डबल इंजन वाली सरकार का काम बताने एस्ट्रोनॉट्स सड़क पर उतरे – शहर की सड़कों की हालत की ओर ध्यान खींचने के लिए एक अनोखे विरोध प्रदर्शन में, जयपुर के 100 से ज़्यादा लोग एस्ट्रोनॉट (अंतरिक्ष यात्री) की तरह तैयार होकर गोकुलपुरा इलाके की सड़क पर बने पानी से भरे बड़े-बड़े गड्ढों में उतरे। उन्होंने ऐसा यह “साबित” करने के लिए ऐसा किया कि सड़क का यह हिस्सा अब चांद पर उतरने की ट्रेनिंग के लिए भी इस्तेमाल किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि गड्ढे इतने बड़े थे कि उनके लिए अलग पिन कोड हो सकते हैं।
संजय कुमार सिंह
आज दि एशियन एज की लीड का शीर्षक है, बाधाओं के बीच सत्र हंगामेदार माहौल में खत्म हुआ; 12 बिल पास हुए। तीन बुलेट फ्लैग शीर्षक हैं 1) दोनों सदन अनिश्चित काल के लिए स्थगित 2) संसद में हंगामे को लेकर विपक्ष और सरकार में तकरार 3) मेरे भाषण के बाद हल्द्वानी का मंच शुद्ध किया गया: खड़गे ने कार्रवाई की मांग की। इसके साथ विपक्ष की बात भी है, सरकार घबरा गई, भाजपा नेता दोनों सदनों से भाग गए: कांग्रेस। स्पष्ट तौर पर दि एशियन एज ने अपनी लीड को खबर बनाने की कोशिश की है और माना जा सकता है कि वर्तमान समय में सर्वश्रेष्ठ लीड और उसका शीर्षक है। इसके मुकाबले दैनिक भास्कर की आज की लीड का शीर्षक है, लोकसभा का ठंडा मानसून, 22 साल में सबसे कम काम। मुझे लगता है कि इस खबर में यह भी बताया जाना चाहिए था कि प्रधानमंत्री और गृहमंत्री पूरे सत्र के दौरान नहीं आए और क्यों नहीं आए। यह भी लिखा जा सकता था कि विपक्ष के हंगामे या शोर के कारण या सवाल से डर कर नहीं आए लेकिन तब शोर और डर का कारण बताना जरूरी होता। इसलिए यह भोला-भाला प्यारा सा शीर्षक लीड जैसी खबर का नहीं है। बाकी के आठ अखबारों की बात करने में सबसे पहले द टेलीग्राफ की बात होनी चाहिए। लीड का शीर्षक है, नलसार की तलवार। फ्लैग शीर्षक है, नाराज़गी के बाद बार एसोसिएशन में नामांकन न करने के आदेश में ढील। इसके साथ मल्लिकार्जुन खरगे का आरोप सिंगल कॉलम में है। इसका शीर्षक है, एक बड़ी समस्या का चिंताजनक विस्तार। जाहिर है, आज के समय में खुलेआम छुआछूत जैसा व्यवहार और उसपर कार्रवाई न होना बेहद गंभीर स्थिति है लेकिन इसकी खबर भी नहीं थी। ना पहले ना आज है। 10 अखबारों की खबरों के अनुसार, आज की चार बड़ी खबरें इस प्रकार हैं:
1. अमर उजाला में चार कॉलम का बॉटम या एंकर – बार कौंसिल ऑफ इंडिया के कथित बैन और फिर पलटने की खबर है। खबर के अनुसार, बार कौंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) के अध्यक्ष मनन मिश्रा ने हैदराबाद के नेशनल एकेडमी ऑफ लीगल स्टडीज एंड रिसर्च (एनएएलएसएआर या नालसार) यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ से 2026 में स्नातक होने वाले सभी छात्रों के वकालत के लिए पंजीकरण पर रोक लगा दी थी। इस संबंध में उन्होंने देश भर के सभी राज्य बार कौंसिल और नालसर विश्वविद्यालय के कुलपति को पत्र भेजा था। ऐसा विश्वविद्यालय के (कुछ) छात्रों द्वारा भारत के मुख्य न्यायाधीश को अपने दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि