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गुजरात पुलिस की एक बड़ी टुकड़ी मुंबई में अविनाश दास को तलाश रही है!

नवीन कुमार-

फिल्मकार और एनडीटीवी/प्रभात खबर के पूर्व पत्रकार अविनाश दास के खिलाफ गुजरात पुलिस पड़ी हुई है। उनके नाम का वारंट निकल चुका है। उनका अपराध ये है कि उन्होंने भ्रष्टाचार की आरोपी आईएएस पूजा सिंघल के साथ अमित शाह की एक तस्वीर पोस्ट कर दी थी। इसे सैकड़ों लोगों ने रिट्वीट और शेयर किया। जाहिर सी बात है ये गृह मंत्री के महकमे को ये बात अच्छी नहीं लगी होगी। गुजरात पुलिस को सक्रिय किया गया। और अपने आपको गुजरात पुलिस का कारिंदा बताने वाले कुछ लोग अविनाश दास का पता पूछते हुए एक बुजुर्ग फ़िल्म समीक्षक के दरवाजे पर दस्तक देते हैं। अभी अविनाश की टीम कानूनी राहत के रास्ते तलाश रही है।

अविनाश दास सोशल मीडिया पर सांप्रदायिकता, बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार, महंगाई और जातिवाद जैसे मुद्दों पर बहुत मुखर रहे हैं। ऐसे किसी भी व्यक्ति को परेशान करना आज की “पुलिस” का धर्म है। अविनाश को भी इसका अंदाजा रहा ही होगा। मुद्दा यह नहीं है। मुद्दा यह है कि उनके खिलाफ दर्ज हुई एफआईआर और वारंट पर जिस तरह की चुप्पी कथित तौर पर प्रगतिशील समाज में छाई हुई है वो बहुतों को बेनकाब कर रहा है। ऐसे तमाम लोग बहुत सुविधा से अपना पक्ष चुनते रहे हैं। इसमें बहुत से नाम और चेहरे ऐसे हैं जो आलू से अंगोला तक पर अपनी राय रखने के अभ्यस्त हैं। लेकिन अपने एजेंडे के तहत।

प्रतिरोध के चमकने वाले चेहरे इतने छिछले और लिजलिजे होंगे इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। पिछले महीने 6 अप्रैल को दिल्ली के प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में बलिया के पत्रकारों की गिरफ्तारी और न्यूज लॉन्ड्री के पत्रकारों के साथ दिल्ली में बदसलूकी के खिलाफ एक कार्यक्रम था। रोहिणी सिंह उस कार्यक्रम के मुख्य वक्ताओं में से थीं। उनके नाम के पोस्टर छप चुके थे। लोगों को बुलावा भेजा जा चुका था। वह कार्यक्रम साफ तौर पर भाजपा सरकारों में पत्रकारों के दमन के खिलाफ था। बड़ी संख्या में लोग पहुंचे थे। लेकिन रोहिणी सिंह ग़ायब।

न्यूज लॉन्ड्री, क्विंटल और कारवां समेत दूसरे आयोजकों ने इसकी कोई जानकारी नहीं दी कि रोहिणी सिंह गायब कहां हो गईं। रोहिणी सिंह उन सिद्धार्थ वरदराज के द वायर की प्रतिनिधि थीं जिनके घर उत्तर प्रदेश पुलिस पहुंच गई थी। इसके आगे पीछे वो गुजरी शामों की दावतों की तस्वीरें पोस्ट करती रहीं। यह परले दर्जे की होशियारी थी। दरअसल रोहिणी सिंह और उन जैसे तमाम लोग बहुत शातिर तरीके से प्रतिरोध के विषय और संदर्भ चुनते हैं। यह एक गिरोह है जिसकी बाड़ेबंदी फासीवाद के खित्ते में गिरती है।

अविनाश दास की गिरफ्तारी आज नहीं तो कल तय है। गुजरात पुलिस की एक बड़ी टुकड़ी मुंबई में घूम रही है। इसके बाद उनकी जमानत भी तय है। लेकिन जिन लोगों ने अविनाश पर हुए मुकदमे पर जुबानें सिल रखी हैं समय उन्हें भी दर्ज कर रहा है। अविनाश ने खुद दिल्ली की रोहिणी सिंह की “पार्टी” से विचारधारा के स्तर पर साथ और समर्थन मांगा था। जिनसे नहीं मांगा था उन्हें पता है कि ऐसे मौकों पर नैतिकता की दुहाईयां क्या कहती हैं। लेकिन उन सब लोगों ने बहुत होशियारी के साथ किनारा कर लिया। कइयों के मैं नाम जानता हूं। जो शाहीनबाग से लेकर जहांगीरपुरी तक मानवीय मूल्यों का तरफदार होने का ढोंग रचते रहे/रही हैं।

ऐसे लोगों के गिरोह को पहचाना जाना बहुत जरूरी है। सोचकर देखिए। जिनकी जुबानों को आप प्रतिरोध का प्रतिनिधि मानने लगे हैं वो आवाजें समय और सियासत की सौदागर निकलीं तो लोकतंत्र के विवेक का सवाल किसके कदमों में गिरवी होगा। क्या पता वो वो गिरवी रख चुके हों। दुश्मनों से लड़ना हमेशा आासान होता है बनिस्पत दोस्त की तरह नजर आने वाले दुश्मनों के।

समर शेष है
नहीं पाप का भागी केवल व्याध
जो तटस्थ हैं
समय लिखेगा उनके भी अपराध…

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