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हमारी व्यवस्था – जिसमें जनप्रतिनिधियों को जमानत नहीं, बलात्कारियों के लिए माला

संजय कुमार सिंह

आज के सभी अखबारों की लीड अलग है। इसका मतलब है कोई सरकारी खबर नहीं है जिसे अखबारों ने तान देने लायक समझा या सभी अखबारों ने किसी एक खबर को तानने लायक नहीं पाया है। जो भी हो, चुनाव का समय है मैं पहले तो आपको आज की खास खबरें बताता हूं फिर बताउंगा कि इन खबरों से क्या खास बातें याद आती हैं और आप मानेंगे कि सब अस्त-व्यस्त है। निर्वाचित मंत्री को जमानत नहीं, बलात्कारियोंको माला और यौनशोषण तथा मारपीट के आरोपी संवैधानिक सुरक्षा में हैं और ऐसे में सब मिलाकर व्यवस्था लगभग चौपट है। चुनाव के समय लेवल प्लेइंग फील्ड तो छोड़िये विपक्षी दलों के खाते फ्रीज हैं, नेता जेल में हैं और जमानत मिल गई तो देश के गृहमंत्री की सुप्रीम कोर्ट पर टिप्पणी!

इसमें सबसे खास बात है कि भाजपा टिकट पर चुनाव लड़ रहे हाईकोर्ट के पूर्व जज साब पर चुनाव आयोग ने रोक लगाई है। कल आप पढ़ चुके हैं कि बंगाल हाई कोर्ट ने चुनाव आयोग की निन्दा की थी और अब देखिये कि प्रधान प्रचारक और देश के प्रधानमंत्री चुनाव प्रचार के नाम पर जो मन में आ रहा बोल रहे हैं, उनके लिए कोई आधार संहिता नहीं है। हिन्दू मुसलमान से बात नहीं बनी, प्रमुख विपक्षी दल कोस रहे हैं। देश के गृहमंत्री कह रहे हैं कि उनके ज्यादा समर्थक पाकिस्तान में हैं। आज की ये सब खबरें एक से ज्यादा अखबारों में हैं। यहां मैं वही शीर्षक ले रहा हूं जिससे आपको खबर की खास बातें मालूम हो जायें।

1. हिन्दुस्तान टाइम्स

– विमान यात्रा के दौरान गड़बड़ी से एक व्यक्ति की मृत्यु, 30 बीमार / जख्मी। सिंगापुर का यह विमान लंदन से सिंगापुर जा रहा था और रास्ते में गड़बड़ी के कारण उसे बैंकाक उतरना पड़ा। (अधपन्ने की लीड)

– मोदी और विपक्ष : पांच दौर के बाद मोदी और विपक्ष दोनों ने जीत का दावा किया। खरगे ने पीएम पर हमला तेज किया, कहा वे हार रहे हैं।

– पुणे में महंगी कार से दो लोगों को कुचल कर मार डालने वाले अवयस्क के पिता को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। 

2. टाइम्स ऑफ इंडिया

– 14 साल की लड़की का अश्लील वीडियो बनाने वाले लड़के को सुप्रीम कोर्ट से भी जमानत नहीं। लड़के ने वीडियो क्लिप सार्वजनिक कर दिया था इसके बाद लड़की ने आत्महत्या कर ली। सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड हाईकोर्ट के आदेश को कायम रखा। (अधपन्ने की लीड)

– पुणे की महंगी कार पोर्श के स्वामी और एक मशहूर बिल्डर को गिरफ्तार कर लिया गया है 

– कर्नाटक सरकार ने विदेश मंत्रालय से अपील की है कि प्रज्वल रेवन्ना का पासपोर्ट रद्द कर दिया जाये। इस मामले में केंद्र सरकार के कान पर जूं नहीं रेंग रही है।

– फरीदाबाद से अपहृत कारोबारी को पुलिस ने नोएडा – ग्रेटर नोएडा रोड पर पकड़कर छुड़ाया।    

– विमान में सीट से ज्यादा यात्री, उतारा गया। विमान पक्षियों के झुंड में 39 फ्लेमिंगो मरे। 

– पहली नजर में सिसोदिया के खिलाफ धन सोधन का मामला है : हाईकोर्ट

– (सिसोदिया को) जमानत से इनकार, कहा आबकारी नीति की प्रक्रिया खराब की गई

3. द हिन्दू

– बिहार में मतदान के अगले दिन भाजपा राजद कार्यकर्ता भिड़े, दो मरे

– हेमंत सोरेन के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि अदालत ने जब संज्ञान ले लिया है तो गिरफ्तारी को अवैध कहा जा सकता है।

