आज के अखबारों से लग रहा है कि देश में सिर्फ पीएम, उनके काम, उनकी रक्षा, पद, प्रतिष्ठा और सुरक्षित भविष्य के लिए काम चल रहा है या वही हो रहा है जो वे कर रहे हैं।
संजय कुमार सिंह
लोकतंत्र में सरकार का विरोध और आंदोलन आम है लेकिन मोदी सरकार ने विरोधियों और यहां तक कि विपक्ष का जो हाल किया है वह सबको पता है। इसीलिए उन्हें वोट और वोटर की चिन्ता नहीं है। कॉक्रोच दोबारा जंतर मंतर पर न बैठ जाएं उससे ज्यादा परेशानी है। लेकिन मीडिया यह सब नहीं दिखाता-बताता है। वैसे तो यह सब चुने हुए चुनाव आयोग और सहयोगी सुप्रीम कोर्ट से संभव हो सकता है पर अभी यह अलग मुद्दा है। इनकी चर्चा करने की जरूरत नहीं है। भाजपा और उसकी सरकार 2014 की अपनी उसी पुरानी रणनीति पर चलते हुए कॉक्रोच आंदोलन से उलझ कर बुरी तरह फंस गई है। एक मंत्री का इस्तीफा हो चुका है और अब यह सार्वजनिक है कि उससे कुछ बदलने वाला नहीं है। इधर, गृहमंत्री भी घिर चुके हैं। केंद्रीय मंत्री और इथेनॉल प्रचारक नितिन गडकरी तो निशाने पर हैं ही, शहीदों के मामले में रक्षा मंत्री की शर्मनाक भूमिका पूरी सरकार को कमजोर बना चुकी थी। निकलने के लिए वही पुराना तरीका अपना गया। लड़कियां गाली कैसे दे सकती हैं और आंदोलन में हिंसक व अपराधी तत्व शामिल थे, कई पुलिस वाले घायल हुए हैं, उनकी चिन्ता कौन करेगा और बात यहीं नहीं रुकी। कॉक्रोच आंदोलन को बदनाम करने के लिए पुलिस वालों का परिवार भी आगे आ गया या कर दिया गया। गाली देने वाले बच्चों को जो परेशान किया गया वह भी ऐतिहासिक है और सब सार्वजनिक है। बोफर्स खुलासों से मशहूर, भाजपा सरकार के दबाव में लेने की ज्ञात कोशिशों के बावजूद नाम से ही द हिन्दू ने इसपर विस्तृत खबर छाप दी और वह भी पहले पन्ने पर तो रात में प्रधानमंत्री ने बच्चों को ‘माफ’ कर दिया। आज मेरे दस में से दो अखबारों – अमर उजाला और दि इंडियन एक्सप्रेस में ही कश्मीर में हुए आतंकी हमले में एक मौत की खबर लीड है। ध्यान रहे, कश्मीर का आतंकवाद नोटबंदी और फिर अनुच्छेद 370 हटाने से ही खत्म होना था और विधानसभा चुनाव से पहले यह दावा किया गया था कि आतंकवाद खत्म हो चुका है। फिर भी पहलगाम हुआ, ऑपरेशन सिन्दूर हुआ और अचानक बंद हो गया। ट्रम्प ने जो कहा और किया सब मालूम है। ऐसे में प्रधानमंत्री के कंप्रोमाइज्ड होने का आरोप दमदार लगा पर किसी को बुरा नहीं लगा। भक्तों में किसी को पूछने-जानने की जरूरत नहीं लगी। सब चल रहा है।
ताजा आतंकी हमला भी इतना बड़ा मामला नहीं है कि और भी अखबारों में लीड बने। अमर उजाला की खबर का मुख्य शीर्षक है, कश्मीर में आतंकियों ने नाम पूछ बरसाईं गोलियां, प्रवासी की मौत। इंडियन एक्सप्रेस की लीड का मुख्य शीर्षक है, घाटी में आतंक ने प्रवासी मजदूरों को निशाना बनाया, एक मरा दूसरा गंभीर रूप से जख्मी। दैनिक भास्कर की लीड सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश है कि सड़कों पर पशुओं से (होने वाले) हादसों में मुआवजा दिया जाए। फ्लैग शीर्षक है, सुप्रीम कोर्ट ने कहा… पशु नेचुरल स्पीड ब्रेकर नहीं हो सकते। इससे लगता है कि इस मामले में अभी