सुनील कुमार-
छत्तीसगढ़ के राज्योत्सव में दिए जाने वाले राज्य अलंकरणों की घोषणा हुई है जिसमें अलग-अलग किस्म के मीडिया के कुछ लोगों के नाम भी हैं। कई दूसरे लोगों ने, जिन्होंने इन अलंकरणों के लिए अर्जियां लगाई होंगी, उनमें निराशा भी होगी कि उन्हें इस सम्मान के लायक नहीं समझा गया। फिर जिन्हें बीते बरसों में ये सम्मान मिल चुके हैं, उनमें से कुछ लोग इस पर चल रही चर्चा में चुप रहते हैं जो कि सोशल मीडिया पर हर बरस चलती ही है। जिन लोगों को सरकार से सम्मान लेना ठीक लगता है, और मिला है, उन सभी लोगों को हमारी तरफ से बधाई। जिन लोगों को नहीं मिला है, और अगले बरस भी जिनकी हसरत जिंदा रहेगी, वे फिर अर्जी लगा सकते हैं।

हमारी जितनी सीमित जानकारी है उसके मुताबिक इस राज्य के अलंकरणों के लिए, या कि देश में पद्म सम्मानों के लिए लोगों को खुद अर्जी भेजनी पड़ती है, या किसी और के नाम की सिफारिश करने पर उन लोगों की सहमति भी साथ में भेजनी पड़ती है। कुल मिलाकर उन्हीं के नाम घोषित होते हैं जिन्हें ये सम्मान नामंजूर होने का खतरा न हो। छत्तीसगढ़ में तो दर्जनों अलग-अलग क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान या सफलता के लिए अलंकरण दिए जाते हैं, और अखबारों या टीवी चैनलों के लोगों को मिलने वाले सम्मानों को लेकर चर्चा या विवाद कुछ अधिक होते हैं, जबकि इन सम्मानों को तय करने के लिए बनने वाले निर्णायक मंडल में कुछ पत्रकार ही रहते हैं।
सरकार के अलावा भी देश में बहुत से दूसरे संगठन पत्रकारिता के पुरस्कार देते हैं। इनमें कुछ तो बहुत प्रतिष्ठित हैं जो कि पत्रकारों के ही पेशेवर संगठनों, या किसी दूसरे विवादहीन संगठन द्वारा दिए जाते हैं। लेकिन सरकारों के दिए जाने वाले पत्रकारिता पुरस्कार, या अलंकरण, या पत्रकारों को दिए जाने वाले पद्म सम्मान की बात कुछ अलग होती है। लोककला या समाजसेवा, साहित्य या खेलकूद, ग्रामीण विकास या दानशीलता का यह दावा कभी नहीं रहता कि वे लोकतंत्र के पांचवें, छठवें, सातवें, या आठवें स्तंभ हैं। अकेली पत्रकारिता ऐसी रहती है जिसका यह दावा रहता है कि वह लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है।
लोकतंत्र के स्तंभों को लेकर धारणा एकदम साफ है। संविधान में भारत में तीन ही स्तंभों को लोकतंत्र के पाये माना गया है, कार्यपालिका, विधायिका, और न्यायपालिका। फिर लिखित शब्दों से परे धक्का-मुक्की करके पत्रकारिता ने अपने आपको एक और स्तंभ बना लिया। अब जब उसने अपने को स्तंभ बना ही लिया है, तो उसे चौथे स्तंभ की तरह रहना चाहिए। किसी टेबिल या कुर्सी को देखें, जिसके चार पैर हों, तो उनमें से कोई भी पैर दूसरे पैर से लिपटने की कोशिश नहीं करता, उसे खींचने या धकेलने की, या सहलाने की कोशिश भी नहीं करता। सारे पैर अपनी-अपनी जगह बोझ का अपना-अपना हिस्सा उठाते रहते हैं, और एक-दूसरे से पर्याप्त और सुरक्षित दूरी बनाए रखते हैं।
कल्पना करें कि चार पांवों की कुर्सी के दो पैर एक-दूसरे के करीब आ जाएं, तो उन पर बैठे हुए लोकतंत्र का नीचे लुढक़कर जख्मी हो जाना तय सरीखा रहेगा। इसलिए सरकार के साथ पत्रकारिता को सम्मान का रिश्ता कायम करने के बजाय एक सम्माननीय दूरी बनाकर रखना चाहिए। इन दोनों में आपस में न तो कोई टकराव है, न ही इन दोनों में गलबहियों के किसी रिश्ते की जरूरत है।
अविभाजित मध्यप्रदेश के एक मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा ने भोपाल में पत्रकारिता के एक कार्यक्रम में संचालक-पत्रकारों की कही एक बात पर आपत्ति की थी। एक वरिष्ठ पत्रकार ने पटवाजी का स्वागत करते हुए कहा था कि भोपाल के पत्रकारों से उनके बहुत मधुर संबंध हैं। इस पर पटवाजी ने अपनी बारी आने पर माइक से ही कहा था कि उनके पत्रकारों से पेशेवर संबंध हैं। सरकार और पत्रकार, इन दोनों की अपनी-अपनी अलग भूमिका रहती है, और अगर इन दोनों के बीच मधुर संबंध होने लगे, तो नुकसान तो लोकतंत्र का होगा।
पटवाजी अपनी साफबयानी के लिए जाने जाते थे, उन्हीं के बस था कि पत्रकारों के कार्यक्रम में पत्रकारों के मुंह पर मंच और माइक से ऐसी बात कह सकें। लेकिन उनकी बात में दम था। शिष्टाचार के संबंध एक पेशेवर जरूरत है, राजनीति की भी, और पत्रकारिता की भी। लेकिन एक-दूसरे के किसी अतिरिक्त सम्मान की जरूरत नहीं है।
कहने के लिए अलंकरण के नाम तय करने वाला एक निर्णायक मंडल होता है, लेकिन कई बार ऐसी धारणा बनती है कि सरकार अपने को पसंद, या नापसंद लोगों के नामों को लेकर अपने असर का इस्तेमाल करती है। हम छत्तीसगढ़ में इस बरस छांटे गए नामों के संदर्भ में यह बात नहीं कह रहे हैं, किसी एक साल के छांटे गए नाम महत्वहीन रहते हैं, बहुत लंबी, 25 बरस लंबी लिस्ट भी देखें, तो भी उससे हम कोई धारणा नहीं बना रहे। लेकिन हम नामों से परे एक सैद्धांतिक चर्चा कर रहे हैं कि क्या पत्रकारों को किसी भी सरकार, राज्य सरकार या केन्द्र सरकार से कोई सम्मान, अलंकरण, या पुरस्कार लेना चाहिए?