यहां मुझे न्यूक्लिक के संस्थापक प्रबीर पुरकायस्थ का मामला याद आता है। सुप्रीम कोर्ट ने हाल में यूएपीए में उनकी गिरफ्तारी को अवैध ठहराया था और जेल से रिहा कर दिया था। यह मामला अलग है, उन्होंने चुनाव प्रचार के लिए अंतरिम जमानत की मांग की है लेकिन मुद्दा यह है कि उन्हें 31 जनवरी को गिरफ्तार किया गया था और अभी गिरफ्तारी पर फैसला होना है। चुनाव के समय नेता की गिरफ्तारी और चुनाव प्रचार का मौका कायदे से चुनाव आयोग भी दे सकता है। पर यह न्याय की स्थिति तो है ही। एक मुख्यमंत्री के मामले में जिसे गिरफ्तार होने के लिए इस्तीफा देना पड़ा नहीं तो शायद सरकार गिर जाती और जिसने इस्तीफा नहीं दिया उसे लोग नैतिकता का पाठ पढ़ा रहे हैं। और महाराष्ट्र का ऐसा एक मामला जनता की अदालत में चल रहा है। सब भाजपा का किया धरा है लेकिन उसके काम समीक्षा से परे लगते हैं। पीएम केयर्स हो या इलेक्टोरल बांड या जजों को ईनाम देना।  

– पूर्व जज से भाजपा उम्मीदवार बने अभिजीत गंगोपाध्याय को चुनाव आयोग ने सेंसर किया, 24 घंटे के लिए प्रचार से प्रतिबंधित किया

4. इंडियन एक्सप्रेस

– हाई कोर्ट ने सिसोदिया की जमानत की अपील खारिज की सबूतों से छेड़छाड़ की आशंका है। खबर का फ्लैग शीर्षक, सत्ता के गंभीर दुरुपयोग और विश्वास घात का मामला है। अदालत ने कहा है कि इसमें निर्णय लेने की ईमानदारी से समझौता किया गया था।

एक खबर अरविन्द केजरीवाल की है। शीर्षक है, शाह को निशाना बनाया क्या आप हमारे मतदाताओं को पाकिस्तानी कह रहे हैं, आप प्रधानमंत्री नहीं बनेंगे। एक दिन पहले अमित शाह ने कहा था कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल और कांग्रेस नेता राहुल गांधी के समर्थक भारत के मुकाबले पाकिस्तान में ज्यादा हैं।

5. द टेलीग्राफ

दिल्ली में बेहतर संयोजन की जरूरत (फ्लैग शीर्षक है)। मुख्य शीर्षक है, आम आदमी पार्टी और कांग्रेस एक अजीब स्थिति में हैं। यह खबर दोनों दलों के बीच बेहतर तालमेल की कमी बताती है लेकिन मेरी दिलचस्पी यह जानने में है कि इस तालमेल का चुनाव नतीजों पर कितना असर होगा। ऐसी कोई खबर अभी तक दिखी नहीं है। (अगर इसका मतलब एक ही उम्मीदवार को दोनों दलों के वोट मिलने भर से हो तब भी। राहुल गांधी अपनी रैली में इसे अच्छी तरह समझा चुके हैं इसलिए संयोजन अब मुद्दा नहीं रह जाता है क्योंकि 25 को मतदान है)।

दूसरी खबर संदेशखाली की है, दुखी मुख्यमंत्री ने संदेशखाली जाने का प्रण किया। अखबार का आज का कोट हिन्दी में कुछ इस तरह होगा, जैसे ही हमारे उम्मीदवार, हाजी नुरुल बशीरहाट से चुनाव जीतते हैं, मैं सबसे हले संदेशखाली जाउंगी। मैं वहां जाउंगी और लोगों से मुलाकात करूंगी – ममता बनर्जी।

6. नवोदय टाइम्स   

– और चलेगा गर्मी का दौर

– सारण में चुनाव बाद हिन्सा

दूसरे पहले पन्ने पर

–  इंडिया की मानसिकता महिला विरोधी : मोदी

– समाज में नफरत को बढ़ावा दे रहे मोदी : खरगे

– मध्य प्रदेश नर्सिंग महाविद्यालय घोटाला मामले में खुलासा – सीबीआई दलों ने हर संस्थान से ली दो से 10 लाख रुपये की रिश्वत।

