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सुख-दुख

दैनिक जागरण की संपादकीय बैठक में नरेंद्र मोहन की एक टिप्पणी पर मेरा फौरी जवाब उन्हें नागवार गुजरा, उन्होंने माफी मांगने का संदेश भेजा तो मैंने डाक से इस्तीफे की सूचना भेज दी!

देवप्रिय अवस्थी-

मेरी पत्रकारिता की यात्रा…

आज मेरी पत्रकारिता की यात्रा के 50 वर्ष पूरे हो गए. यह यात्रा 1 जुलाई 1976 को दैनिक जागरण, कानपुर से प्रशिक्षणार्थी पत्रकार के रूप में शुरू हुई थी. तब देश में इमरजेंसी लगी हुई थी और पिताजी (विनय भाई) मीसा के तहत जेल में थे. बाबाजी (नर्मदा प्रसाद अवस्थी) ने, जो स्वयं स्वतंत्रता सेनानी थे और आजादी की लड़ाई के दौरान तीन बार जेल जा चुके थे, सख्त हिदायत दे रखी थी कि मुझे किसी भी तरह की आंदोलनात्मक गतिविधियों से दूर रहना है.

जून 1976 के आखिरी हफ्ते में मेरा एमए (मनोविज्ञान) का नतीजा आया. संयोग से नौकरी की तलाश में एक दिन भी भटकना नहीं पड़ा. नतीजा आने के दूसरे ही दिन बायो-डाटा लेकर जागरण, कानपुर के दफ्तर गया. वहां वरिष्ठ पत्रकार विष्णु त्रिपाठी ने मुझे ‘समाचार’ एजेंसी की एक खबर देकर उसका अनुवाद करने को कहा. मेरे द्वारा किए गए अनुवाद से संतुष्ट होने के बाद उन्होंने मुझे समाचार संपादक हरिनारायण निगम से मिलाया. निगम साहब ने 250 रुपए मासिक के मानदेय पर प्रशिक्षणार्थी पत्रकार के रूप में मेरा चयन होने की सूचना दी और 1 जुलाई से सेंट्रल डेस्क पर मुख्य उपसंपादक बृजकिशोर शर्मा के तहत काम शुरू करने को कहा.

उसी दिन तीन अन्य लोगों-सत्यप्रकाश त्रिपाठी, संतोष कुमार शुक्ल और हरीश पंकज ने भी प्रशिक्षणार्थी पत्रकार के रूप में जागरण में काम शुरू किया था. त्रिपाठी जी बाद में जनसत्ता, दिल्ली में भी साथ रहे. वे स्वतंत्र भारत और अमर उजाला के कानपुर संस्करण के प्रभारी संपादक भी रहे और रिटायरमेंट के बाद जागरण इंस्टीट्यूट में लंबे समय तक निदेशक रहे. 75 की उम्र पार कर चुके त्रिपाठी जी फिलहाल कानपुर में ही रह रहे हैं. हरीश पंकज की जागरण में काम शुरू करने के कुछ ही दिन बाद एक सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी. संतोष शुक्ल राष्ट्रीय फिल्म संस्थान में लायब्रेरियन पद पर चयनित होकर पुणे चले गए थे. वे रिटायरमेंट के बाद नासिक में बस गए थे जहां तीन-चार साल पहले उनका निधन हो गया.

जागरण में मैंने करीब पौने तीन साल काम किया. सीखने के लिए उस समय वह बहुत ही अच्छा संस्थान था. शुरूआती दिनों में मुझे अक्सर रिलीवर की ड्यूटी दी जाती थी. इस वजह से मुझे खेल, व्यापार और डाक डेस्क का काम भी सीखने-समझने का मौका मिला. जागरण की मुख्य डेस्क पर मुख्य उप संपादक बृजकिशोर शर्मा के अलावा रामदत्त मिश्र, रामकृष्ण गुप्त, अफजाल अहमद अंसारी, मधुसूदन वाजपेयी (व्याकरणाचार्य किशोरीदास वाजपेयी के पुत्र), ओमप्रकाश त्रिपाठी, रहसबिहारी अवस्थी, एसएच नकवी, वीरभद्र मिश्र, राम अवतार अग्निहोत्री काम करते थे. मेरे जागरण छोड़ने के कुछ दिन पहले राजीव शुक्ल भी मेन डेस्क से जुड़े थे. रवींद्र श्रीवास्तव और प्रेमनाथ वाजपेयी क्रमशः व्यापार और खेल डेस्क देखते थे. आद्या प्रसाद सिंह क्षेत्रीय डेस्क के प्रमुख थे. यज्ञदत्त शुक्ल और संतोष शुक्ल उनके सहयोगी.

