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उत्तर प्रदेश

IPS वैभव कृष्ण सोशल मीडिया पर भी चर्चा के केंद्र बने, पढ़ें कुछ प्रतिक्रियाएं

Vijay Shanker Singh : गौतम बुद्ध नगर (नोयडा) के एसएसपी वैभव कृष्ण ने विभाग और सरकार के तबादले पोस्टिंग महकमे में कुछ शक्तिशाली लोगों के ऑडियो क्लिप जारी कर के सरकार और पुलिस विभाग को असहज स्थिति में ला दिया है। इन ऑडियो क्लिप से यह संकेत मिलता है कि कुछ आईपीएस, और बड़े सरकारी अफसर और सत्तारूढ़ दल के शक्तिशाली लोगों का एक कॉकस है जो अफसरो की पोस्टिंग आदि मैनेज करता है।

जब शब्द मैनेज का प्रयोग किया जाय तो यह समझ लीजिए कि उत्कोच की बात थोड़ी शिष्ट जबान में कही जा रही है। ज़ाहिर है वैभव के इस ऑडियो क्लिप और आरोप के खुलासे के बाद सरकार और विभाग दोनों ही असहज हुये और यह भी हैरानी की बात है कि दोनों की असहजता का मूल कारण वैभव का खुलासा नहीं बल्कि यह खुलासा क्यों किया गया, यह है। बात तो उन आरोपों पर होनी चाहिए, जांच, छानबीन और पड़ताल तो उन आरोपों की होनी चाहिए, जो वैभव ने अपने खुलासे में कहा है तो जांच पड़ताल इस बात पर हो रही है कि, यह बात क्यों और कैसे कह दिया। वैभव का खुलासा, आचरण नियमावली का उल्लंघन है तो खुलासे में कही गयी बातें आचरण नियमावली का पालन तो नहीं ही है।

यहां वैभव की भूमिका एक व्हिसिल ब्लोअर की लग रही है जिन्होंने एक रैकेट का खुलासा किया जो बड़े और असरदार जिलों में पुलिस अफसरों की पोस्टिंग को मैनेज करता है तो जांच तो पहले इसी बात की होनी चाहिए कि क्या यह खुलासा और आरोप सच है या यह भी किसी मामले को सनसनीखेज बनाने और किसी खास मक़सद से किया गया है? अगर यह आरोप सच है तो इस षडयंत्र में लिप्त लोगों के खिलाफ कानूनी कार्यवाही की जानी चाहिये और वैभव की इस भ्रष्टाचारी कॉकस को उजागर करने के साहस की सराहना की जानी चाहिये। और अगर यह आरोप गलत है तब तो वैभव का स्पष्टीकरण लेकर जो भी कार्यवाही हो सकती हो, की जानी चाहिए । फिलहाल खबर यह है कि वैभव का जवाब तलब किया गया है और उनसे यह स्पष्टीकरण की अपेक्षा की गयी है कि उन्होंने सरकारी सेवकों की आचरण नियमावली के प्राविधान का उल्लंघन क्यों किया है ?

लेकिन वैभव के खुलासे पर न तो डीजीपी साहब की और न सरकार की कोई प्रतिक्रिया आयी कि वे उन खुलासों के बारे में क्या करने जा रहे हैं। यह भी हो सकता है उन्होंने इस पर कोई संज्ञान लिया हो जो मीडिया या सोशल मीडिया में अभी बताया न जा रहा हो। पर अगर इस खुलासे पर कोई जांच पड़ताल नहीं हुयी तो इसका संदेश पूरे विभाग और सरकार के लिये सकारात्मक नहीं जाएगा। नूतन ठाकुर ने इस पर सीबीआई जांच की मांग की है। सीबीआई जांच हो या न हो, कम से कम सरकार द्वारा एक जांच कमेटी का गठन कर इस खुलासे की जांच ज़रूर की जानी चाहिये। यह अगर कहा जाय कि विभाग में पोस्टिंग और तबादले में उत्कोच और असर नहीं चलता तो यह एक हास्यास्पद झूठ होगा। हम वैसे ही साख के संकट से जूझ रहे हैं, और इस मामले पर कोई भी लीपापोती इस साख के संकट को और गहरा करेगी।