7. अमर उजाला

कांग्रेस व साथियों ने चार पीढ़ियां तबाह कीं, केंद्र में मजबूत सरकार जरूरी : मोदी। इस खबर का उपशीर्षक है, चार जून को भ्रष्टाचार, तुष्टीकरण की राजनीति करने वाले इंडी गठबंधन को लगेगा बड़ा झटका।

नरेन्द्र मोदी को मंच और माइक देता अमर उजाला

कहने की जरूरत नहीं है कि प्रधानमंत्री न सिर्फ बे-सिर-पैर की बात कर रहे हैं बल्कि हिन्दू मुसलमान भी पूरा कर चुके हैं और ऐसे में चुनाव आयोग ने जब कोई कार्रवाई नहीं की तो कोई जरूरी नहीं है कि अखबार उन्हें अपना मंच और माइक दें। प्रधानमंत्री को जो बोलना था, उन्होंने रैली या जनसभा में कहा, वहां के लोगों ने सुन लिया और अपने हिसाब से कार्रवाई करेंगे पर इसे अखबार में छाप कर समर्थन और मान्यता देना कोई जरूरी नहीं है। ऐसे में यह प्रस्तुति संपादकीय स्वंतत्रता और विवेक का मामला है जो इसपर भी चर्चा की जरूरत बताता है। टेलीविजन मीडिया की अपनी कहानी है और ऐसे में जो हालात हैं वो देखने-समझने और ध्यान देने लायक है। आज के अखबारों से पता चलता है कि मेरा भारत महान है। आइये देखें कैसे?

दिल्ली की नई उत्पाद नीति, जो वापस ले ली गई – में साजिश है। प्रक्रियाओं का पालन नहीं हुआ। अधिकारों का दुरुपयोग हुआ और जन सेवा के सबसे अच्छे काम करने वाले मंत्री को जमानत देने की जरूरत नहीं है और मौजूदा व्यवस्था में वे इसके अधिकारी भी नहीं हैं जबकि हत्यारों बलात्कारियों को जमानत होती रही है और माला पहनाई गई है। देश जानना चाहता है वाले पत्रकार को हफ्ते भर में सुप्रीम कोर्ट से जमानत का रिकार्ड है। उसने जिसके पैसे मार लिये थे उसकी चिन्ता किसी ने नहीं की। आज की खबरों के अनुसार मनीष सिसोदिया के खिलाफ पहली नजर में मनी लांडरिंग का केस है और इसलिए सरकार को उन्हें दोषी साबित करने की जरूरत नहीं है उन्हें खुद को निर्दोष साबित करना है।

  • इस आशय का एक कानून है। मैं कानून का जानकार नहीं हूं इसलिए उसपर कुछ नहीं कह सकता लेकिन सूचना है कि इसे सही ठहराने वाले जज साब ईनामी हैं। बोले तो पहले अपराधी ईनामी होते थे। उन्हें पकड़ने के लिए ईनाम घोषित होता था। अब अनुकूल फैसले देने वाले कई जजों को ईनाम मिला है। इसलिए ईनामी जज। ईनाम लिख दूं तो जज साब की पहचान हो जायेगी और पता नहीं कानून क्या है इसलिए मैं नहीं लिख रहा लेकिन वह सरकारी पद है।
  • इस कानून के बारे में कहा जाता है कि इससे आरोपी के बुनियादी अधिकारों का हनन होता है। इससे संबंधित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई नहीं हो सकी क्योंकि एक खबर के अनुसार सरकार ने तर्कों का जवाब देने के लिए समय मांग लिया। सरकार के विरोध के बावजूद पीठ बनी थी पर उसे भंग करना पड़ा क्योंकि जिस जज के नेतृत्व में पीठ बनी थी वो रिटायर हो गये और सरकार ने अपना पक्ष नहीं रखा।
  • मुझे लगता है कि जिस देश में हजारों लाखों लोगों को पेंशन नहीं मिलती, बुढ़ापे में सुविधायें तो छोड़िये अपने पैसे से बीमा भी नहीं होता और रेल किराये में छूट इसी लोकप्रिय सरकार ने वापस ले ली है और देने वाले मंत्री भ्रष्टाचारी साबित हो चुके हैं उस देश में पेंशन पाने वालों को रिटायरमेंट के बाद नौकरी नहीं देने का नियम होना चाहिये। लेकिन उसपर बात तब होगी जब मीडिया अपना काम करेगा और वो तो सरकारी विज्ञापनों के लिए लार टपका रहा है।
  • ऐसा ही एक विज्ञापन आज के अखबारों में है। दिल्ली में 25 को मतदान है। आज हिन्दी और अंग्रेजी अखबारों में अलग-अलग विज्ञापन है। हिन्दी वाले में प्रधानमंत्री की कथित विजय संकल्प सभा की सूचना है तो अंग्रेजी वाले में मोदी सरकार के पिछले 10 साल के काम और अगले पांच साल की योजना का विवरण है।

