नई दिल्ली। देशभर में E20 (20% एथेनॉल मिश्रित) पेट्रोल को लेकर उठे विवाद के बीच सोशल मीडिया और टीवी चैनलों पर यह दावा किया जा रहा है कि इसकी नींव कांग्रेस सरकार ने रखी थी, इसलिए मौजूदा सरकार को दोष देना गलत है। लेकिन उपलब्ध आधिकारिक दस्तावेजों और नीति-निर्णयों की पड़ताल बताती है कि यह दावा आधा सच है और पूरे विवाद की जिम्मेदारी केवल कांग्रेस पर डालना तथ्यों से मेल नहीं खाता।
क्या कांग्रेस ने शुरू की थी एथेनॉल ब्लेंडिंग?
हां, भारत में एथेनॉल ब्लेंडेड पेट्रोल (EBP) कार्यक्रम की शुरुआत वर्ष 2003 में तत्कालीन अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने पायलट परियोजना के रूप में की थी। इसके बाद 2004-2014 के बीच कांग्रेस नीत यूपीए सरकार ने इसे सीमित स्तर पर आगे बढ़ाया और 5% तथा बाद में 10% ब्लेंडिंग का लक्ष्य रखा।
यानी एथेनॉल मिश्रण की अवधारणा नई नहीं है और इसकी शुरुआत भी कांग्रेस ने नहीं बल्कि एनडीए सरकार के समय हुई थी। कांग्रेस ने इसे जारी रखा।
E20 किसने लागू किया?
यहीं सबसे बड़ा अंतर है। 20% एथेनॉल मिश्रण (E20) का लक्ष्य, उसकी समयसीमा, देशव्यापी विस्तार और अप्रैल 2026 से व्यापक क्रियान्वयन का फैसला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार के कार्यकाल में हुआ। केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी और सरकार ने कई वर्षों से E20 को बढ़ावा दिया तथा इसे ऊर्जा सुरक्षा और आयातित तेल पर निर्भरता कम करने की नीति का अहम हिस्सा बताया।
विवाद क्यों बढ़ा?
हाल के दिनों में बड़ी संख्या में वाहन मालिकों ने सोशल मीडिया पर आरोप लगाए कि E20 पेट्रोल से माइलेज कम हो रहा है और पुराने वाहनों में दिक्कतें आ रही हैं। इस बीच अदालत में सुनवाई के दौरान एटॉर्नी जनरल की “एक्सपेरिमेंट” संबंधी टिप्पणी भी विवाद का कारण बनी, हालांकि बाद में सरकार ने स्पष्ट किया कि नीति को प्रयोग नहीं कहा गया था।
सरकार और ऑटोमोबाइल कंपनियां लगातार दावा कर रही हैं कि E20 से इंजन को नुकसान होने का कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं मिला है, हालांकि वे यह स्वीकार करती हैं कि माइलेज में लगभग 3-3.5% तक कमी आ सकती है।
क्या सरकार अब बचाव में है?
विवाद बढ़ने के बाद सरकार ने सार्वजनिक रूप से E20 के पक्ष में अभियान तेज किया है। सरकार ने इंजन खराब होने, अधिक पानी की खपत और अन्य वायरल दावों को “मिथक” बताते हुए उनका खंडन जारी किया।
टीवी बहसों और सोशल मीडिया पर यह कहना कि “E20 कांग्रेस की देन है, इसलिए मौजूदा सरकार जिम्मेदार नहीं”, तथ्यात्मक रूप से अधूरा दावा है।
एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम की शुरुआत 2003 में हुई और अलग-अलग सरकारों ने इसे आगे बढ़ाया।
लेकिन E20 को राष्ट्रीय स्तर पर लागू करने, उसकी समयसीमा तय करने और व्यापक क्रियान्वयन की जिम्मेदारी मौजूदा केंद्र सरकार की है।
इसलिए E20 से जुड़े मौजूदा विवाद और उसके परिणामों की राजनीतिक तथा प्रशासनिक जवाबदेही भी वर्तमान सरकार से अलग नहीं की जा सकती।
दूसरे शब्दों में, पुरानी नीति की शुरुआत और वर्तमान स्वरूप में उसके क्रियान्वयन—ये दो अलग-अलग तथ्य हैं। केवल पहले तथ्य का हवाला देकर दूसरे की जिम्मेदारी से बचना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं माना जा सकता।
इथेनॉल के मुद्दे फिर फ़िलहाल गडकरी को चुप रहने को कहा गया है : सूत्र
कुछ पालतू पत्रकारों को काम पर लगाया गया है।
-उमाशंकर सिंह, वरिष्ठ पत्रकार
E20 पर बवाल के बाद ऐसे लोगों को ड्यूटी पर लगाया गया है कि इथेनॉल वाले पेट्रोल के लिए ठीकरा UPA सरकार पर फोड़ो. ये सब अब थेथरॉलॉजी कर रहे हैं.
E20 UPA सरकार ने थोपा था क्या?
इतने सालों से गडकरी इथेनॉल की डुगडुगी बजा रहे थे. मोदी सरकार ने 2030 के रोल आउट प्लान को साल पहले लागू कर दिया. इसमें UPA सरकार का क्या हाथ है?
-अजीत अंजुम

इथनॉल मिश्रित पेट्रोल से गाड़ियां हाँफ रही है…कई जगह खड़ी हो रही है…अगर आप इस समस्या से निजात चाहे तो पेट्रोल भरवाये इथनॉल मुक्त जिसकी कीमत है मात्र 167.35₹ प्रति लीटर।
बाक़ी इथनॉल मंत्री जी की जय क्योंकि ना तो उनको इथनॉल मिश्रित तेल भरवाना है ना कहीं उनकी गाड़ियों का टोल लगना है।
फोकट क्लास तो आम जनता है…गाड़ी के तब रोड़ टैक्स दे फिर सड़क पर चलने का टोल टैक्स दे…गाड़ी खड़ी करने का पार्किंग दे…इथनॉल मिक्स तेल भरवाये और हल्की गलती पर चालान भी दे।
वाह गडकरी जी वाह अद्भुत शानदार जिंदाबाद
-विवेक श्रीवास्तव