भी गंभीरता नहीं है और इसका पता साथ के बॉक्स से चलता है। इसका शीर्षक है, दो-टूक… पशुपालकों को पूरे जीवन अपने पशु की जिम्मेदारी निभानी होगी। अब यह पशु के जीवन तक ही हो सकता है और अगर मनुष्य का जीवन उसके पशु से पहले खत्म हो जाए तो? पशु की जिम्मेदारी उसके पालक के बच्चों की होगी? मुझे लगता है कि ऐसे मामले सुप्रीम कोर्ट में हल होने का मतलब है कि देश में कुछ भी तय नहीं है। नियम उसके पालन आदि का कोई मामला नहीं है और जैसे चल रहा है वैसे ही चलता रहेगा। आपको मंजूर नहीं है तो लड़ लीजिए कानूनी लड़ाई। बहुत विचित्र स्थिति है और इसीलिए दैनिक भास्कर ने लीड बनाया होगा पर मामला खबर ही है। अगली और बाकी बातें भी अदालत ही तय करेगी। सरकार जैसे चल रही है वैसे ही चलती रहेगी। देशबन्धु की लीड कुछ अलग है। देश में जो चल रहा है उसमें आगे क्या हुआ की सूचना जैसा लग रहा है। शीर्षक है, छात्रों की पिटाई व चंदा चोरी को लेकर विपक्ष के हमले तेज। उपशीर्षक है, गृहमंत्री अमित शाह के इस्तीफे की मांग को लेकर संसद में भारी हंगामा। कहने की जरूरत नहीं है कि संसद का सत्र चल रहा है, विपक्ष गृहमंत्री के इस्तीफे की मांग कर रहा है, सदन में हंगामा हो रहा है और यह खबर दूसरे अखबारों में लीड नहीं है, कइयों में तो पहले पन्ने पर भी नहीं है। दि एशियन एज की लीड का शीर्षक जरूर ऐसा ही है। “संसद में विपक्ष के प्रदर्शन और बाहर ‘लघु नाटक’ के बीच लोकसभा और राज्यसभा का कार्यकाल स्थगित”। इसके नीचे एक खबर का शीर्षक है, गोली चलाए जाने (के मुद्दे) पर सदन को भ्रमित करने के लिए जितेन्द्र सिंह के खिलाफ विशेषाधिकार प्रस्ताव लाया जाएगा। उपशीर्षक के अनुसार, गलत दावे करने के लिए राहुल गांधी के खिलाफ भी मांग की गई है।
नवोदय टाइम्स की लीड का शीर्षक है, ताहिर की ताकत चकनाचूर। मुख्य खबर फ्लैग शीर्षक से समझ में आती है, आईबी अधिकारी अंकित शर्मा हत्याकांड में पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन समेत 5 को उम्रकैद। ताहिर हुसैन आम आदमी पार्टी के पूर्व पार्षद है। पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार है और इस अखबार के पाठक पंजाब में ज्यादा है। अखबार की आम आदमी पार्टी या मुख्यमंत्री से ठनी हुई है। संभव है, इसलिए इस खबर को महत्व दिया गया हो। जाहिर है, ताहिर अभी हाईकोर्ट-सुप्रीम कोर्ट जा सकते हैं। कहा भी है कि जाएंगे। फिर भी अखबार ने एक अलग खबर छापी है, ताहिर हुसैन पर आईपीसी की धारा 188 के तहत 1,000 रुपए, धारा 153ए, 147 और 148 के तहत 50,000 रुपए और धारा 302 के तहत पांच लाख रुपए का जुर्माना लगाया है। सब जोड़कर ब्याज के साथ भी यह राशि एक करोड़ रुपए नहीं पहुंचेगी। इस सरकार में बलात्कार की सजा पाए उम्रकैदी छूट चुके हैं भले बाद में उन्हें सुप्रीम कोर्ट ने फिर जेल भेजा। ऐसे में निचली अदालत से उम्र कैद की सजा का खबर के रूप में बहुत मतलब नहीं है जब धारा 302 के तहत मात्र पांच लाख का जुर्माना है और सार्वजनिक परीक्षाओं में पेपर लीक व धांधली के लिए पब्लिक एग्जामिनेशन (प्रिवेंशन ऑफ अनफेयर मीन्स) अधिनियम के तहत 5 से 10 साल तक की जेल और ₹50 लाख से ₹10 करोड़ तक के भारी जुर्माने का प्रावधान है। फिर भी अखबार ने लिखा है, ताहिर पर भारी जुर्माने। मुझे नहीं लगता है कि यह किसी भी तरह से लीड के लायक खबर है। नवोदय टाइम्स में इस खबर के नीचे आज तीन खबरें हैं और तीनों इससे अच्छी लीड हो सकती थी। 