सिटी रिपोर्टिंग डेस्क के प्रमुख प्रताप नारायण श्रीवास्तव थे. सुनील दुबे, तनवीर हैदर उस्मानी, मिंटो बाबू, चंद्रप्रकाश गुप्त, चंद्रेश गुप्त, प्रतीक मिश्र सिटी टीम के अन्य साथी थे.‌ रविवारी मैग्जीन के इंचार्ज विजय किशोर मानव थे.

मेरे समय जागरण में रहे तीन पत्रकार -हरिनारायण निगम, सुनील दुबे और चंद्रप्रकाश गुप्त बाद में हिंदुस्तान, पटना के स्थानीय संपादक रहे. निगम साहब हिंदुस्तान, दिल्ली के संपादक भी रहे. विजय किशोर मानव हिंदुस्तान के रविवारी परिशिष्ट के इंचार्ज और कादंबनी पत्रिका के कार्यकारी संपादक रहे. राजीव शुक्ल ने सबसे ऊंची उड़ान भरी. राज्यसभा सदस्य, राज्य मंत्री और क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के उपाध्यक्ष पद जैसी उपलब्धियां उनके साथ जुड़ी हैं.

जागरण में ही मुझे 1978 का बहुचर्चित चिकमगलूर (अब चिकमगलूरु) उपचुनाव कवर करने का भी मौका मिला. इस सिलसिले में करीब 15 दिन चिकमगलूर में रहा. वहां कानपुर के भगवती प्रसाद दीक्षित घोड़ेवाला में चुनाव लड़ने पहुंचे थे. उसके बाद फतेहपुर लोकसभा उपचुनाव भी कवर किया.

मैंने जागरण में तीन-चार महीने सिटी रिपोर्टिग का काम भी किया, लेकिन वह काम मुझे रास नहीं आया. वापस डेस्क पर आया जहां मुझे रोजाना छपने वाले फीचर पेज की जिम्मेदारी मिली. अलग-अलग विषयों पर निकलने वाले इस पेज की जिम्मेदारी सौंपते हुए मुझे बताया गया कि शुकदेव शर्मा और सत्यदेव शर्मा आपकी मदद करेंगे. ये दोनों इतने वरिष्ठ थे कि उनसे कुछ भी करने को कहना मेरे लिए संभव नहीं था. दोनों शर्मा जागरण के लिए संपादकीय लिखते थे. सत्यदेव शर्मा तो नवजीवन, लखनऊ के संपादक रह चुके थे.

उन्हीं दिनों शंभूनाथ शुक्ल अपने मित्र संतोष तिवारी के साथ मुझसे मिलने आए और फीचर पेजों के लिए कुछ लिखने की इच्छा जताई. तुरत-फुरत काम करने में माहिर शंभू जी मेरे लिए बहुत मददगार साबित हुए. उन्हें कोई भी विषय सौंपो, तय समय में सामग्री तैयार मिल जाती. शंभू जी ने मेरे जागरण छोड़ने के कुछ समय बाद वहां काम करना शुरू किया. फिर जनसत्ता में मेरे सहकर्मी बने. बाद में वे जनसत्ता के दो संस्करणों और अमर उजाला के चार संस्करणों के भी संपादक रहे. फेसबुक लेखन में तो उन जैसी महारत कम ही लोगों के पास है.

आकाशवाणी, छतरपुर में कार्यरत जगदीश किंजल्क परिचर्चा लिखने में धुरंधर थे. एटा के इशरत अमीर अपने परिवार के सदस्यों के नाम से ढेर सारी रोचक सामग्री भेजते थे.

