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हिंदी के मुखर विरोधी रहे इंडियन एक्सप्रेस को हिंदी का नया चैनल लाने की क्या मजबूरी रही?

Portrait of a middle-aged man with a gray beard, looking down.

प्रेमपाल शर्मा-

मीडिया/नया चैनल! अब इंडियन एक्सप्रेस अंग्रेजी की बात हिंदी उर्फ हिंदुस्तानी में! ऐसा ही दावा किया है “हम इंडियन एक्सप्रेस में छपे विद्वानों के विचारों को संक्षिप्त में हिंदुस्तानी जबान में प्रस्तुत करते हैं! वाह क्या बात है!

कई दिन तक सुनते देखते ऐसा लग रहा है मानो विद्वान सिर्फ अंग्रेजी में ही होते हैं और वह भी केवल और केवल इंडियन एक्सप्रेस में। इंडियन एक्सप्रेस मेरा भी प्रिय अखबार रहा है दिल्ली में, जब से 1977 में पहुंचा। लेकिन सभी अंग्रेजी अखबारों की तरह इसमें भी मैंने हिंदी के प्रति विरोध बहुत मुखर देखा है। जब भी शिक्षा में हिंदी माध्यम की बात हुई हो इंजीनियरिंग कॉलेज में मेडिकल में बाइलिंगुअल पढ़ने पढ़ाने की बात शुरू भी हुई हो.. इंडियन एक्सप्रेस अपनी बंदूक तलवार तोप.. लेकर टूट पड़ता है.

क्लास में जाकर झूठे सच्चे सर्वे करता है ..किताबों को जांचता है.. संपादकीय लिखता है और ऐसा माहौल खड़ा कर देता है कि यूपी के मुलायम सिंह भी चुप हो जाते हैं, अटल बिहारी वाजपेई, लालू, चंद्रशेखर..भी और अंग्रेजी का रथ ऐसी तेजी से बढ़ता जाता है कि आज अंग्रेजी के बूते शिक्षण सरकारी 90% से घटकर 40% तक आ गया है।

खैर, यह मसला अलग रहा. मेरा सिर्फ इतना कहना है क्या विद्वान सिर्फ अंग्रेजी में ही होते हैं? इंडियन एक्सप्रेस में शिक्षा विद कृष्ण कुमार को छोड़कर शायद ही कभी हिंदी का कोई छपता हो। छोटे-मोटे लेख जरूर मृणाल पांडे, अपूर्वानंद.. आदि के। क्योंकि इसके संपादक भी ज्यादातर कट्टर अंग्रेजी वाले रहे हैं शेखर गुप्ता को छोड़कर। अरुण शौरी भी अपनी भाषाओं के प्रति सहनशील रहे लेकिन मौजूदा संपादक तो अंग्रेजी के जाने-माने उपन्यासकार भी हैं। उत्तर भारतीय होने के बावजूद भी उनका हिंदी के प्रति हिंदुस्तानियत के प्रति विरोध कई मंचों पर देखा गया है।

अंग्रेजी में लिखने वाले के चेहरे पर भी कुछ अलग नशा होता है और इस नशे के बूते यह पूरे देश पर हुकूमत भी चलाते हैं। लेकिन अब इनके धंधेबाजों को यह समझ आ गया है की करोड़ों की जनता तो हिंदी के पक्ष में है हिंदुस्तानियत के पक्ष में है इसलिए उनको अंग्रेजी की कैरेट लॉली दिखाकर धंधा बढ़ाया जाए। धंधे के लिए हिंदी हिंदुस्तानी! सत्ता पावर कोर्ट कचहरी प्रशासन के लिए उन्हीं अंग्रेजों की भाषा। इसी चपेट में यह नया चैनल आया है।

आपको लगता है यह हिंदी या हिंदुस्तानियत के प्रचार के लिए है? नहीं! यह नई पीढ़ी को कह रहा है कि अंग्रेजी में इंडियन एक्सप्रेस पढ़ो! सारे विद्वान तो यहां हैं ..और यह वे विद्वान है जिनकी भाषा मुश्किल से पांच प्रतिशत लोग जानते हैं। लेकिन उन्हीं बातों को अंग्रेजी में झाड़कर शिक्षा और देश पर पूरी तरह से हावी है।

और केवल यही अख़बार नहीं दैनिक भास्कर… आदि को भी विद्वान नजर आते हैं तो केवल अंग्रेजी वाले और चिड़िया की बीट की तरह उनकी छोटी-छोटी टिप्पणियां उर्फ ज्ञान/आवाज छाप कर अपने को धन्य मानते है!

क्या 70-80 करोड़ के हिंदी प्रदेश प्रतिभा.. विद्वान विहीन हो गए हैं? और क्या दूसरी भारतीय भाषाओं में भी कुछ अच्छा नहीं लिखा जा रहा? जिस भाषा को अधिकांश जनता बोलती समझती ना हो और जो नौकरी की तलाश में केवल वातानुकूल कक्ष तक शहरी अमीरों के बीच तक सीमित हो क्या वे इसकी जमीनी यथार्थ और उसकी समस्याओं को समझ सकते हैं? सुलझाने का दावा कर सकते हैं?

चुनौती हिंदी में लिखने वालों के लिए भी हैं कि वे राजनीतिक पार्टियों के पिछलग्गू बनकर केवल धर्म और जाति के विमर्श से खुद को बाहर निकाले! विश्वविद्यालय में पढ़ाने वाले गलत अंग्रेजी बोलने की बजाय अपनी भाषा में बोलने पढ़ने का साहस दिखाएं! नया चैनल कृपया विचार करे!

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