Pradeep Tiwari : मैं ईमानदार, बाकी सब बेईमान वाला फंडा तो विद्रोह का… सूबे के अफसर लॉबी के बीच देखने लायक नौटंकी चल रही है। एक वीडियो वायरल हुआ है। इससे जुड़े मसले पर अशोक स्तम्भ का भार उठाने वाले कंधे लचक रहे हैं। होड़ लगी है ईमानदारी की। बेशक आप ईमानदार हैं, लेकिन आपके अलावा सब बेईमान है, यही सोच विद्रोह है। विद्रोह यूं ही नहीं लिख दिया, इसकी भी वजह है। वजह वो लक्ष्मण रेखा है, जिसे लांघी गयी है। वजह वो अफसरशाही है, वो नेतागीरी है, जिसने आपको ऐसी जुर्रत करने की हिम्मत दी।

खुद के दामन पर दाग लगा तो हंगामा मचा दिया। ईमानदारी का कम्बल ओढ़ने लगे। कुछ साल पीछे जाइए। एक और अफसर का ऐसा ही वीडियो और ऑडियो लीक हुआ था। चटकारे लेकर एक लॉबी ने मौज ली थी। अब खुद पर कहर बरपा तो सबको भ्रष्ट बताने लगे। बड़े ब्रांड के जिस पत्रकार ने मेरठ में उस कथित वीडियो को आईजी को भेजा, उसे ही बदमाशों की तरह गिरफ्तार कराने टीम भेज दी। भई क्या चाहते हैं, हम खिलाफ में कुछ न लिखे, कुछ न बोले। कलम आपके जूते तले दबा दे। आभार जताइए मेरठ के उस पत्रकार का, जिसने समय रहते वीडियो आईजी को भेज दिया, वरना अब तक वायरल होने के हालात और खराब होते।

एक आईपीएस की सैलरी रेलवे के ड्राइवर (TA+DA मिलाकर) से भी कम होती है। कोई ऐसा ड्राइवर है क्या, जिसका बच्चा 20-30 हजार रुपये महीने की फीस वाले स्कूल में पढ़ता हो। 90-95 हज़ार तो अदनी सी कंपनी का एग्जिक्यूटिव सैलरी पाता है। उसकी भी लाइफस्टाइल कभी देख लीजिए। EMI और बच्चों की फीस में ही बलटुट हो जाता है। पूरी जिंदगी खच्चर बनकर काम करता है, फिर 2 कमरों का एक मकान खरीद पाता है।

अब इसी चश्मे से आईपीएस नहीं, किसी थानेदार को देखिए। ईमानदारी के तरानों का भ्रम टूट जाएगा। किसी आईपीएस के ऑफिस और कैम्प ऑफिस में खिदमत पर होने वाले खर्च को देख लीजिए, ईमानदारी की सूरत दिख जाएगी। इतनी दूर भी न जाइए। घर के बाहर निकलिए, पूछिए पानवाले से खोखा लगाने के एवज में पुलिसवाला महीने के कितने ले जाता है, अंदाजा लगा लेंगे। एक भी थानेदार बता दीजिए, जिसे उसकी योग्यता पर थानेदारी मिली हो। उस थाने पर कारखास न हो, वसूली न होती हो। हर फरियादी की कानून के अनुसार फौरन FIR दर्ज होती हो।

देखिए साहब, सवाल तो उठेंगे ही। जिम्मेदार पद पर हैं। लोकतंत्र है, जवाब तो देना पड़ेगा। जवाब तो उस पुलिसिंग सिस्टम को भी देना होगा, जिसके कप्तान का आपत्तिजनक वीडियो उसी की नाक के नीचे वायरल हो गया और पूरा अमला हाथ मलता रहा। जब जिले का टॉप पुलिस अफसर अपना आपत्तिजनक कथित वीडियो वायरल होने से नहीं रोक सका तो आम लोगों की ऐसे केस में क्या मदद करेगा?

ईमानदारी के चोले पर सवाल ये भी उठेंगे…

  1. सीनियर अधिकारी की जांच कोई जूनियर कैसे कर सकता है? जांच का यह फैसला ही विवेचना एथिक्स के खिलाफ है।
  2. ईमानदारी पर संदेह नहीं, फिर सीबीआई जांच से परहेज क्यों?
  3. वीडियो की जांच किसी दूसरे राज्य में क्यों नहीं कराई जा रही?
  4. किसके पीठ थापथपाने एक आईपीएस की इतनी जुर्रत हुई कि सर्विस मैनुअल को साइडलाइन कर वरिष्ठ अफसरों के खिलाफ रिपोर्ट CMO को भेजी?
  5. अगर गलत हुआ था तो अपने अफसरों पर यकीन करने से ज्यादा सीएम ऑफिस पर क्यों भरोसा जताया?
  6. एनकाउन्टर में गोली मारकर पकड़े गए बदमाशों को 15 दिन के अंदर जमानत किसकी मदद से मिली, इसकी जांच क्यों नहीं हुई?