बनाने का विरोध करने के कारण किया गया था। छात्रों ने यह कदम उठाने के कारण बताए थे। विरोध का अधिकार हर किसी को है। इसके बावजूद मनन मिश्रा ने चिट्ठी भेजी तो उसका विरोध होना ही था। इसका असर हुआ। भरपूर आलोचना के बाद बीसीआई ने शाम में बयान जारी करके अपना आदेश वापस ले लिया। मुझे लगता है कि यह सिस्टम का विरोध करने वालों को डराने का एक और हथकंडा था जो नाकाम रहा। इस लिहाज से यह बड़ी खबर है लेकिन आज इसे मेरे अखबारों में वह प्रमुखता नहीं मिली है जो मिलनी चाहिए थी।
2. नवोदय टाइम्स में पहले पन्ने पर तीन चौथाई से ज्यादा विज्ञापन है। बाकी जगह में दो खबरें हैं। इनमें एक लीड है जो बताती है कि लोकसभा में 19 प्रतिशत और राज्य सभा में 39 प्रतिशत काम हुआ। उपशीर्षक है, यह मानसून सत्र में सबसे कम उत्पादक सत्रों में शामिल है। कहने की जरूरत नहीं है कि जबसे भारतीय जनता पार्टी सत्ता में आई है – संसद की उत्पादकता मुद्दा बन गया है। संसद का समय खराब होने पर बड़ी चिन्ता जताई जाती है और भाजपा जब विपक्ष में थी तो इसकी चिन्ता नहीं होती थी और तब विरोध उसका अधिकार होता था। खबर का उपशीर्षक है, यह मानसून सत्र 22 वर्षों में सबसे कम उत्पादक सत्रों में शामिल है। यह पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च का आंकड़ा है और खबर भी है लेकिन इसे इतना महत्व दिया गया है तो यह भी बताया जाना चाहिए कि इसका कारण पूरे सत्र में प्रधानमंत्री और गृहमंत्री का सदन में नहीं आना है। सत्तारूढ़ दल बहाने बनाता रहा, शर्तें रखता रहा, धमकी और चुनौती देता रहा लेकिन दोनों लोग सदन में नहीं आए और कल मानसून सत्र पूरा हो गया। मामला इतने पर ही नहीं निपटा आज यह खबर लीड बन गई। बिना यह बताए कि इसका कारण क्या रहा। इससे पहले सदस्यों को निलंबित करके कानून पास करवाए जाने का उदाहरण है और वह सदस्यों (और इस तरह उनके चुनाव क्षेत्र के वोटर) के अधिकार का उल्लंघन था ऐसा किसी अखबार ने लिखा हो तो मुझे याद नहीं है। यह आज की फालतू खबर है।

3. देशबन्धु में आज चार कॉलम की खबर है, रैली के बाद मैदान के शुद्धिकरण पर भड़के खरगे। भाजपा शासन पर अपमान करने का आरोप लगाया। खबर के अनुसार, राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे ने हल्द्वानी में उनकी रैली के बाद मंच का ‘शुद्धिकरण’ किए जाने का मुद्दा गुरुवार को सदन में उठाया और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की। वहीं सदन के नेता जगत प्रकाश नड्डा ने इसकी निंदा की और कहा कि इसकी तहकीकात करायी जाएगी। श्री खरगे ने सदन की कार्यवाही शुरू होते ही यह मुद्दा उठाते हुए कहा कि वह हल्द्वानी के रामलीला मैदान में रैली करने गए थे। रैली में लाखों लोग मौजूद थे और उन्होंने लोगों की समस्याओं पर बात की लेकिन बड़े दुख की बात है कि यह पता चला कि बाद में भारतीय जनता पार्टी लोगों ने उस मंच का ‘शुद्धिकरण’ किया। उन्होंने कहा कि वह दलित हैं लेकिन एक संवैधानिक पद पर रहते हुए नेता विपक्ष हैं। उन्होंने कहा कि वे दलित हैं लेकिन कभी किसी के सामने गिड़गड़ाए नहीं और अपने अधिकारों के लिए संघर्ष किया है। उन्होंने