जेपी की जेल डायरी

जागरण में मेरे हाथों एक बड़ा और यादगार काम हुआ जेपी की जेल डायरी के प्रकाशन का. सेंसरशिप हटने और इमरजेंसी के नियमों में ढील दिए जाने के बाद पिताजी की भी रिहाई हुई. वे रिहाई के फौरन बाद जेपी (जयप्रकाश नारायण) से मिलने दिल्ली गए। वहां उन्हें जेपी की जेल डायरी की फोटो कापी प्रति मिली (शुरू में केवल 5-7 प्रतियां ही तैयार की गई थीं). उन्होंने कानपुर लौटकर वह प्रति मुझे दी और जागरण में उसके अंश छपने की संभावना पता लगाने को कहा. मैंने वह प्रति जागरण के समाचार संपादक हरिनारायण निगम को देकर उनकी राय मांगी तो उन्होंने मोहन बाबू (नरेंद्रमोहन) जी से बात करके निर्णय करने का आश्वासन दिया.

मोहन बाबू ने डायरी के अंश संपादकीय पेज पर मुख्य आलेख के रूप में धारावाहिक प्रकाशित करने की सहमति दे दी. अनुवाद और संपादन की जिम्मेदारी मुझे दी गई. डायरी के अंशों का प्रकाशन शुरू होने के कुछ दिन बाद तत्कालीन सूचना व प्रसारण मंत्री विद्याचरण शुक्ल किसी कार्यक्रम में कानपुर आए. उन्होंने मोहन बाबू को तलबकर डायरी छापना बंद करने की हिदायत दी और दावा किया कि चुनाव कांग्रेस ही जीतेगी. मोहन बाबू ने विद्याचरण शुक्ल की हिदायत मानकर डायरी के अंश छापना बंद कर दिया. चुनाव में जनता पार्टी की जीत के बाद शेष अंश छापे गए. बाद में जेपी की जेल डायरी पुस्तक के रूप में भी छपी. उसका अनुवाद और संपादन ख्यात लेखक लक्ष्मी नारायण लाल ने किया था.

वेतनमान और इस्तीफा

जागरण में प्रशिक्षणार्थी पत्रकार के रूप में काम करते हुए एक साल पूरा होने पर मुझे प्रबंधन की ओर से इस आशय एक पत्र मिला कि आपकी प्रशिक्षण अवधि एक साल बढ़ाई जाती है. पत्र की एक प्रति पर मुझे हस्ताक्षर करने थे. मैंने ऐसा करने से मना कर दिया. मेरा तर्क था कि जब साल भर में प्रबंधन की अपेक्षा के अनुरूप काम नहीं सीख सका तो आगे क्या खाक सीखूंगा. मैंने अपनी भावना से हरिभाई को अवगत करा दिया और यह भी कहा कि अगले हफ्ते से मैं जागरण की सेवा जारी नहीं रख पाऊंगा. हरिभाई ने आश्वस्त किया कि वे इस बाबत मोहन बाबू से बात करेंगे.

एक दिन बाद मोहन बाबू ने मुझे तलब कर लिया. उन्होंने कहा-तुमने जल्दबाजी में जागरण छोड़ने का फैसला किया है. यह ठीक नहीं है. जाकर अपना काम करो और तुम्हारे बारे में मैंने जो फैसला किया है वह हरिभाई तुम्हें बता देंगे. बाद में हरिभाई ने तत्काल प्रभाव से स्टाइपेंड 250 रुपए से बढ़ाकर 400 रुपए करने की जानकारी दी और छह महीने बाद ग्रेड देने के लिए आश्वस्त किया. चूंकि मुझ से पहले इतनी कम अवधि में सिर्फ सुनील दुबे को ग्रेड मिला था इसलिए उस समय मैंने जागरण छोड़ने का इरादा छोड़ दिया. हरिभाई के आश्वासन के मुताबिक जागरण में डेढ़ साल पूरे होते ही मुझे उपसंपादक का ग्रेड मिल गया.

