सुभाष सिंह सुमन-
नायरा प्राइवेट कंपनी है। प्राइवेट में अभी सबसे ज्यादा पेट्रोल पंप इसी के हैं भारत में। आज से इसने पेट्रोल 5 रुपये और डीजल 3 रुपये लीटर सस्ता कर दिया है। कारण कि क्रूड ऑयल सस्ता हो गया है।
जब क्रूड महंगा हुआ था, नायरा ने दाम इतना ही बढ़ाया था। पेट्रोल पर 5 रुपये और डीजल पर 3 रुपये। मतलब जितना बढ़ाया, उतना घटा दिया अब इसने। लेकिन सरकारी कंपनियाँ कम नहीं करेंगी। जबकि क्रूड अब युद्ध से पहले के लेवल पर नहीं आया सिर्फ, उससे भी सस्ता हो गया।
आज 70 डॉलर के करीब आया हुआ है भाव। सरकारी कंपनियों ने बढ़ाया भी इससे अधिक था। 7.50 रुपये लीटर। रोना था कि घाटा हो रहा था।
आप सिंपल ये सोचो कि कोई प्राइवेट कंपनी कम से कम घाटे का सौदा नहीं करेगी। उसे टैक्स और कमीशन भरकर अब भी मस्त मुनाफा हो रहा है। कल गणित बताया था ही कि एक्चुअल कॉस्ट अब 50-52 रुपये लीटर रह गया है। इससे ऊपर जो है, वो टैक्स है और कंपनियों का मुनाफा है।
सरल शब्दों में निष्कर्ष है कि हमारी सरकार शुद्ध मुनाफाखोर है। सरकार को आम लोगों के जीने या मरने से कोई फर्क नहीं पड़ता। MJ ने बहुत पहले ऐसी सरकारों का चरित्र कह दिया था:- They don’t care about us…
इसे ऐसे भी पढ़ा जा सकता है कि सरकार ने इंडियन ऑयल, हिंदुस्तान पेट्रोलियम और भारत पेट्रोलियम को BSNL बनाने का इरादा कर लिया है।
28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर अटैक किया। उस दिन ब्रेंट क्रूड का भाव था 72.87 डॉलर प्रति बैरल। फिर मार्च-अप्रैल-मई में तनाव बढ़ता गया। कच्चा तेल भी ऊपर चढ़ता गया। कई बार क्रूड 120 डॉलर तक गया। वहाँ पर टिका नहीं, लेकिन ज्यादातर समय 100 डॉलर से ऊपर ही रहा। जून में बातचीत तेज हुई। अमेरिका और ईरान के बीच स्थाई शांति समझौते की खबर बाहर आयी।

15 जून को ब्रेंट क्रूड 75 डॉलर पर गिर गया। अब आज का बाजार बता रहा है कि ब्रेंट क्रूड 72.56 डॉलर पर है। यानी युद्ध से पहले के स्तर से कुछ नीचे ही। 15 जून को जब इस बारे में लिखा गया कि क्रूड प्री-वॉर लेवल पर आ गया, देश में डीजल-पेट्रोल कब पुराने लेवल पर आयेगा, तो कमलचियों ने तर्क दिया कि नये भाव का असर भारत तक पहुँचने में 12-15 दिन लग जाते हैं।
अब शुद्ध 15 दिन हो गये और अब तो कच्चा तेल युद्ध के पहले वाले स्तर से भी सस्ता हो गया है। लेकिन डीजल-पेट्रोल के भाव कम होने का कोई अपडेट है नहीं मार्केट में।
कुछ लोग इंडियन बास्केट का गीत गा सकते हैं। जो गीत डीजल-पेट्रोल महँगा होने पर गाया जा रहा था कि इंडियन बास्केट तो 150 डॉलर पहुँच गया है। इंडियन बास्केट अब 70.71 डॉलर पर है। 150 डॉलर के पीक के आधे से भी नीचे। इस हिसाब से डीजल-पेट्रोल के भाव कम-से-कम 15-20 रुपये लीटर कम हो जाने चाहिए।
अभी के इंडिया बास्केट के 70 डॉलर के भाव पर गणित करें, पेट्रोल की लागत निकल रही है 52 रुपये। इसमें कच्चा तेल भारत तक लाने, बंदरगाह से रिफाइनरी तक पहुँचाने, रिफाइन करने, रिफाइनरी से पेट्रोल पंप तक पहुँचाने और पेट्रोल पंप डीलर का मार्जिन शामिल है। दिल्ली में पेट्रोल की कीमत अभी है 102.12 रुपये। यानी हर लीटर पेट्रोल पर तेल कंपनियाँ और सरकारें अपनी जेब में 50 रुपये रख रही हैं अब। हमारे बिहार के भाव पर कंपनियों और सरकारों की जेबों में हर लीटर पर 65-65 रुपये जा रहे हैं।
लेकिन डीजल-पेट्रोल सस्ता नहीं होने वाला है। 1-2 रुपये कम कर भी दिये तो बहुत बड़ी बात हो जायेगी। हालाँकि किसी राज्य में चुनाव समीप आने से पहले इसकी भी उम्मीद मत रखिये। एक और सूरत हो सकती है कि जनता का दबाव बने। लेकिन जनता की कितनी परवाह है इस सरकार को? इथेनॉल मिलाकर हमारी-आपकी गाड़ियाँ बर्बाद करने वाली सरकार से परवाह की उम्मीद बेमानी है।
राम के नाम पर लूट मचाने वाली सरकार में एक से बढ़कर डकैत हैं। गन्ना मंत्री से खीरा मंत्री तक, सब अपनी जेबें भरने में व्यस्त हैं। भाड़ में जाये जनता। राममंदिर के बाद अब कृष्ण्मंदिर का चूरन चटा देगी सरकार और जनता सब भूलकर लिहो-लिहो करने में जुट जायेगी। अपना पर्यटन मंत्री अमृतलाल तबतक 8-10 देश और घूम आयेगा।



