मिहिर गौतम-
युवा पत्रकारों की एक पूरी फौज खड़ी हो गई है, जो बिना डरे कड़े सवाल पूछ रही है।
मैं कल पटना में देख रहा था—जिस वक्त प्रधानमंत्री के जन्मदिन का जलसा आयोजित किया जा रहा था, उसी वक्त कई युवा पत्रकारों ने बेहद तीखे सवाल उठाए। उन्होंने पूछा—जब प्रधानमंत्री खुद तेल बचाने की अपील करते हैं, तो फिर यहां इस तरह तेल क्यों जलाया जा रहा है? जब करीब 50 लाख लोग बाढ़ से प्रभावित हैं, तब इस तरह के भव्य जलसे का क्या मतलब है?
इन युवा पत्रकारों ने यह सवाल भी उठाया कि सरकारी पैसे से इतने बड़े आयोजन क्यों किए जा रहे हैं।
और यह सिर्फ बिहार की बात नहीं है। देश के तमाम हिस्सों में युवा, खासकर जेन-Z पत्रकार, लगातार सवाल उठा रहे हैं। उन्हें डराने के लिए एफआईआर की धमकी दी जाती है, उनके परिवारों पर दबाव डालने की कोशिश होती है, लेकिन इसके बावजूद वे रुक नहीं रहे हैं।
वे सही को सही और गलत को गलत कहने की कोशिश कर रहे हैं।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इन पत्रकारों का एक बड़ा हिस्सा हिंदू-मुसलमान या जाति के एजेंडे में उलझने के बजाय मुद्दों पर बात कर रहा है।
वे पूछ रहे हैं—स्कूल ठीक क्यों नहीं हैं? अस्पतालों की हालत खराब क्यों है? सरकार अपने प्रचार और विज्ञापनों पर इतना पैसा क्यों खर्च कर रही है? आम आदमी की जिंदगी से जुड़े इन सवालों के जवाब क्यों नहीं दिए जाते?
लोकतंत्र में ये सवाल पूछना जरूरी है। और इन सवालों के जवाब अगर सरकार की तरफ से आते हैं, तो उसका फायदा आखिरकार आम लोगों को ही होगा।
आज पत्रकारिता के सामने एक बड़ी चुनौती यह भी है कि कुछ बड़े मीडिया संस्थान खुद को इवेंट कवरेज तक सीमित करते दिखाई देते हैं। लेकिन दूसरी तरफ ऐसे युवा पत्रकार हैं जिनकी कमाई पांच-दस हजार रुपये भी नहीं है। कई ऐसे हैं जिनके चैनल से अभी एक रुपये की भी कमाई नहीं हो रही है।
फिर भी उनके अंदर हिम्मत है। हौसला है। और सवाल पूछने की जिद है।
मेरी अपील है—ऐसे युवा पत्रकारों को आप जरूर फॉलो कीजिए, उनके चैनल सब्सक्राइब कीजिए और उनके काम को आगे बढ़ाइए।
और जो बड़े और स्थापित पत्रकार हैं, उनसे भी मेरी अपील है—हर दिन कम से कम दो-तीन ऐसे युवा कंटेंट क्रिएटर्स और पत्रकारों को अपने वीडियो या सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए प्रमोट कीजिए।
क्योंकि अगर इनकी आवाज ज्यादा लोगों तक पहुंचेगी, तो इन्हें अपना काम और मजबूती से करने का मौका मिलेगा।
लोकतंत्र सिर्फ चुनाव से नहीं चलता। लोकतंत्र सवालों से भी चलता है। और सवाल पूछने वाली इस नई पीढ़ी को सुना जाना चाहिए।
देश में अब ऐसे ही पत्रकारों से उम्मीद है.
-अजीत अंजुम
उमाशंकर सिंह-
बढ़िया लिखा है मिहिर तुमने…
अगर अपनी बात करूं तो मेरी कोशिश हमेशा होती है कि वे पत्रकार जो तमाम चुनौतियों के बावजूद बढ़िया काम कर रहे हैं उनकी बात अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने में अपने भरसक मदद की जाए।
यहाँ एक बात और जोड़ना चाहूँगा कि जैसे जैसे वैकल्पिक मीडियम के पत्रकारों की फ़ौज बढ़ती जा रही है, मोदी सरकार और ज़्यादा से ज़्यादा असहनशील होती जा रही है। वह औने पौने तरीक़ों से कई पत्रकारों को कंट्रोल करना चाहती है। उसे समझना चाहिए कि रोटी को जितना दबाया जाता है वह उतना फूलती है।
और एक बात और, जिस गोदी मीडिया के सहारे मोदी सरकार कूद रही है, जब कभी… जब कभी… अगर जहाज़ डूबता दिखेगा तो वही गोदी पत्रकार इनको डंप कर ‘बगल वाले जहाज़’ पर जंप कर जाएँगे। हम जैसे तो फिर भी हाल पूछने आएंगे।


