शीतल पी सिंह-
पूर्व चुनाव आयुक्त को इनाम मिला… लोकतंत्र में संस्थाओं की सबसे बड़ी पूंजी उनका अधिकार नहीं, बल्कि उन पर जनता का भरोसा होता है।
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार अब एचडीएफसी बैंक के चेयरमैन बनाए गए हैं। इससे पहले वे वित्त मंत्रालय में वित्त सचिव जैसे बेहद महत्वपूर्ण पदों पर भी रहे। एक सेवानिवृत्त अधिकारी का किसी निजी संस्था में जाना कानूनन गलत नहीं है। लेकिन सवाल सिर्फ कानून का नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मर्यादा और सार्वजनिक धारणा का भी है।

राजीव कुमार के मुख्य चुनाव आयुक्त रहते हुए विपक्षी दलों, अनेक पूर्व नौकरशाहों और चुनावी प्रक्रिया पर नज़र रखने वाले कई विशेषज्ञों ने चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल उठाए थे ।आरोप लगे कि आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन के मामलों में समान मानदंड नहीं अपनाए गए, सत्ता पक्ष के खिलाफ शिकायतों पर उपेक्षा दिखाई गई और आयोग की स्वतंत्र छवि कमजोर हुई। हालाँकि चुनाव आयोग ने इन सभी आरोपों को लगातार खारिज किया, लेकिन यह भी सच है कि उनके कार्यकाल में आयोग की निष्पक्षता को लेकर सार्वजनिक बहस पहले की तुलना में कहीं अधिक तीखी रही और अब इस संस्था के compromised हो जाने तक आ गई है।
अब सेवानिवृत्ति के कुछ ही समय बाद उन्हें देश के सबसे बड़े निजी बैंकों में से एक का अध्यक्ष बनाया जाना स्वाभाविक रूप से नए प्रश्न खड़े करता है।
क्या हमारे संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों के लिए सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाले बड़े-बड़े पदों पर कोई “कूलिंग-ऑफ पीरियड” नहीं होना चाहिए?
क्या ऐसी नियुक्तियाँ यह संदेश नहीं देतीं कि सत्ता के साथ अच्छे संबंध भविष्य में भी लाभ दिला सकते हैं?
और सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न—क्या लोकतंत्र में केवल निष्पक्ष होना पर्याप्त है, या निष्पक्ष दिखाई देना भी उतना ही आवश्यक है?
यह मुद्दा केवल राजीव कुमार का नहीं है। यह उस व्यवस्था का प्रश्न है जिसमें संवैधानिक संस्थाओं के प्रमुखों, वरिष्ठ नौकरशाहों और नियामक संस्थाओं के शीर्ष अधिकारियों को सेवानिवृत्ति के बाद लगातार महत्वपूर्ण पद मिलते रहते हैं। इससे हितों के टकराव (Conflict of Interest) की आशंका और संस्थाओं की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है।
लोकतंत्र में न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होता हुआ दिखाई भी देना चाहिए लेकिन मोदी/शाह युग इसकी परवाह नहीं करता!



