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सियासत

मोदी-शाह चुनावी मशीन बन चुके हैं!

Prashant Rajawat-

मोदी की काट मोदी ही बताएँगे!

कल पत्रकार मित्र अनुज खरे कह रहे थे कि अभी राजनेता जहां हार जीत की ख़ुशी- मातम तक ही सिमटे हुए हैं तब मोदी गुजरात चुनाव का शंखनाद करने पहुँच चुके हैं। वही बात आज राजदीप सरदेसाई भास्कर में लिख रहे की मोदी-शाह चुनावी मशीन बन चुके हैं।

मोदी मैजिक युग में २०२४-२०२९ की जीत जबड़े से खींचनी पड़ेगी और जबड़े से खींची जीत में ज़ोर बहुत लगता है ये विपक्षी दलों को समझना होगा।

मैं फिर दोहराता तिहराता हूँ विपक्षी दलों के नेताओं और समर्थकों से कि अब कपड़े, टोपी, दाढ़ी,मोर और का बा से बात नहीं बनने वाली। इन टुटपुदीयां हरकतों से चीजें बिगड़ेंगी ही। और न ही कुछ साहित्यकार और यूट्यूबर पत्रकारों की सुनियोजित जुगलबंदी से!

बेरोज़गार और महँगायी जैसे बड़े मुद्दों के बाद भी आप चार सौ में से एक सीट पाते हैं। प्रियंका और मायावती जैसे बड़े नाम राजनीतिक गर्त में हैं। करिश्मा देखिए मोदी जहां जहां पहुँचे भाजपा ने ८० प्रतिशत सीटें जीतीं। काशी करिडोर मतदाताओं में विश्वास का वाहक साबित हुआ। टेनी के अत्याचार पर भी बाबा का सुशासन हावी रहा।

आप मुक़ाबले में कहाँ हैं सोचने का विषय है। किसान आंदोलन? चुनाव के नतीजे तो यही बतलाते हैं की इस आंदोलन का किसानों से मानो कोई सरोकार ही न था?

इस बीच एक बड़ी सुंदर चीज़ हुई परिणामों के ठीक बाद भाजपा, संघ व मोदी के कट्टर विरोधी मोदी और संघ के मैकेनिजम और पोलिसी की तारीफ़ करते पाए गए। कई लोग कहते मिले कि संघ के वर्किंग पोलिसी का अध्ययन ज़रूरी है। ये तो वही बात हुईं भीष्म ही भीष्म के मरने का रास्ता सुझाएँगे। मैं इसका स्वागत करता हूँ। अच्छा है आप अपने विरोधी और प्रतिद्वंदी की सफल नीतियों का अध्ययन और विश्लेषण करें।

डॉ. प्रशांत राजावत
सम्पादक, मीडिया मिरर

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