जागरण में उन दिनों एक बहुत अच्छी परंपरा साप्ताहिक संपादकीय बैठक की थी. हरेक सोमवार को शाम 5.00 बजे होने वाली इस बैठक में मोटे तौर पर हफ्ते भर के अखबार की समीक्षा होती और अगले हफ्ते की कार्य योजना बनाई जाती. अप्रैल 1979 की एक ऐसी ही बैठक में मोहन बाबू ने टिप्पणी की-आजकल कर्मचारी भरोसेमंद नहीं रह गए हैं. मेरी फौरी प्रतिक्रिया थी -ऐसा मालिकों के बारे में भी कहा जा सकता है. स्वाभाविक था कि बगैर कुछ सोचे समझे की गई यह टिप्पणी मोहन बाबू को नागवार लगी. उन्होंने बैठक में तो कुछ नहीं कहा, लेकिन हरिभाई के जरिए मुझे माफी मांगने को कहा. शायद मैं माफी मांग भी लेता, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था. उस रात जब घर लौटा तो टाइम्स समूह में बतौर प्रशिक्षणार्थी पत्रकार के मेरे चयन का पत्र इंतजार कर रहा था. उस समय जागरण में उपसंपादक के रूप में मिलने वाली राशि मुंबई में टाइम्स में मिलने वाले स्टाइपेंड से कम थी, फिर भी, मैंने मुंबई जाने का विकल्प चुना और जागरण से इस्तीफे की सूचना डाक से भेज दी. इस तरह पेशेवर पत्रकारिता में मेरी पहली नौकरी लगभग पौने तीन साल में खत्म हो गई.

अविस्मरणीय पार्टी

जागरण में काम करने के दौरान 12 फरवरी 1979 को मेरा विवाह हुआ. चूंकि विवाह बहुत सादगी और सीमित खर्च में होना था इसलिए निमंत्रण बहुत कम बांटे गए. जागरण के साथियों में केवल तीन -हरिनारायण निगम, सुनील दुबे और प्रेमनाथ वाजपेयी अपनी मोटर साइकिलों से उन्नाव पहुंचे थे. विवाह के तीन दिन बाद मैंने दफ्तर जाना शुरू कर दिया. पहले ही दिन मैं खेल डेस्क के प्रभारी प्रेमनाथ वाजपेयी के पास बैठा था कि पीछे से मोहन बाबू की आवाज आई -कैसे हो देवप्रिय? सारा कामकाज ठीक से निपट गया ना? मैं कुछ बोलता इसके पहले ही प्रेमनाथ बोल पड़े-‘देवप्रिय आपसे बहुत नाराज़ हैं, आपके शादी में न पहुंचने पर.’

मोहन बाबू ने फौरन कहा -इनकी नाराजगी दूर करने के लिए कुछ करना पड़ेगा. सोचकर बताता हूं. कुछ देर बाद मोहन बाबू ने मुझे अपने कमरे में बुलाया और पूछा- ‘संडे (18 फरवरी 79) को कोई कार्यक्रम तो नहीं है?’ मेरे ‘नहीं’ कहने पर उन्होंने कहा-‘तो फिर संडे को तुम दोनों को लंच पर हमारे घर आना है. साथ में जागरण के संपादकीय विभाग के सभी साथी होंगे. तुम्हें और बहू को लेने के लिए मैं गाड़ी भेज दूंगा.

जागरण परिवार में संभवत: यह न भूतो, न भविष्यति आयोजन था. हम दोनों के अलावा ज्यादातर सहकर्मियों के लिए जागरण के मालिकान के बंगले पर जाने का यह पहला (और शायद आखिरी भी) मौका था. लंच में मोहन बाबू की पत्नी और बच्चे भी शामिल हुए. लंच के पहले कुछ मित्रों ने कविता पाठ भी किया. कविता पढ़ने वालों में विजय किशोर मानव, रवींद्र श्रीवास्तव और हरिभाई प्रमुख थे.

वरिष्ठ पत्रकार देवप्रिय अवस्थी की एफबी वॉल से

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