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उत्तर प्रदेश

यूपी में मौर्य, आजाद और ओवैसी का गठबंधन यदि जमीन पर उतरता है, तो सबसे बड़ा नुकसान किसे होगा?

यूपी की सियासत में तीसरा मोर्चा का ‘खेला’

अजय कुमार-

उत्तर प्रदेश की राजनीति का मिजाज इन दिनों फिर से करवट ले रहा है। लखनऊ की गलियों से लेकर दिल्ली के राजनीतिक गलियारों तक, चर्चा इस बात की है कि क्या 2027 के विधानसभा चुनाव में मतदाता केवल दो विकल्पों के बीच सिमट कर रह जाएंगे, या फिर एक तीसरा विकल्प इतिहास लिखने को तैयार है। स्वामी प्रसाद मौर्य, चंद्रशेखर आजाद ‘रावण’ और असदुद्दीन ओवैसी ये तीन नाम आज प्रदेश की सियासत में ‘त्रिकोण’ बनाने की संभावनाओं को हवा दे रहे हैं।

यह महज कोई सामान्य गठबंधन की कवायद नहीं, बल्कि उन जातीय और सांप्रदायिक समीकरणों को फिर से बुनने की कोशिश है, जिन्होंने दशकों से उत्तर प्रदेश की सत्ता की धुरी तय की है। स्वामी प्रसाद मौर्य, जिन्होंने अपनी पूरी राजनीतिक जीवन यात्रा मायावती से लेकर अखिलेश और योगी के साथ गुजारने के बाद अब ‘लोक मोर्चा’ के झंडे तले अपना नया घर बनाया है, वे अब एक ऐसे मास्टरस्ट्रोक की तलाश में हैं जो उन्हें सत्ता की दहलीज तक ले जाए।

मौर्य का अनुभव प्रदेश के उस ‘ओबीसी’ वोट बैंक की नस-नस से वाकिफ है, जिसे कभी सपा तो कभी भाजपा अपना गढ़ मानती रही है। उनका यह तर्क कि ‘जनसंख्या के अनुपात में हिस्सेदारी’ ही राजनीति का असली मंत्र है, उन्हें हाशिए पर खड़े उन छोटे दलों के लिए एक मसीहा के रूप में पेश कर रहा है जो बड़ी पार्टियों में खुद को खोया हुआ महसूस करते थे। लेकिन, राजनीति केवल दावों से नहीं चलती।

इस गणित में सबसे महत्वपूर्ण कड़ी बनकर उभरे हैं चंद्रशेखर आजाद। नगीना लोकसभा सीट पर जो चमत्कार आजाद ने किया, उसने न केवल मायावती की बसपा की नींव हिला दी, बल्कि यह भी साबित कर दिया कि दलित राजनीति अब एक नए चेहरे की तलाश में है। नगीना में जब आजाद ने 51 फीसदी वोट के साथ भाजपा के किले को ढहाया, तो यह महज एक जीत नहीं थी, यह दलित-मुस्लिम गठजोड़ की वह ताकत थी जिसने यूपी के पुराने सियासी पंडितों को भी सोचने पर मजबूर कर दिया।

अब सवाल यह है कि क्या स्वामी प्रसाद मौर्य का ओबीसी अनुभव, आजाद का दलित जनाधार और ओवैसी की मुस्लिम मुखरता मिलकर एक ऐसा ‘डिस्कंपोर्ट’ पैदा कर पाएंगे जो सत्ता के इन दो बड़े ध्रुवों को हिला दे? ओवैसी की एंट्री इस समीकरण में एक ऐसा तड़का है जो सीधे तौर पर अखिलेश यादव के परंपरागत मुस्लिम वोट बैंक में सेंध लगाने की क्षमता रखता है। बहराइच की मतेरा सीट से ओवैसी का चुनावी शंखनाद करना महज इत्तेफाक नहीं था। उन्होंने साफ कर दिया है कि मुसलमान अब किसी भी पार्टी का ‘वोट बैंक’ नहीं, बल्कि ‘हिस्सेदार’ है।

जब ओवैसी कहते हैं कि वे बराबरी की बात करेंगे, तो उनका इशारा स्पष्ट होता है कि वे किसी भी गठबंधन में जूनियर पार्टनर बनकर रहने को तैयार नहीं हैं। राजनीति की बिसात पर यह तीसरा मोर्चा जितना आकर्षक दिखता है, जमीनी हकीकत उतनी ही पेचीदा है।

उत्तर प्रदेश की चुनावी फिजा में जब भी विपक्ष बंटा है, भाजपा को उसका सीधा लाभ मिला है। 2024 के लोकसभा परिणामों को देखें तो यह स्पष्ट है कि ध्रुवीकरण की राजनीति ने किस तरह से परिणामों को एकतरफा झुकाया। यदि मौर्य, आजाद और ओवैसी का गठबंधन वाकई जमीन पर उतरता है, तो इसका सबसे बड़ा नुकसान किसे होगा? राजनीतिक जानकारों का मानना है कि ‘पीडीए’ का नारा देने वाली समाजवादी पार्टी के लिए यह सबसे बड़ी सिरदर्द बन सकता है।

जो वोट बैंक कभी सपा की मजबूती हुआ करता था, वही अब इन तीनों के आने से बिखरता हुआ दिखाई देता है। लेकिन क्या यह बिखराव अंततः भाजपा को एक और बड़ी जीत की राह दिखाएगा, या फिर यह तीसरा मोर्चा वास्तव में एक ‘किंगमेकर’ की भूमिका निभा पाएगा?

