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सुख-दुख

क्या वाकई आपको थ्री बीएचके फ्लैट की ज़रूरत है?

संजय सिन्हा-

मेरे एक परिचित दिल्ली एनसीआर में एक फ्लैट खरीदने के लिए परेशान हैं। उन्हें चाहिए तीन बेड रूम का फ्लैट। जिसमें एक ड्राइंग, डाइनिंग रूम हो। तीन कमरे हों। ये एक कॉमन सोच है। थ्री बेडरूम विद ड्राइंग एंड डाइनिंग।

परिचित का बजट उन्हें परमिशन नहीं दे रहा थ्री बेडरूम खरीद पाने के लिए। इन दिनों दिल्ली एनसीआर की प्रॉपर्टी में आग लगी पड़ी है।

संजय सिन्हा ने परिचित से कहा कि आप तीन बेडरूम वाला फ्लैट ही क्यों लेना चाहते हैं? दो वाला ले लीजिए।

सुनिए उनकी दलील।

असल में ये उनकी दलील नहीं है, यही है सामान्य सोच। एकदम लकीर के फकीर वाली समझ।

एक कमरा उनका (पति-पत्नी), एक उनके छोटे बेटे के लिए और एक…? “गेस्ट के लिए।” हा हा हा।

मैंने परिचित से पूछा कि इतने साल से आप दिल्ली एनसीआर में हैं, कितने गेस्ट घर आए जो रुके हों? “एक भी नहीं।”

मैंने कहा कि जब गेस्ट हैं ही नहीं तो फिर कमरा क्यों?

“अगर आ गए तो? सब के पास तो थ्री बेडरूम होते हैं।” “कौन गेस्ट आएगा?” “ये भी नहीं मालूम।”

आज की कहानी इतनी ही है। इस व्यस्त शहर में किसी के पास गेस्ट नहीं हैं। हैं तो कोई चाहता नहीं कि वो घर आएं और रुकें। पर गेस्ट रूम चाहिए।

आदमी चाहता है कि गेस्ट रूम हो, लेकिन दिल में गेस्ट के लिए जगह नहीं तैयार करता है। मैंने परिचित से कहना चाहा कि पहले दिल में गेस्ट के लिए रूम तैयार कीजिए, फिर सीमेंट के कमरे के विषय में सोचिए। नहीं तो…

सर्दी में हमारा घर सिकुड़ जाता है। पांच कमरों वाला फ्लैट एक कमरे में समा जाता है। जितने परिजन आते हैं, सब एक ही बेड रूम में।

जब हम 22 वें माले का अपना पेंट हाउस, जिसमें बहुत बड़ा टेरेस था, उसे छोड़ कर चौथे माले के उस फ्लैट में शिफ्ट करने को लेकर दुविधा में थे, जिसमें ठीक टेरिस की जगह एक बहुत बड़ा बेड रूम था, तब मेरी जयपुर वाली दीदी ने कहा था, संजू टेरिस की जगह बड़े बेडरूम को चुनना।

“लेकिन दीदी, टेरेस का अपना मजा है। लोग आएंगे, खूब पार्टी करेंगे।”

दीदी ने कहा था कि टेरेस पर जो पार्टी करोगे, वो तो कभी-कभी करोगे, लेकिन घर में जो लोग आएंगे, उनके साथ बेडरूम में जो बैठक लगाओगे, उसका मजा अलग होगा। और तुम्हारे यहां तो गेस्ट आते ही रहते हैं। जब छोटा फ्लैट था, तब इतने लोग आते थे, अब तो तुम्हारे पास संसार का सबसे बड़ा परिवार है… जब बड़ा बेड रूम होगा तो तुम्हें अधिक सोचना नही पड़ेगा। उसी में बेड रखना, उसी में सोफा, उसी में टीवी, उसी में टेबल। और जो बहुत से गेस्ट आ जाएं तो बेडरूम के फर्श पर बिस्तर बिछा कर सारी रात कहानियां सुना सकते हो, सुन सकते हो।

दीदी के मुंह से सुन कर मुझे याद आया कि कैसे जब हम गांव जाते थे तब गर्मी के मौसम में आंगन में चारपाई लगा कर पूरा परिवार सोता था। उसमें लाल दादी (दादी की देवरानी) हमें कहानी सुनाती थीं और सच में हमारी रातें छोटी होती थीं, कहानी लंबी होती थी।

यही सुख हम सर्दियों में नहीं उठा पाते थे। सब अपने-अपने कमरों में। सर्दियों की रातें लंबी होती थीं, दिन छोटे।

