इस दौर के ज्यादातर पत्रकार और संपादक इंसान कहलाने लायक नहीं!

Samarendra Singh : मैंने आईआईएमसी से पत्रकारिता की पढ़ाई की थी. मेरे दौर में एक से बढ़ कर एक अध्यापक थे. आप उनसे बहस कर सकते थे. लड़ सकते थे. बुरा लगे तो यहां तक कह सकते थे कि आपके पढ़ाने के तरीका पसंद नहीं आ रहा है. और वो सुनने के बाद अपना तरीका सुधारने में जुट जाते थे.

हमारे गुरू महान थे. तो हमारे उन महान और प्यारे गुरुओं ने हमें एक बात सिखाई थी कि अच्छा पत्रकार बनने के लिए अच्छा इंसान बनना जरूरी है. यह बात मेरे जेहन में हमेशा जिंदा रही. तब भी जब मैं पत्रकार था और अब भी जब मैं पत्रकार नहीं हूं.

चूंकि मैंने पत्रकारिता का पेशा बहुत पहले छोड़ दिया है, इसलिए मैं आमतौर पर इस पर टिप्पणी करने से बचता हूं. लेकिन आज एक साधारण दर्शक और पाठक की हैसियत से यह दावे से कह सकता हूं कि कुछ लोगों को छोड़ कर इस दौर के ज्यादातर पत्रकार और संपादक इंसान कहलाने लायक भी नहीं हैं. ये जाहिलों की एक ऐसी फौज है जो देश को बर्बाद करने पर तुली है.

Prabhat Dabral : इस बार चुनाव परिणाम दिखाने में आकाशवाणी/ दूरदर्शन सबसे तेज़ रहे. इसका मतलब ये हुआ कि उन्होंने अपने स्रोतों का सही इस्तेमाल किया इसीलिये वो बाकीचैनलों से आगे रहे. ये तो अब आप जानते हैं – लेकिन इसका अर्थ क्या है ये मुझसे सुनिए जिसने आठ साल दूरदर्शन में काम कियाहै, छह अलग अलग प्रधानमंत्रियों के साथ (राजीव गाँधी, वीपीसिंह, नरसिम्हाराव, चंद्रशेखर, देवेगौड़ा और वाजपेयी जी).

आकाशवाणी/दूरदर्शन के समाचार तंत्र में दो तरह के कर्मचारी होते हैं. एक तो प्रोफेशनल जो ज्यादातर कॉट्रैक्ट वाले या अस्थायी होते हैं और दूसरे वो जो आईएएस/ आईआईएस के डेपुटेशनिस्ट होते हैं. काम प्रोफेशनल करते हैं पर राज डेपुटेशनिस्ट का चलता है जो सरकार के इशारे पर चलते हैं. जब तक सरकार का डंडा चलता है डेपुटेशन वालों की तूती बोलती है. लेकिन सरकार की धमक कमज़ोर होते ही प्रोफेशनलों की बात चलने लगती है.

इस बार जहाँ प्राइवेट चैनल असली बात बताने से डर रहे थे, आकाशवाणी ने पहल की और पहले ही बता दिया कि झारखण्ड में बीजेपी हार रही है. जाहिर है प्रोफेशनलों के सामने डेपुटेशनिस्ट या तो कमज़ोर पड़ गए या उन्हे भी लग गया कि अब सरकार उनका कुछ बिगाड़ पाने की स्थिति में नहीं है.

मुझे लग रहा है जुगल जोड़ी का आतंक कम हो रहा है – देश के लिए ये अच्छी खबर है….

Mukesh Kumar : मीडिया अभी भी इस मिथ को बनाए रखने में जुटा हुआ है कि मोदी की लोकप्रियता का जादू बरकरार है। हो सकता है ये उसकी मजबूरी हो या अपर क्लास-अपर कास्ट आग्रहों के चलते वह ऐसा कर रहा हो।

मगर सचाई ये है कि पोल खुल चुकी है। विकल्पहीनता ने जो थोड़ा बहुत भ्रम बनाए रखा था वह अब कभी भी टूट सकता है क्योंकि जनता अब खुद विकल्प बनकर उभर रही है। वैसे बीच चुनाव में पुलवामा-बालाकोट न किया होता तो जनता ने उसी समय खेल कर दिया होता।

पत्रकार त्रयी समरेंद्र सिंह, प्रभात डबराल और मुकेश कुमार की एफबी वॉल से.

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One comment on “इस दौर के ज्यादातर पत्रकार और संपादक इंसान कहलाने लायक नहीं!”

  • uttam agrawal says:

    मुकेश कुमार की बात बिल्कुल भी सही नही दिख रही ,कम से कम आंकड़ो से
    तो बिल्कुल नहीं ।
    सीट का ज्यादा आना या न आना काफी हद तक गठबंधन पर निर्भर करता है और 51 फीसदी वोट आज तक कोई पार्टी नही लाई ,जिसका उदाहरण हम दे सके
    रही वोट प्रतिशत की बात
    हर चुनाव में भाजपा के वोट बढ़े हैं यहां तक झारखंड चुनाव में भी 2 फीसदी बढ़े है ,महाराष्ट्र में अगर गठबंधन साथी धोखा दे गया तो उसका ठीकरा भाजपा पर फोड़ने वालो की पत्रकारिता की निष्पक्षता सन्देह के घेरे में है या फिर संवाद माध्यम में नए बने 2 गुट में से एक गुट के कार्यकर्ता हैं

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