कोच्चि। केरल हाईकोर्ट ने पत्रकारों (Journalist) के लिए महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी या उसके खिलाफ अपराध दर्ज होने की खबर प्रकाशित करने भर से पत्रकार को आपराधिक मानहानि के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि अगर खबर आधिकारिक कार्रवाई या रिकॉर्ड पर आधारित है और उसमें पत्रकार की ओर से कोई स्वतंत्र, दुर्भावनापूर्ण या जानबूझकर लगाया गया मानहानिकारक आरोप नहीं है, तो केवल इस वजह से आपराधिक मानहानि का मामला नहीं बनता कि खबर से संबंधित व्यक्ति की प्रतिष्ठा प्रभावित हुई।
लाइव लॉ में पब्लिश रिपोर्ट के अनुासर, जस्टिस सीएस डायस ने यह टिप्पणी मलयाला मनोरमा अखबार के संपादकों और एक रिपोर्टर की याचिका पर सुनवाई के दौरान की। याचिकाकर्ताओं ने उनके खिलाफ दायर आपराधिक मानहानि की शिकायत और उसके आधार पर शुरू हुई कार्यवाही को रद्द करने की मांग की थी।
आधिकारिक कार्रवाई की रिपोर्टिंग और मानहानिकारक आरोप में अंतर
कोर्ट ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 499, 501 और 502 का उल्लेख करते हुए कहा कि आधिकारिक कार्यवाही की रिपोर्टिंग और किसी व्यक्ति के खिलाफ स्वतंत्र रूप से मानहानिकारक आरोप लगाने में स्पष्ट अंतर है।
अदालत ने कहा कि किसी पत्रकार को सिर्फ इसलिए आपराधिक मानहानि का आरोपी नहीं बनाया जा सकता कि किसी आधिकारिक कार्रवाई की खबर प्रकाशित होने से संबंधित व्यक्ति की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा। कानून ऐसी सच्ची रिपोर्टिंग को दंडित नहीं करता, बल्कि दोषपूर्ण और जानबूझकर किए गए मानहानिकारक आरोपों को अपराध मानता है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कोई खबर किसी व्यक्ति के लिए प्रतिकूल हो सकती है या उसे शर्मिंदगी का सामना करना पड़ सकता है, लेकिन इससे अपने आप आपराधिक मानहानि का अपराध साबित नहीं होता।
पुलिस की कार्रवाई की रिपोर्टिंग को भी मिली राहत
कोर्ट ने IPC की धारा 499 के चौथे अपवाद के पीछे के सिद्धांत पर भी चर्चा की। इस अपवाद के तहत अदालत की कार्यवाही की काफी हद तक सच्ची रिपोर्ट को मानहानि नहीं माना जाता।
अदालत ने कहा कि इसी सिद्धांत को पुलिस या किसी सक्षम वैधानिक प्राधिकरण की आधिकारिक कार्रवाई की काफी हद तक सच्ची रिपोर्टिंग के मामलों में भी ध्यान में रखा जा सकता है।
कोर्ट के मुताबिक, अगर किसी सक्षम प्राधिकरण ने अपराध दर्ज किया और आरोपी को गिरफ्तार किया, तो उस कार्रवाई की रिपोर्ट को केवल इसलिए मानहानिकारक नहीं कहा जा सकता कि बाद में आरोपी की प्रतिष्ठा प्रभावित हुई। हालांकि, रिपोर्ट आधिकारिक रिकॉर्ड से काफी हद तक मेल खानी चाहिए और उसमें पत्रकार की ओर से कोई स्वतंत्र या दुर्भावनापूर्ण आरोप नहीं जोड़ा गया होना चाहिए।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि सिर्फ पुलिस से मिली जानकारी प्रकाशित करने भर से पत्रकार को सुरक्षा नहीं मिल जाती। सुरक्षा का आधार यह है कि प्रकाशन आधिकारिक कार्रवाई की रिपोर्ट हो, वह रिकॉर्ड पर आधारित हो और उसमें आपराधिक इरादा न हो।
शराब बरामदगी की खबर को लेकर था विवाद
यह मामला एक ऐसे व्यक्ति की शिकायत से जुड़ा था, जिसके खिलाफ आबकारी विभाग ने कार्रवाई की थी। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि मलयाला मनोरमा के रिपोर्टर और संपादकों ने पुरानी दुश्मनी के चलते जानबूझकर उसकी छवि खराब करने के लिए उसके नाम और तस्वीर के साथ गलत खबर प्रकाशित की।
