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उत्तर प्रदेश

लखनऊ अग्निकांड : चप्पे चप्पे पर हैं भ्रष्ट अफसरों के ‘एटीएम’!

18 मासूमों के जिंदा जलने के बाद भी नहीं रुकेगी काली कमाई

Crowd gathers as firefighters work at a partially collapsed multi-story building, with a crane and rescue ladders in use.

अश्विनी कुमार श्रीवास्तव-

कानून भले ही अंधा हो, लेकिन हमारा ‘सिस्टम’ अंधा नहीं है। वह अपना ‘एटीएम’ बहुत अच्छी तरह पहचानता है। वीरेंद्र शुक्ला लखनऊ के एक बड़े कॉलेज रामेश्वरम इंस्टिट्यूट (RITM) या उस जली हुई अवैध इमारत का मालिक ही नहीं है; वह असल में एलडीए (LDA), नगर निगम, फायर विभाग और राजनेताओं का एक चलता – फिरता ‘एटीएम’ है।

ज़रा सोचिये, राजधानी लखनऊ में इतना बड़ा लेकिन अवैध कमर्शियल सेटअप बिना फायर एनओसी (NOC) और बिना कमर्शियल नक्शा पास कराए कैसे चल रहा था? यह सिस्टम की कोई चूक या लापरवाही नहीं थी, यह तो भ्रष्ट अफसरों की काली कमाई का एक मजबूत ठिकाना था।

दुख तो इसी बात का है कि ऐसे ठिकाने एक दो नहीं हैं बल्कि हर शहर की हर गली मोहल्ले बाजार यानी चप्पे चप्पे पर हैं। ऐसे ठिकानों को चलाने के लिए हर विकास प्राधिकरण और विभाग में ऊपर से नीचे तक एक ‘रेट कार्ड’ फिक्स है। इस रेट कार्ड के हिसाब से भुगतान करने के बाद शुक्ला जैसे रसूखदार लोग नियम कानूनों की धज्जियां उड़ाने के बाद भी कोई अपराधी नहीं रह जाते, बल्कि इस सिस्टम के वीआईपी (VIP) कस्टमर बन जाते हैं।

भ्रष्ट अफसरों और नेताओं के पास मौजूद अकूत काले धन, आलीशान बंगले, फार्म हाउस, जमीन, सोना चांदी, हीरे जवाहरात, लग्जरी गाड़ियां, देश विदेश के ऐशो-आराम और चुनावी फंड का इंतजाम ऐसे ही लोग करते हैं। जो व्यक्ति सालों से भ्रष्ट तंत्र की तिजोरी में भर भर कर योगदान दे रहा हो, उसे नियम-कानूनों का डर क्यों होगा? उसने तो वह कीमत पहले ही चुका दी है, जिसके जरिए उसे आम लोगों की जान से खेलने या उनका माल हड़पने का ‘लाइसेंस’ मिल जाता है।

जो इस सिस्टम की ताकत से वाकिफ हैं, उन्हें पता है कि 18 युवाओं की चिताएं जलने के बाद भी शुक्ला का कुछ नहीं बिगड़ेगा। न ही सरकारी तंत्र के भ्रष्ट और हत्यारे अफसरों का कुछ खास नुकसान होगा।

महज छिटपुट गिरफ्तारी, कुछ निलंबन या SIT जांच आदि का परंपरागत ड्रामा देखकर या हादसे की जगह पर पहुंचकर घड़ियाली आंसू बहाने अथवा दोषियों को सजा दिलाने वाले नेताओं की बयानबाजी से अगर आप किसी मुगालते में हैं, तो इसका मतलब यह है कि यूपी के भ्रष्ट तंत्र से आप वाकिफ नहीं हैं।

ऐसे हर मामले की एक सेट स्क्रिप्ट होती है, जो अब प्ले होना शुरू हो चुकी है। सबसे पहले, जनता का गुस्सा ठंडा करने के लिए एलडीए या फायर विभाग के किसी छोटे-मोटे बाबू या जेई (JE) / अफसर को सस्पेंड कर दिया जाता है, जो कि ऑलरेडी हो चुका है। उन्हें अस्थाई तौर पर ‘बलि का बकरा’ बनाकर बड़े अफसर और भ्रष्टाचार की मांद में बैठ कर असली मलाई खाने वाले मगरमच्छ साफ बच निकलते हैं।

इसके बाद शुरू होता है असली खेल। सिस्टम अपने एटीएम को कभी बंद नहीं होने देता। अगर शुक्ला पर आंच आई, तो उन सफेदपोशों और बड़े अफसरों के राज भी खुलेंगे, जिनकी जेबें उसने बरसों से गर्म करके अकूत कमाई की है। इसलिए, अब शुक्ला की उसी अकूत कमाई से पुलिस, प्रशासन और लीगल सिस्टम को खरीदने के इंतजाम किए जाएंगे। थानों में ऐसी सेटिंग होगी कि एफआईआर (FIR) की ड्राफ्टिंग में जानबूझकर तकनीकी खामियां छोड़ी जाएं। फिर महंगे वकीलों की फौज इसे अदालत में तारीखों के अंतहीन जाल में उलझा देगी, ताकि कुछ महीनों बाद जनता इस हादसे को भूल जाए।

यह उम्मीद पालना कि 18 मासूमों की मौत से यूपी का भ्रष्ट तंत्र रातों-रात सुधर जाएगा, कोरी भावुकता है। सच्चाई यही है कि जब तक सिस्टम को इन ‘एटीएम’ से कैश मिलता रहेगा, तब तक आम आदमी की जिंदगी बस अगले हादसे का इंतज़ार करती रहेगी।

कुछ दिन बाद इस भयावह हादसे की फाइलें भी दब जाएंगी, नियम कानूनों की धज्जियां उड़ाने की बोलियां भ्रष्ट अफसरों के कमरों में यूं ही लगती रहेंगी। इस हादसे की राख के मलबे पर फिर से अवैध निर्माण होगा या नियम कानूनों की धज्जियां उड़ेंगी ताकि फिर उस समय मौजूद भ्रष्ट अफसरों की काली कमाई का इंतजाम हो जाए।

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