लेकिन जब से बड़े बेड रूम वाले फ्लैट में शिफ्ट हुआ हूं, हमारी सर्दियों की रातें भी छोटी होने लगी हैं।

आपको पता है कि हमारे घर बहुत से परिजन आते हैं। सारा दिन गप। और रात में वहीं फर्श पर गद्दा लगता है और उसमें मोटी रजाई और फिर रात गुजरती है गरमा-गरम कॉफी और चाय की चुस्कियों और ढेर सारी यादों के संग।

परिजनों, रिश्तेदारों के संग अब सर्दी की रातें भी छोटी लगने लगी हैं। एक कहानी शुरू होती है, वो खत्म नहीं होती कि दूसरी शुरू।

आप सोचेंगे कि संजय सिन्हा आखिर आज बड़े बेडरूम वाले फ्लैट की कहानी क्यों सुना रहे हैं?

असल बात ये है कि इन दिनों मैं जितने नए फ्लैट देख रहा हूं, उसमें कमरे तो चाहे तीन, चार हों लेकिन कमरों का साइज वही दस, बारह फीट का होता है। एक बेड लगा, कमरा गायब। अब ऐसे में होता क्या है, घर में मेहमान आते हैं तो एक कमरा जो उनके लिए होता है

(अगर जो तीन या चार कमरे हुए तो) तो खाना खाकर मेहमान अपने कमरे में, मेजबान अपने कमरे में। सारा दिन औपचारिक बातें, औपचारिक मुलाकातें। सारा दिन ड्राइंग रूम में चमगादड़ की तरह सोफे पर लटके रहिए।

मेरा मानना है कि ड्राइंग रुम मैं औपचारिक रिश्ते निभते हैं, और आपके कमरे में घरेलू। ड्राइंग रूम में दिल की बातें हो ही नहीं सकती हैं। वहां बस बैठ सकते हैं, बतिया नहीं सकते। लेकिन जो आपने किसी के साथ बेडरूम में बैठक लगाई तो फिर कहना ही क्या?

इन दिनों बड़े से फ्लैट के सारे कमरे खाली प़ड़े हैं, जितने लोग आए, सब बेडरूम में ज़मीन पर गद्दा बिछा कर दिल के रिश्तों में शुमार हो गए। ऐसा लगता है जैसे शादी का घर हो।

पहले जब घर से किसी की शादी होती थी, तब हमारे घर ऐसी ही रौनक हुआ करती थी। रिश्तेदार जमीन पर गद्दे लगा कर सोते थे। सब साथ खाते थे। लेकिन पिछले कई वर्षों से मैं महसूस कर रहा था कि शहरों में रिश्ते बेरौनक हो गए हैं। सारा दिन साथ रहे, अजनबियों की तरह। लेकिन बड़े बेडरूम ने फिर से रिश्तों में रौनक ला दी है।

लेकिन ये कब हुआ? ये तब हुआ जब कभी मेरे एक बेडरूम वाले फ्लैट में भी गेस्ट की भरमार रहती थी। पूरा ड्राइंग रूम रात में बिस्तर से भर जाता था। मेहमान आते थे, सारी रात हम मस्ती करते थे।

फिर हम दो बेड रूम में गए। फिर थ्री में। फिर सीधे पांच में।

पर कमरों से क्या होता है? जो घर आ सकते हैं, वो बेडरूम में समा सकते हैं। सारी रात धमाचौकड़ी कर सकते हैं। लेकिन…

नोट-

  • पहले दिल में गेस्ट के लिए जगह बनानी होती है, फिर गेस्ट रूम। नहीं तो क्या फायदा? बेचारे परिचित कर्ज लेंगे, फ्लैट खरीदेंगे, सीमेंट का कमरा ढोएंगे। गेस्ट नहीं आएंगे।
  • गेस्ट (परिजन) दिल के कमरे में आते हैं, क्योंकि वो दिल लेकर आते हैं, दिल महसूस करके आते हैं। कमरे सीमेंट के होते हैं, गेस्ट नहीं। गेस्ट तो धड़कते दिल वाले होते हैं, धड़कते दिल वालों के पास जाते हैं, जहां गए, भले उनके पास सीमेंट के कमरे न हों।
  • बड़े कमरे वाला फ्लैट लीजिए, अधिक कमरे वाला नहीं। जो आए, वहीं समा जाए। पर पहले दिल का आकार बढ़ाइए।
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