शिकायत के मुताबिक, खबर में बताया गया था कि आरोपी को 3 लीटर IMFL (भारतीय निर्मित विदेशी शराब) के साथ पकड़ा गया था और वह इसे टेलीफोन पर मिले ऑर्डर के आधार पर युवाओं और बाहरी मजदूरों को बेचने वाला था।
हालांकि, आधिकारिक रिकॉर्ड में 2.5 लीटर शराब जब्त किए जाने का उल्लेख था। शिकायतकर्ता ने इसी अंतर को आधार बनाकर खबर को गलत और मानहानिकारक बताया।
पत्रकारों ने कहा- आधिकारिक कार्रवाई की रिपोर्ट थी
याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि खबर आबकारी अधिकारियों की ओर से की गई गिरफ्तारी और आधिकारिक कार्रवाई की रिपोर्ट थी। यह खबर अपराध दर्ज होने के अगले दिन प्रकाशित हुई थी और इसमें रिपोर्टर की ओर से शिकायतकर्ता के खिलाफ कोई स्वतंत्र मानहानिकारक आरोप नहीं लगाया गया था।
दूसरी ओर, शिकायतकर्ता ने कहा कि बाद में उसे मामले में बरी कर दिया गया और उसके नाम व व्यक्तिगत विवरण के साथ खबर प्रकाशित होने से समाज में उसकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा।
उसने यह भी तर्क दिया कि मामले में तथ्यों को लेकर विवाद है, इसलिए इन्हें ट्रायल के दौरान ही तय किया जाना चाहिए और शिकायत को शुरुआती स्तर पर रद्द नहीं किया जाना चाहिए।
मामूली तथ्यात्मक गलती से नहीं बनता मानहानि का अपराध
दोनों पक्षों को सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि कानून हर उस प्रकाशन को आपराधिक मानहानि नहीं मानता, जिसका किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है।
अदालत ने हालांकि यह भी स्पष्ट किया कि धारा 499 का चौथा अपवाद सीधे-सीधे पुलिस की हर कार्रवाई पर लागू नहीं किया जा सकता, क्योंकि उसकी भाषा अदालत की कार्यवाही तक सीमित है। लेकिन इस अपवाद के पीछे का मूल सिद्धांत—यानी आधिकारिक कार्यवाही की काफी हद तक सच्ची रिपोर्टिंग को, बिना किसी स्वतंत्र मानहानिकारक आरोप या आपराधिक इरादे के, आपराधिक मानहानि में नहीं बदला जाना चाहिए—को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या रिपोर्टर की ओर से आपराधिक इरादा यानी मेन्स रिया मौजूद था। सिर्फ यह तथ्य कि खबर से किसी व्यक्ति को बुरा लगा या उसे अप्रिय स्थिति का सामना करना पड़ा, आपराधिक मानहानि के लिए पर्याप्त नहीं है।
हाईकोर्ट ने शिकायत और पूरी कार्यवाही रद्द की
मामले के तथ्यों की जांच के बाद कोर्ट ने पाया कि संबंधित खबर आधिकारिक कार्रवाई की रिपोर्ट पर आधारित थी। अदालत ने माना कि खबर में कुछ तथ्यात्मक त्रुटियां भले ही रही हों, लेकिन ऐसा कोई आधार नहीं मिला जिससे यह साबित हो कि ये गलतियां शिकायतकर्ता को जानबूझकर बदनाम करने के इरादे से की गई थीं।
हाईकोर्ट ने अपनी अंतर्निहित शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए पत्रकार और मलयाला मनोरमा के संपादकों के खिलाफ दायर आपराधिक शिकायत को रद्द कर दिया। इसके साथ ही शिकायत के आधार पर शुरू की गई आगे की सभी आपराधिक कार्यवाही भी खत्म कर दी गई।
कोर्ट की इस टिप्पणी का व्यापक महत्व इसलिए है क्योंकि इसमें आधिकारिक कार्रवाई की रिपोर्टिंग और स्वतंत्र रूप से लगाए गए मानहानिकारक आरोप के बीच अंतर को साफ किया गया है।