देश में कई पत्रकारों और संपादकों को पद्मश्री जैसा देश का एक सबसे बड़ा सम्मान भी मिला है, और अभी हम नामों पर जाना नहीं चाहते कि किस सरकार ने किन लोगों को इसके लायक माना, किन लोगों ने इसके लिए कोशिश की, किन लोगों को यह नहीं मिल पाया, या किन लोगों ने इसके लिए मना कर दिया। मुद्दा है कि जहां चयन प्रक्रिया में सरकार का एक दखल रहता है, क्या वैसी प्रक्रिया से गुजरकर छांटे गए नामों से पत्रकारों का सम्मान सचमुच बढ़ता है? या उनके प्रति सरकार के एक रूझान का यह रूख रहता है?
हम इसमें पत्रकारों के व्यक्तिगत स्तर पर फैसले, या उनके संस्थानों के फैसले पर नहीं जा रहे। हमारी जानकारी में हैं कि कुछ संस्थानों ने अपने पत्रकारों को सरकारी सम्मान के लिए अर्जी देने से मना कर दिया था। कुछ संस्थान अपने पत्रकारों पर छोड़ते हैं कि वे चाहें तो अर्जी दें, और न चाहें तो अपने पाठकों से मिलने वाले सम्मान से खुश रहें। कुछ संस्थान इसमें सक्रिय रूप से कोशिश करते हैं कि उनके पत्रकारों को सम्मान मिले।
हमको इनमें से किसी भी किस्म से न कोई शिकायत है, न कोई परहेज है, यह सब कुछ लोकतांत्रिक और जायज सीमा के भीतर स्वीकार्य बातें हैं। लेकिन हमारी अपनी सोच यह है कि पत्रकारों को सरकार से शिष्टाचार के बहुत अच्छे संबंध रखने चाहिए, लेकिन एक-दूसरे से सम्मान पाने का मोहताज नहीं होना चाहिए। यह हमारी सोच है, जो लोग इससे परे सोचते हैं, वे भी सम्मान के हकदार हैं, अपने पाठकों या दर्शकों से मिलने वाले एक बहुत ही ईमानदार और जायज सम्मान के, और अगर उन्हें ठीक लगता है तो सरकार से भी मिलने वाले सम्मान के।
जहां कहीं सरकार बीच में रहेगी, वहां बहुत सम्मानजनक लोगों को मिलने वाले जायज सम्मान को लेकर भी जायज और नाजायज दोनों किस्म के सवाल उठेंगे। और ऐसा उठना जायज इसलिए है कि सरकार और पत्रकार के रिश्ते समधी-मिलन जैसे नहीं रहने चाहिए। कल जब छत्तीसगढ़ में पत्रकारों के नाम घोषित हुए हैं, तो सोशल मीडिया पर कुछ सुगबुगाहट चल रही है। इसी को देखते हुए हम इस मुद्दे पर अपनी सोच सामने रख रहे हैं, लेकिन इसका यह मतलब कहीं नहीं है कि यही एक सोच जायज है, और बाकी किस्म की सोच ठीक नहीं है।
इसी राज्य में कई ऐसे पत्रकार हैं (जिस अखबार में यह लिखा जा रहा है, उससे बाहर के) जिन्होंने खूब अच्छा काम किया है, और वे अपनी पत्रकारिता के लिए जाने जाते हैं, उन्हें न मिले किसी सम्मान का मलाल उनके पाठकों या दर्शकों को तो बिल्कुल भी नहीं है। जिन्हें सम्मान या अलंकरण नहीं मिले हैं, हम उनके हमदर्द हैं, और याद दिलाना चाहते हैं कि गांधी को कभी नोबल शांति पुरस्कार नहीं मिला था, इसलिए किसी पुरस्कार के लिए, सम्मान या अलंकरण के लिए काम करने के बजाय अपने पाठकों या दर्शकों के लिए अपना खूब अच्छा काम और बेहतर तरीके से आगे बढ़ाएं।
जिंदगी में किसी पेशे में उस पेशे को इस्तेमाल करने वाले लोगों के बीच मिलने वाला सम्मान ही सबसे बड़ा सम्मान होता है। दुनिया में सारे नोबल पुरस्कार विजेताओं की प्रतिमाओं को मिलाकर भी उतनी प्रतिमाएं नहीं लगी हैं, जितनी एक नोबल पुरस्कारविहीन गांधी की लगी हैं। इसलिए गांधीवादी उदारता के साथ पत्रकारिता जारी रखें।
दैनिक ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : 02 नवंबर 2026