आरोप लगाया कि उनका अपमान किया गया है। उल्लेखनीय है कि उत्तराखंड के हल्द्वानी में आठ अगस्त 2026 को कांग्रेस अध्यक्ष की रैली के बाद रामलीला मैदान में एक हिंदू संगठन द्वारा ‘शुद्धिकरण’ और हवन किया गया था। यह दलितों के अपमान और छुआछूत का मामला दिया है। राज्य में डबल इंजन की सरकार है लेकिन इसमें किसी कार्रवाई की खबर नहीं है। भाजपा ने जांच का आश्वासन दिया है लेकिन जांच खुद होनी चाहिए थी और भाजपा के शासन में हुआ है तो भाजपा को अफसोस जताना चाहिए था – पर दोनों की कोई खबर नहीं है। आज खबर कम छपी सो अलग। नवोदय टाइम्स में यह खबर दूसरे पहले पन्ने पर है और दैनिक भास्कर में पहले पन्ने पर बस इतनी सी।
4. आज हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड का शीर्षक है, मामूली चर्चा 12 विधेयक हंगामी सत्र में पास हो गए। इस खबर में भी चिन्ता संसद में बाधा पर ही है और इस पर नहीं कि पूरे मानसून सत्र प्रधानमंत्री और दूसरे नंबर के मंत्री नहीं आए। हंगामे का कारण जनता का सवाल था, सरकार और पुलिस की ज्यादती और बर्बरता का विरोध था लेकिन खबर उसकी नहीं है और आज खबरों में वह मुद्दा ही नहीं है।
आज द हिन्दू की लीड निर्यात 20 प्रतिशत बढ़ने की खबर है और देशबन्धु की सेकेंड लीड का शीर्षक है, मोदी शाह को चैन से सोने नहीं दूंगा और लीड का शीर्षक है, पहली बार किसी सरकार को इतना डरा-सहमा देखा। तो अमर उजाला की लीड का शीर्षक है, लाल किला हमले के पीछे अलकायदा का ही हाथ, बांग्लादेश नया खतरा। यह सब तब जब महाराष्ट्र के नांदेड़ में अकाली दल के प्रमुख सुखबीर सिंह बादल पर कृपाण से हमला हुआ और यह खबर इंडियन एक्सप्रेस तथा टाइम्स ऑफ इंडिया में लीड है। आप जानते हैं कि पंजाब में विधानसभा चुनाव होने हैं। भाजपा वहां सत्ता में नहीं है और कोशिशें उसकी चलती रहती हैं। हिंसा की घटनाओं का संयोग पुराना है। टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के अनुसार, अकालियों ने साजिश का आरोप लगाया है और सीबीआई जांच की मांग की है। सीबीआई केंद्र सरकार के पिंजरे का तोता है, सब को पता है। कलकत्ता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज अस्पताल में बलात्कार और हत्या की जांच सीबीआई से करवाई गई थी। जांच में कुछ नया नहीं मिला। पहले दिन ही अभियुक्त ठहराए गए व्यक्ति को सजा हो चुकी है और पीड़िता की मां भाजपा टिकट पर चुनाव लड़कर विधानसभा की सदस्य बन चुकी हैं तब राज्य में बनी नई भाजपा सरकार ने मामले की फिर से जांच कराने के आदेश दिए हैं। छुआछूत के मामले में कांग्रेस अध्यक्ष को राज्यसभा में अपना मामला खुद उठाना पड़ा। यही नहीं, झारखंड का छात्र आंदोलन मुख्य रूप से उनके आरोपों की जांच सीबीआई से करवाने की मांग पर ही अटका है। राज्य सरकार मामला सीबीआई को सौंपना नहीं चाहती है और भाजपा समर्थित दिखने वाला आंदोलन इस एक मुख्य मांग के कारण तमाम मांगें मान लेने के बावजूद खत्म नहीं हुआ है।