Riwa S. Singh : उत्तर प्रदेश के डीजीपी ने कहा है कि नॉएडा के एसएसपी वैभव कृष्ण ने नियमों का उल्लंघन किया है। इस मामले की जांच के लिए मेरठ के एडीजी को 15 दिन का वक़्त दिया गया है। अभी जांच पूरी नहीं हुई और एसएसपी वैभव कृष्ण के मॉर्फ़्ड वीडियो आने लगे हैं। अगर लोग ध्यान नहीं देंगे तो एक और व्यक्ति की खाकी उतर जाएगी या उसकी ज़िंदगी का रंग बदल दिया जाएगा क्योंकि उसने ट्रांस्फर जैसे रैकेट का खुलासा कर दिया।

आप में से बहुत सारे लोग इस रैकेट के बारे में पढ़कर चौंके होंगे लेकिन मुझे यह बहुत सामान्य बात लगी क्योंकि जिस गलियारे में मैं बड़ी हुई हूं वहां ऐसी आवाज़ें भी आती थीं। ज़िला कप्तान की पोस्ट के लिए 50 से 80 लाख रुपये तक की रिश्वत चलती है। निरीक्षक तक को थाना इंचार्ज होने के लिए 10 लाख रुपये का भोग लगाना पड़ता है। यह बात कोई नयी नहीं है, रेट भी बहुत नया नहीं है। नया बस ये है कि ऐसे रैकेट से तंग आकर एक वर्दीधारी ने आवाज़ उठा दी और एक चिट्ठी पहुंच गयी मुख्यमंत्री के पास।

इसे आप सच्चाई और नैतिकता की तरह देख सकते हैं लेकिन जिन्हें जांच करनी है वे यह भी देखेंगे कि एसएसपी ने खाकी के सम्मान को ठेस पहुंचाया है। महकमे में शोर इस बात पर ही होगा कि बग़ावत कर गया। वहां कोई ईमानदारी की वाह-वाही करने नहीं बैठा होगा। जो दो-चार लोग समर्थन करना चाहते भी होंगे वे मन में समर्थन कर के बैठ जाएंगे और वैभव कृष्ण कटघरे में खड़े कर दिये जाएंगे।

उनकी पुरानी फ़ाइलें निकाली जाएंगी, ‘रेडीमेड’ वीडियो तो आने भी लगे हैं। वह कैसा महसूस कर रहे होंगे, कैसा निरादर झेल रहे होंगे इसका हमें अंदाज़ा भी नहीं है। हो सकता है कि उन पुरानी फ़ाइलों में उनकी कोई ग़लती निकल जाए तो क्या उनके इस सही की सज़ा उस ग़लत के आधार पर मिलनी चाहिए?

हो सकता है कोई केस न हो तो केस बनाये जाएं। प्रशासन अपनी क्रिएटिविटी पर आ जाए। आप सोचें कि कितनी उम्मीद से, कितनी हिम्मत जुटाकर उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को वो चिट्ठी लिखी होगी। उन्हें लगा होगा कि योगी सख़्ती से काम लेंगे, वो ले भी रहे हैं लेकिन इसमें ज़रा-सी चूक उस ऑफ़िसर का करियर तबाह कर सकती है। यह कितना बड़ा जोखिम उठाया उस ऑफ़िसर ने, जो रैकेट रवायत बन चुका था उसे सवाल बना दिया। हमें उनके साथ होना चाहिए नहीं तो प्रशासन एक और साहसी व्यक्ति को निगल जाएगा और भनक तक नहीं लगेगी।

हमें इस ख़बर को फ़ॉलो करना चाहिए ताकि उम्मीद की किरण बची रहे, ताकि प्रशासन को अनुशासित रहना पड़े, ताकि ख़ौफ़ हो नैतिकता का, ताकि हिम्मत को हिम्मत मिले और सच को मिले जीत। MYogiAdityanath से अपील है कि इस मामले पर तल्लीनता बनाये रखें ताकि अनुशासन बना रहे।

रिटायर आईपीएस अधिकारी विजय शंकर सिंह, पत्रकार प्रदीप तिवारी और महिला पत्रकार रीवा एस सिंह की एफबी वॉल से.

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