रवीश रंजन शुक्ला-
प्रियदर्शन सर हम लोग उनको PD सर पुकारते हैं..
25 साल NDTV INDIA में काम करने के बाद मंगलवार को रिटायर हो गए.. बेहतरीन पत्रकार, सम्मानित साहित्यकार, सिनेमा और क्रिकेट समेत लगभग सभी विषयों पर ज़बरदस्त जानकार…उससे भी ज़्यादा उनकी शिष्टाचार भरी खबरों की लेखनी…
किसी भी विषय पर कम शब्दों में कैसे नपी तुली अच्छी भाषा में खबर लिखनी है..उनसे बेहतर शायद ही कोई था…OnAir जाने से पहले हम लोगों की अनगिनत स्क्रिप्ट और डाक्यूमेंट्री वही चेक करते थे…कई बार डाँट भी खाई.. लेकिन मजाल है न्यूज़ फ्लोर पर कभी उन्होंने तेज आवाज में किसी से बात भी की होगी…


बक़ौल संकेत उपाध्याय वो NDTV के ChatPD थे…NDTV में लंबे समय तक आउटपुट हेड रहे..सबसे अच्छी बात लगती थी कि आउटपुट हेड होने के बावजूद हम जैसे जूनियर्स पर अपनी बात कभी थोपते नहीं थे..कई बार खबरों को लेकर उनसे हम लोगों की बहस भी होती थी…लेकिन ज्यादातर वक्त PD सर बिना किसी वरिष्ठता के अहंकार के हम लोगों की बात मान लेते थे..फैक्ट से कभी समझौता नहीं करते थे लेकिन स्क्रिप्ट पर खुलकर बहस करने की आज़ादी देते थे।
उनके इस आज़ाद ख्याली के वटवृक्ष के नीचे मेरा भी NDTV में 18 साल से बॉस और सहयोगी वाला रिश्ता रहा…आगे भी जब कभी किसी बौद्धिक संकट के दौर से गुज़रूँगा तब PD Sir का मार्गदर्शन लेता रहूँगा।
संजय किशोर-
शब्द, सानिध्य और समय की गवाही: हमारे पीडी सर के नाम एक विदाई पत्र
मन इस वक्त एक गहरी व्यक्तिगत क्षति से गुजर रहा है। ऐसे समय में शब्द भी अक्सर साथ छोड़ देते हैं। लेकिन आज प्रियदर्शन सर की सेवानिवृत्ति की खबर ने कलम को रुकने नहीं दिया। कुछ लोग आपकी जिंदगी में इतने गहरे दर्ज होते हैं कि उनके बारे में लिखने के लिए दिमाग को ज़्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ती, दिल खुद-ब-खुद शब्द चुन लेता है।
सबसे पहले तो प्रियदर्शन जी को इस बात की बधाई कि उन्होंने आखिरकार रिटायर होना स्वीकार कर लिया। बकौल अजय जी, उन्होंने रांची हाईकोर्ट से अपनी उम्र पर शायद कोई स्टे ऑर्डर ले रखा था। दो दशकों तक उनकी वही ऊर्जा, वही जिज्ञासा, वही सहज मुस्कान देखकर कई बार लगता था कि यह मज़ाक पूरी तरह निराधार भी नहीं है।
करीब बीस वर्षों तक एनडीटीवी में उनके साथ काम करने का अवसर मिला। अवसर कहना शायद पर्याप्त नहीं होगा, वह उनका सानिध्य था। न्यूज़रूम के शोर, भागदौड़, तनाव और डेडलाइन के बीच मुझे याद नहीं आता कि मैंने मुश्किल से दो-तीन बार से ज़्यादा उन्हें कभी ऊँची आवाज़ में बोलते सुना हो। नाराज़ भी होते थे तो बस कुछ क्षणों के लिए। और उनकी यही खूबी थी कि आप उनसे बहुत देर तक नाराज़ रह ही नहीं सकते थे।
प्रियदर्शन जी उन विरले लोगों में हैं जिनकी पहचान किसी एक संस्था या पद से नहीं बनती। वे मूलतः साहित्यकार हैं, पत्रकार बाद में। जहाँ अधिकांश लोग न्यूज़रूम की आपाधापी में अपनी रचनात्मकता कहीं पीछे छोड़ आते हैं, वहीं उन्होंने कहानी, उपन्यास, कविता, आलोचना, सिनेमा और मीडिया विमर्श के क्षेत्र में उल्लेखनीय काम किया। सत्रह पुस्तकों का लेखन कोई उपलब्धि भर नहीं, बल्कि एक लंबी साधना है।
