर है। टीएमसी की खबर जिन अखबारों में है सबने लिखा है टीएमसी के मतभेद बढ़ रहे हैं। लेकिन कांग्रेस में विलय पर सहमति हो सकती है या नहीं उसपर कोई चर्चा नहीं है।
दि एशियन एज की खबर का शीर्षक है, टीएमसी की दरार गहरी हुई राज्यसभा के तीसरे सांसद ने इस्तीफा दिया, कल्याण बनर्जी ने अभिषेक बनर्जी पर निशाना साधा। द टेलीग्राफ की खबर और उसके जरिए ऑपरेशन लोटस का हाल बताने से पहले बता दूं कि आज मेरे ज्यादातर अखबारों की लीड भारतीय नाविकों के मारे जाने की खबर ही है। इनमें हिन्दुस्तान टाइम्स, टाइम्स ऑफ इंडिया, इंडियन एक्सप्रेस, द हिन्दू, दि एशियन एज, अमर उजाला और नवोदय टाइम्स शामिल है। देशबन्धु के लीड की चर्चा कर चुका हूं। इसी तरह, दैनिक भास्कर के पहले पन्ने की लीड भी आज दूसरे अखबारों से अलग है। लीड मध्य प्रदेश राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार का पर्चा खारिज कर दिए जाने पर जारी विवाद के बारे में है तो (तृणमूल के) बागी माने जा रहे शत्रुघ्न की खबर भी है कि वे ममता बनर्जी के साथ हैं। द टेलीग्राफ में तृणमूल कांग्रेस से जुड़ी तीन अलग खबरें हैं। एक सूचना यह भी है कि जब फुटबॉल वर्ल्ड कप चल रहा है तब तृणमूल कांग्रेस में भी एक दूसरे को फुटबॉल बनाने का काम चल रहा है। इस खबर के अनुसार तृणमूल में चार हिस्से हो गए हैं। कल्याण बनर्जी कह रहे हैं, अभिषेक या मैं, ममता बनर्जी अलग थलग या अकेली या बाकी बचे साथियों के साथ पार्टी प्रमुख हैं ही। एक-एक समूह काकोली और ऋतुब्रत का भी है। इनमें ऋतुब्रत का मामला विधायकों का या कलकत्ता का है। क्या है, कितना है – यह अभी स्पष्ट नहीं है लेकिन कानून ऐसा है कि लोकसभा में तृणमूल का दूसरा समूह नहीं हो सकता है। अगर अलग हुए तो सदस्यता जाएगी और सुरक्षा के लिए विलय जरूरी है तो कांग्रेस में ममता बनर्जी समेत विलय का रास्ता भी है। उधर राज्य सभा के सदस्य इस्तीफा दे रहे हैं लेकिन उनका मामला अलग है। खाली जगह भरने के लिए उपचुनाव होंगे तो विधायक सांसद ही वोट देंगे और ज्यादातर भाजपा समर्थक हो गए हैं तो यही जीत जाएंगे या भाजपा जिसे चाहेगी उसे जिता लेगी। वैसे ही जैसे मीनाक्षी नटराजन को हरा दिया। इसलिए राज्य सभा से तृणमूल सांसदों के इस्तीफे का बहुत मतलब नहीं है लेकिन लोकसभा से इस्तीफा नहीं हुआ है और 20 सांसदों का समूह एकजुट नहीं है। कइयों ने मना कर दिया है। इसलिए क्या होगा, राम जानें पर कुछ नहीं हो रहा है यह खबर तो है ही और इसीलिए द टेलीग्राफ ने आधे पन्ने से ज्यादा जगह दी है और चीजों को ठीक से समझाया भी है लेकिन बाकी जो है सो गोदी वाला है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