कहने की जरूरत नहीं है कि विज्ञापन सरकारी हों या पार्टी के – आम के आम और गुठलियों के दाम देने वाले हैं। लगभग सभी (जिन्हें सरकार जी ने लायक माना) अखबारों ने 10 साल प्रेस कांफ्रेंस नहीं करके मन की बात करने वाले प्रधानसेवक या उनके खास मंत्रियों का इंटरव्यू छापा है। अब यह रिश्ता खुलेआम दिखता है पहले पेड न्यूज होने का शक होता था।  

इलेक्टोरल बांड, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक करार दिया जिससे करोड़ों की वसूली हुई और चंदा दो ठेका लो, चंदा दो जमानत लो जैसे मामले नजर आते हैं उसमें जांच की भी जरूरत नहीं है। शेल कंपनियां बंद किये जाने के बावजूद 20,000 करोड़ रुपये का निवेश कैसे हो गया पता नहीं चला जांच की कोई मांग भी नहीं है।

एक मामले में पूरी पार्टी जिम्मेदार ठहराई गई है। उसका पंजीकरण रद्द करने की मांग की चल रही है। दूसरी पार्टी अनुकूल फैसला देने वाले जजों को ईनाम देने के बाद टिकट देकर चुनाव लड़ा रही है और उनपर चुनाव आयोग को प्रतिबंध लगाना पड़ा।

इलेक्टोरल बांड वाली पार्टी ने महिला खिलाड़ियों का यौनशोषण और इस नाते उनका कैरियर तथा खेल में देश की संभावना खराब करने के जिम्मेदार और आरोपी अपने सांसद की भरसक रक्षा की फिर भी महीनों बाद पुलिस ने आरोप तय कर दिये हैं। पार्टी ने उनके बेटे को टिकट दिया है। पीड़ितों की चिन्ता किसी को हो तो सार्वजनिक नहीं है।   

भ्रष्टाचार के एक मामले में आरोपी आम आदमी पार्टी की एक महिला सांसद ने आरोप लगाया कि उन्हीं की पार्टी के मुख्यमंत्री के घर में उनकी पिटाई हुई। मेडिकल रिपोर्ट में खरोंच लगने की पुष्टि हुई है। पुलिस ने आरोपी, मुख्यमंत्री के सहायक को गिरफ्तार कर लिया है।

दिल्ली के उपराज्यपाल ने पूछा है कि मुख्यमंत्री इस मामले में क्यों चुप हैं। आम आदमी पार्टी ने कहा है कि इससे पुष्टि होती है कि वे बीजेपी के लिए काम (आम आदमी पार्टी को बदनाम और मुश्किल में डालने का) कर रही हैं। वाशिंग मशीन पार्टी को याद कीजिये तो सब कुछ समझ में आ जायेगा।

ये चिन्ता उस पार्टी के राज्यपाल को है जिसपर मारपीट का मामला है और संवैधानिक पद पर होने के कारण अदालत ने राहत दे रखी है। पार्टी मुख्यमंत्री के जेल में होने के कारण चाहती है, लोगों ने मुकदमे किये हैं कि उन्हें इस्तीफा देने के लिए मजबूर किया जाये।

जहां तक चुप रहने की बात है, पश्चिम बंगाल के राज्यपाल पर राजभवन में काम करने वाली एक महिला ने यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया है। राज्यपाल संवैधानिक सुरक्षा में है (सांसद पार्टी की कवच सुरक्षा में रहे) और पुलिस लगभग कुछ नहीं कर पा रही है। नैतिकता के आधार पर पार्टी में इस्तीफे नहीं होते हैं। और कार्यकर्ता तो छोड़िये ट्रोल भी ऐसे मामलों पर ट्रीट नहीं करते हैं।

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