उनका उपन्यास ‘ज़िंदगी लाइव’ मीडिया की दुनिया का ऐसा दस्तावेज़ है जिसमें न्यूज़रूम की चमक, बेचैनी, द्वंद्व और मानवीय संघर्ष सब एक साथ दिखाई देते हैं। ‘नष्ट कुछ भी नहीं होता’ और ‘यह जो काया की माया है’ जैसी काव्य कृतियाँ उनके भीतर के संवेदनशील कवि का परिचय देती हैं। वहीं ‘ग्लोबल समय में गद्य’ और ‘ग्लोबल समय में कविता’ जैसी पुस्तकें बताती हैं कि वे केवल रचनाकार नहीं, अपने समय के गंभीर व्याख्याकार भी हैं।
पत्रकारिता में भी उन्होंने कभी आसान रास्ता नहीं चुना। जब टेलीविजन पत्रकारिता धीरे-धीरे शोर और सनसनी की ओर बढ़ रही थी, तब भी वे शब्द, विचार और संवाद की गरिमा को बचाए रखने वालों में रहे। लोकतंत्र, समाज, मीडिया और संस्कृति पर उनकी दृष्टि हमेशा गहरी, संतुलित और विचारपूर्ण रही।
उन्होंने कभी खबरों को बेचा नहीं, हमेशा उन्हें समझा और समझाया। उनकी सबसे बड़ी ताकत शायद उनका ज्ञान नहीं, बल्कि उनकी विनम्रता है। अंग्रेज़ी साहित्य के विद्यार्थी रहे प्रियदर्शन जी हिंदी के उन दुर्लभ लोगों में हैं जो सलमान रुश्दी और अरुंधति रॉय जैसे लेखकों का अनुवाद भी कर सकते हैं और किसी युवा रिपोर्टर की कॉपी पर उतनी ही गंभीरता से सुझाव भी दे सकते हैं।
उनसे बातचीत करने का भी अपना अलग अंदाज़ था। सामने वाले को यह महसूस कराना कि उसकी बात महत्वपूर्ण है, शायद उनकी सबसे बड़ी मानवीय विशेषताओं में से एक थी। महिला सहकर्मियों के बीच उनकी लोकप्रियता को लेकर न्यूज़रूम में हल्की-फुल्की चुहल भी होती रहती थी, लेकिन सच यह था कि लोग उनके ज्ञान से जितना प्रभावित होते थे, उनकी विनम्रता और संवाद की संस्कृति से उससे कहीं अधिक प्रभावित होते थे। वे पूरी तन्मयता से किसी की बात सुनते और उसी दौरान उतनी ही एकाग्रता से अपना काम भी करते रहते थे। यह दुर्लभ गुण था।
किसी भी विषय पर कुछ ही मिनटों में एक मुकम्मल और विचारपूर्ण लेख लिख देने की उनकी क्षमता देखकर कई बार लगता था कि वे चलते-फिरते विश्वकोश हैं। फर्क सिर्फ इतना था कि उनके ज्ञान में अनुभव की गर्माहट, संवेदना की नमी और जीवन की गहरी समझ भी शामिल थी।
न्यूज़रूम में आने वाली पीढ़ियों ने उनसे सिर्फ़ पत्रकारिता नहीं सीखी, बल्कि यह भी सीखा कि विद्वता का सबसे सुंदर रूप विनम्रता होती है। ज्ञान जब अपनी सर्वोच्च अवस्था में पहुँचता है तो वह अहंकार नहीं, सहजता बन जाता है और प्रियदर्शन जी इसका जीवंत उदाहरण हैं।
प्रियदर्शन सर, न्यूज़रूम में आपकी कुर्सी कल किसी और के हिस्से में चली जाएगी, लेकिन आपकी मौजूदगी की जो जगह हमारे भीतर बनी है, वह खाली ही रहेगी।
रिटायरमेंट नौकरी से होता है, प्रभाव से नहीं। आपकी जिज्ञासा, आपकी दृष्टि, आपकी भाषा, आपकी मुस्कान और आपकी विनम्रता हम सबके साथ बनी रहेगी। आप उन लोगों में हैं जो किसी दफ़्तर से विदा तो होते हैं, लेकिन स्मृतियों से कभी नहीं जाते।
आपको स्वस्थ, सक्रिय और रचनात्मक जीवन के अगले अध्याय के लिए ढेरों शुभकामनाएँ। न्यूज़रूम आपको मिस करेगा। हिंदी साहित्य, गंभीर पत्रकारिता और हम जैसे आपके पाठकों को अभी आपसे बहुत कुछ पाना बाकी है। आपकी कलम का यह नया सफ़र और भी समृद्ध, सार्थक और दूरगामी हो।