ऐसे में सरकार ने नोटबंदी से लेकर जीएसटी तक कई गलतियां और मनमानी की है। प्रधानमंत्री ने उसका श्रेय भी लिया है। किसानों के विरोध के समय भी कील लगी लाठियां चलाई गई थीं और उनके साथ भी जबरदस्ती की गई। तब वह मुद्दा नहीं बना लेकिन सरकार ने अपना रुख नहीं बदला। राम मंदिर बनाने का सारा श्रेय सरकार और प्रधानमंत्री ने लिया। भारत के मुख्य न्यायाधीश के साथ पहले जो हुआ और बाद में जो ईनाम मिला उससे न्यायिक शुचिता पर भी सवाल उठे लेकिन चढ़ावा चोरी पर संसद में चर्चा नहीं हुई। इस मांग से परेशानी जग जाहिर है। कुल मिलाकर, हिन्दुओं की सरकार न तो हिन्दुओं से कोई मुरव्वत कर रही है ना जातिवाद-छुआछूत जैसे मामले कम करने के लिए कुछ करती दिख रही है। जल्दबाजी में जो विधेयक पास हुए हैं उसका भी विरोध हो रहा है और उसमें भी देश का समय व संसाधन खर्च होगा। ऐसे में विधेयक पास हो जाना भी काम नहीं है लेकिन उसे काम की तरह पेश किया गया है जैसे संसद का काम विधेयक पास करना ही हो, सरकार से जवाब मांगना अनुचित या गैर जरूरी है। मुझे लगता है कि सरकार इससे निपट नहीं पाई, पूरे सत्र प्रधानमंत्री और गृहमंत्री का नहीं आना बहुत बड़ी खबर है लेकिन वह अखबारों से गायब है। खरगे का आरोप बेहद गंभीर है, विपक्ष के नेता के साथ अगर ऐसा हो सकता है तो संविधान का पालन कितना हो रहा है और डबल इंजन की सरकारों के लिए यह कोई पहला मामला नहीं है। इस लिहाज से कहा जा सकता है कि डबल इंजन की सरकारें तो काम ही नहीं कर रही हैं और जो विधेयक पास हुए हैं उनसे सरकार का स्वार्थ हो सकता है। सरकार ने अपनी जिम्मेदारी और जनहित का कितना ख्याल रखा यह तो मुद्दा रहेगा ही।
भारतीय जनता पार्टी, नरेन्द्र मोदी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारकों ने हिन्दुओं की भलाई के मुख्य मुद्दे पर सत्ता पर कब्जा किया। इसमें कांग्रेस के अदृश्य लेकिन बहु प्रचारित और तबके सीएजी के बनाए कथित भ्रष्टाचार का विरोध, कांग्रेस को हिन्दू विरोधी और तुष्टिकरण करने वाली पार्टी के रूप में बदनाम करना शामिल रहा। सत्ता में आने के बाद से सरकार ने जो किया और नहीं किया से अलग, विरोध करने वालों को खुलकर दबाया, कुचला और खत्म किया। इसके लिए कई देश विरोधी उपाय किए और डबल इंजन सरकारें बनाने का प्रचार, दिखावा और धोखा करते रहे। 10-12 साल में प्रधानमंत्री ने सत्ता में रहने का नेहरू का रिकार्ड बराबर कर लिया और प्रधानमंत्री की आलोचना जितनी मुश्किल हुई पूर्व प्रधानमंत्रियों की आलोचना उतनी ही आसान हो गई। ऐसे में संसद का पहला ऐसा मानसून सत्र कल खत्म हुआ जिसमें प्रधानमंत्री और गृहमंत्री – दोनों ही जा नहीं पाए, या नहीं गए अंत में गए और कैसे क्या हुआ – सब ऐतिहासिक है। फिर भी आज के अखबारों में खबरें ऐसे नहीं हैं जैसे संसद की कार्यवाही से सब निकाल दिया गया हो। जो हुआ उसका निकटतम विवरण मुझे मेरे 10 अखबारों में सबसे बढ़िया दि एशियन एज में लग रहा है। चार कॉलम की इसकी लीड में बहुत सारी बातें हैं, विपक्ष का आरोप भी एक कॉलम में है। पत्रकारिता की यही जरूरत है पर अब वह सब नहीं होता। मीडिया वालों पर दबाव और उन्हें परेशान करने के कई उदाहरण हैं।

मैं रोज चार हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल दस, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