स्वामी प्रसाद मौर्य की राजनीतिक यात्रा किसी रोमांचक फिल्म से कम नहीं रही है। उन्होंने हर उस विचारधारा को जिया है जिसका प्रदेश की सियासत पर गहरा असर रहा है। आज जब वे खुद को मुख्यमंत्री पद का दावेदार पेश कर रहे हैं, तो लोग उनके पुराने फैसलों पर भी सवाल उठा रहे हैं। क्या जनता उनके साथ है, या वे केवल छोटे दलों का एक समूह बनाकर अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता बचाए रखने की कोशिश कर रहे हैं?

वहीं दूसरी ओर, चंद्रशेखर आजाद की युवा ऊर्जा उन्हें दलितों के बीच एक नया चेहरा बनाती है, लेकिन क्या वे इस ऊर्जा को पूरे यूपी के बड़े दायरे में फैला पाएंगे, यह समय की सबसे बड़ी चुनौती है। इस खेल में सबसे दिलचस्प बात यह है कि ये तीनों नेता अपने-अपने क्षेत्र में प्रभावशाली तो हैं, लेकिन पूरे राज्यव्यापी स्तर पर एक मजबूत संगठन खड़ा करना एक अलग ही चुनौती है। ओवैसी का ‘एआईएमआईएम’ फैक्टर, जिसे अक्सर भाजपा की ‘बी-टीम’ होने का आरोप झेलना पड़ता है, इस गठबंधन के लिए एक दोधारी तलवार की तरह है। एक तरफ यह उन्हें मुस्लिम वोटों में पैठ दिलाता है, तो दूसरी तरफ सामान्य मतदाताओं के बीच एक ध्रुवीकरण का डर भी पैदा करता है।

अगर यह मोर्चा बनता है, तो 2027 के चुनाव में वोट प्रतिशत का जो गणित होगा, वह यकीनन पुराने सभी रिकॉर्ड तोड़ देगा। भाजपा के लिए यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या वह अपने पुराने ‘हिंदुत्व’ के फॉर्मूले पर टिकी रहेगी या इन छोटे दलों के उभरते प्रभाव को रोकने के लिए अपनी रणनीति में कोई नया बदलाव करेगी।

अतीत की ओर देखें तो उत्तर प्रदेश ने कई बार तीसरे मोर्चे की कोशिशें देखी हैं, लेकिन अधिकांश समय ये प्रयोग केवल वोट काटने वाली मशीनों तक सीमित रह गए। हालांकि, इस बार का परिदृश्य थोड़ा अलग है। दलित, मुस्लिम और ओबीसी का एक ऐसा संगम तैयार करने की कोशिश हो रही है जो न तो किसी के सामने झुकना चाहता है और न ही किसी के पीछे चलना चाहता है।

स्वामी प्रसाद मौर्य ने जिस तरह से ‘लोक मोर्चा’ के माध्यम से छोटे दलों को एकजुट करने का बीड़ा उठाया है, वह यह दिखाता है कि इस बार वे एक लंबी तैयारी के साथ मैदान में उतरे हैं। आजाद का युवाओं पर असर और ओवैसी की आक्रामक शैली इस गठबंधन को एक आक्रामक तेवर दे रही है। चुनावों के अभी कुछ महीने बाकी हैं, लेकिन राजनीतिक रस्साकशी अभी से शुरू हो चुकी है। क्या यह तीसरा मोर्चा सिर्फ एक शोर बनकर रह जाएगा, या सचमुच यह यूपी की दो-ध्रुवीय राजनीति को त्रिकोणीय मुकाबले में बदलकर रख देगा? जवाब इस बात पर निर्भर करेगा कि क्या ये तीनों नेता अपने व्यक्तिगत अहंकार से ऊपर उठकर एक साझा न्यूनतम कार्यक्रम पर सहमत हो पाते हैं या नहीं।

उत्तर प्रदेश की जनता हमेशा से सरप्राइज देने के लिए जानी जाती है। कभी वह किसी एक दल को पूर्ण बहुमत देती है, तो कभी छोटे दलों के साथ मिलकर सत्ता का समीकरण बदल देती है। ऐसे में मौर्य, आजाद और ओवैसी की यह नई जुगलबंदी अगर धरातल पर आकार लेती है, तो निश्चित रूप से यह आने वाले विधानसभा चुनाव को बेहद दिलचस्प और रोमांचक मोड़ पर लाकर खड़ा कर देगी। अब देखना यह है कि यह ‘त्रिकोण’ वाकई भाजपा के लिए खतरे की घंटी बनता है या फिर खुद अपनी ही महत्वाकांक्षाओं के बोझ तले दबकर बिखर जाता है।

इतिहास गवाह है, यूपी की सियासत में ‘तीसरे मोर्चे’ की राह हमेशा से कांटों भरी रही है, लेकिन जिस तरह से ये तीनों नेता अपनी ताकत दिखा रहे हैं, यह साफ है कि आने वाले समय में प्रदेश की राजनीति में एक नए तूफान के संकेत मिल रहे हैं।

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