1) पीएम के बारे में पोस्ट को लेकर मेटा इंडिया प्रमुख पर मामला। इंस्टाग्राम और फेसबुक यूजर्स पर भी प्राथमिकी। 2) जंतर मंतर प्रदर्शनकारियों पर (अब) बोले पीएम, ये गुमराह बच्चे हैं इन्हें माफ करना चाहता हूं और 3) पीएम किसान योजना 5 साल और। मंत्रिमंडल ने दी मंजूरी, 3.15 लाख करोड़ रुपए होंगे खर्च। यहां एक चौथी खबर हो सकती थी, नीट पेपर लीक के कारण आत्महत्या करने वाले बच्चों पर आज भी नहीं बोले पीएम। पर भारतीय समाज को प्रधानमंत्री की गलती या कमी दिखाई ही नहीं देती है। उनकी गालियां भूलकर लोग उन्हें दी जाने वाली गालियों से परेशान हो जाते हैं। ऐसे जैसे गंदी गंदी गालियां सिर्फ मोदी जी को दी जाती हैं। वे और उनके लोग खासकर उनकी ट्रोल सेना और ऐसे गालीबाज जिन्हें देश के प्रधानमंत्री ट्वीटर पर फॉलो करते हैं वे जो गालियां देते हैं वह सब दूध की धुली, खट्टी-मीठी, अच्छी-प्यारी, साफ-सुंदर और स्वादिष्ट गालियां हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड भी ताहिर हुसैन को उम्र कैद की सजा मिलने की खबर है। यह हत्या 2020 के दिल्ली दंगों के समय हुई थी। तब से कितने ही लोग लंबे समय तक जेल में रहे। उमर खालिद को अभी तक जमानत नहीं मिली है। पता नहीं उसका मामला कब, कैसे निपटेगा।
कलकत्ता के दैनिक, द टेलीग्राफ की लीड आज मौसम की खबर है। इसके मानसून मीटर के अनुसार देश भर में मानसून बिखरा हुआ, अस्त-व्यस्त है। कहीं बारिश सामान्य से कम हुई है कहीं ज्यादा, लेकिन कहीं-कहीं सामान्य बारिश भी हुई है। यही नहीं, कहीं-कहीं सामान्य से बहुत कम और बहुत ज्यादा बारिश भी हुई है। दिल्ली में बारिश की स्थिति चाहे जो हो, भाजपा की डबल इंजन की सरकार बनने के बाद गए साल राजेन्द्र नगर के बेसमेंट में पानी भरने से छात्रों की मौत हो गई थी इस बार कनाट प्लेस में पानी भर गया था। जाहिर है, मौसम की खबर का अपना महत्व है। हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड समुद्र में तेल खोजने की कोशिशों के लिए 84000 करोड़ रुपए की योजना के लिए मंत्रिमंडल की सहमति लीड है। द हिन्दू की कल की खबर को सरकार ने कैसे देखा उसका पता तो नहीं है लेकिन अखबार ने बताया है कि मोदी की माफी महानता की चाहत और खबर अंदर पेज आठ पर है जबकि लीड ट्रम्प की है। शीर्षक है, ट्रंप ने गाज़ा समझौते की तारीफ़ की, हमास ने इज़राइल के हटने की मांग की। उपशीर्षक है, अमेरिकी नेता ने हथियारों की कटौती पर ‘ऐतिहासिक समझौते’ की तारीफ़ की; फ़िलिस्तीनी चरमपंथी गुट ने समझौते को माना, कहा कि वे हथियार तभी छोड़ेंगे जब इज़राइल अपनी सेना हटा ले और ‘फ़िलिस्तीनियों को मारना बंद करे’।

मैं रोज चार हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल दस, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


