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उत्तर प्रदेश

असली मुद्दों से जानबूझ कर भागता रहता है सत्ता परस्त बिकाऊ मीडिया!

यूपी के सोनभद्र और संभल की घटनाएं प्रदेश की लचर कानून व्यवस्था को बयान कर रही हैं. एक तरफ जहां सोनभद्र में एक दबंग प्रधान अपने गुर्गों को लेकर जमीन पर कब्जा करने के लिए आदिवासियों पर ताबड़तोड़ गोलियां बरसाता है, वहीं दूसरी ओर संभल में कैदियों को मुरादाबाद लेकर जा रही गाड़ी पर तीन बदमाश हमला करते हैं और दो पुलिसकर्मियों को गोली मारकर दोनों कैदियों को छुड़ाकर भाग जाते हैं. ये उस प्रदेश की घटनाएं हैं, जहां काम न करने वाले पुलिसर्मियों को जबरन रिटायर किया जा रहा है.

ये उस प्रदेश की घटनाएं हैं जहां पुलिस का ऑपरेशन क्लीन बराबर जारी है. ये वही प्रदेश है जहां की पुलिस ठांय-ठांय कर बदमाशों से लोहा लेती है. और ये वही प्रदेश है जिसकी कानून व्यवस्था को लेकर नेशनल मीडिया तारीफ करता नहीं थकता. अब यूपी की इतनी बड़ी घटनाओं के बाद भी मीडिया में कोई ज्यादा चर्चा नहीं है. बड़े-बड़े निजी चैनलों ने इन दोनों घटनाओं को कम्बाइन कर एक-एक डिबेट का शो तो कर लिया लेकिन सरकार पर कोई तंज या सरकार की निंदा करने में नाकामयाब रहे.

यहां तक कि चैनल्स पर हेडलाइन चल रही थीं कि ‘सीएम योगी सख्त, कानून व्यवस्था पस्त’. जो मीडिया एक सरकार का तोता बना बैठा हुआ है, वो क्या उसकी निंदा कर पाएगा. यही मीडिया साक्षी मिश्रा और अजितेश का मुद्दा बड़ा बनाता है. इस मुद्दे पर टीवी चैनलों पर दिन-रात बहसें होती रहीं. मीडिया के लिए क्रिकेट का मुद्दा बहुत बड़ा हो जाता है. जहां विश्वकप में गई टीम को लेकर बराबर कवरेज होती रही. उसी समय बिहार के मुज़फ्फरपुर में चमकी बुखार से अपनी जान गंवाने वाले बच्चे मीडिया को नहीं दिखाई दिए.

दरअसल उन मरने वाले बच्चों में आर्थिक रूप से सम्पन्न नहीं था. और न ही सोनभद्र में हुए नरसंहार में मरने वाले में कोई सम्पन्न था. अभी हाल में बिहार में आई बाढ़ ही देख लीजिए. यहां के डिप्टी सीएम को सुपर-30 मूवी से इतना प्रेम हुआ कि उन्हें बिहार की भयावह तस्वीर नहीं दिखाई दी. हालांकि ये मुद्दा मीडिया ने उठाया भी, लेकिन जिस प्रकार से उठाना चाहिए था शायद वैसे उठाने में नाकामयाब रही. अब एक बात समझ आती है कि क्यों अख़बार में छपे संपादकीय और लेखों से आंदोलन पैदा नहीं हुआ करते. इसका कारण ये है कि अब न तो गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे ‘प्रताप’ के संपादक हैं और न ही माखनलाल चतुर्वेदी जैसे ‘कर्मवीर’ के संपादक.

सच बात तो ये है कि अब इस मीडिया को ऐसे मुद्दे चाहिए जिनमें वो सरकार से प्रश्न पूछने से बची रहे. और भड़काऊ, लव जिहाद, पाकिस्तान, हिंदू-मुस्लिम, सास-बहू के सीरियल दिखाकर अपने टीआरपी के ढकोसले में आगे-पीछे का खेल खेलती रहे.

ऋषि कांत
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