वॉशिंगटन/नई दिल्ली: भारतीय अरबपति गौतम अडानी और उनकी कंपनियों के प्रतिनिधियों ने ट्रंप प्रशासन के अधिकारियों से मुलाकात कर उनके खिलाफ विदेशी रिश्वत मामले में चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने की अपील की है। इस मामले से परिचित लोगों के अनुसार, यह बातचीत इस वर्ष की शुरुआत में शुरू हुई थी और हाल के हफ्तों में इसमें तेजी आई है।
ब्लूमबर्ग की वेबसाइट में प्रकाशित इस खुलासे के अनुसार, अडानी पक्ष यह तर्क दे रहा है कि इस मामले में उनकी जांच राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की प्राथमिकताओं से मेल नहीं खाती और इसे दोबारा विचार में लिया जाना चाहिए। हालांकि, अडानी समूह के एक प्रतिनिधि ने इस पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया, वहीं अमेरिका के न्याय विभाग और व्हाइट हाउस के प्रवक्ताओं ने भी जवाब नहीं दिया।
सोमवार को मुंबई में अडानी समूह की कंपनियों के शेयरों में तेज उछाल देखा गया। अडानी एंटरप्राइज़ेज लिमिटेड के शेयरों में 6.2 प्रतिशत की बढ़त दर्ज की गई, जो 16 जनवरी के बाद सबसे अधिक है।
गौरतलब है कि ट्रंप की चुनावी जीत के कुछ दिन बाद बाइडन प्रशासन ने गौतम अडानी (62 वर्ष), उनके भतीजे सागर अडानी और कुछ अन्य के खिलाफ रिश्वतखोरी और धोखाधड़ी के आरोपों में अभियोग दायर किया था। अमेरिकी अभियोजकों का आरोप था कि अडानी ने भारत में सोलर-पावर कॉन्ट्रैक्ट्स हासिल करने के लिए 250 मिलियन डॉलर (लगभग 2,000 करोड़ रुपये) की रिश्वत देने का वादा किया था। अडानी समूह ने इन आरोपों को खारिज किया है।
सूत्रों के मुताबिक, अडानी ने अमेरिका में अपनी छवि और कारोबार को बचाने के लिए कई माध्यमों से दबाव डालने की रणनीति अपनाई है। उन्होंने भारत सरकार के अधिकारियों से भी परामर्श किया कि ट्रंप प्रशासन से कैसे संपर्क साधा जाए, क्योंकि दोनों देशों के नेता आर्थिक संबंधों को मजबूत करने की कोशिश में हैं। इस संबंध में प्रधानमंत्री कार्यालय और विदेश मंत्रालय ने कोई टिप्पणी नहीं की है।
अमेरिका में अडानी ने नामी वकीलों और लॉबिंग फर्मों को अपने पक्ष में काम पर लगाया है। जानकारी के अनुसार, मार्च में ब्रुकलिन स्थित यूएस अटॉर्नी ऑफिस और केंद्रीय न्याय विभाग के अधिकारियों के साथ एक बैठक भी हुई थी। इन वार्ताओं में कर्कलैंड एंड एलिस लॉ फर्म के मार्क फिलिप ने अडानी की ओर से प्रमुख भूमिका निभाई। साथ ही, बीजीआर ग्रुप – जो ट्रंप प्रशासन के भीतर प्रभाव के लिए जानी जाती है – को भी अडानी के प्रतिनिधित्व के लिए नियुक्त किया गया।
अमेरिकी लॉबिंग रजिस्ट्रेशन रिकॉर्ड के अनुसार, बीजीआर ग्रुप भारत की ओर से ट्रंप प्रशासन के साथ व्यापार वार्ताओं में भाग लेती रही है। हालांकि, अडानी के लिए काम कर रही फर्मों ने इस पर कोई टिप्पणी नहीं की।
ट्रंप प्रशासन का रुख विदेशी भ्रष्टाचार कानून (Foreign Corrupt Practices Act – FCPA) को लेकर पहले से ही उदार रहा है। फरवरी में ट्रंप ने एक कार्यकारी आदेश जारी कर अटॉर्नी जनरल पाम बॉन्डी को निर्देश दिया था कि जब तक नई दिशा-निर्देश जारी नहीं होते, तब तक FCPA से जुड़े सभी मामलों पर रोक लगाई जाए।
इसके बाद, कुछ मामलों में कार्यवाही वापस भी ली गई। उदाहरण के लिए, Cognizant टेक्नोलॉजी के पूर्व अधिकारियों पर चल रहे विदेशी रिश्वत के केस को भी न्याय विभाग ने बंद कर दिया। लेकिन एक अन्य मामला – न्यूयॉर्क के मेयर एरिक एडम्स के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप – को हटाने के प्रयास पर राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया और कई सरकारी वकीलों ने विरोध में इस्तीफा दे दिया।
हालांकि, अडानी का अमेरिका में निवेश अभी सीमित रहा है, लेकिन उन्होंने चुनाव के बाद ट्रंप को बधाई देते हुए 10 अरब डॉलर का निवेश और 15,000 नौकरियां देने का वादा किया था।
अडानी के खिलाफ आपराधिक मामला अक्टूबर में गोपनीय रूप से दायर किया गया था, जिसमें उन पर प्रतिभूति धोखाधड़ी, वायर फ्रॉड और साजिश के आरोप लगाए गए थे। FCPA का सीधे उल्लेख नहीं किया गया, बल्कि यह कहा गया कि अडानी ने अमेरिकी ऋणदाताओं को गुमराह किया और अपनी कंपनियों को भ्रष्टाचार-मुक्त बताकर झूठे दावे किए।
हालांकि आपराधिक मामला अब भी अदालत में निष्क्रिय है, लेकिन SEC ने सिविल मुकदमे को आगे बढ़ाना जारी रखा है। हालिया फाइलिंग में SEC ने भारत सरकार से मदद मांगी है ताकि अडानी और अन्य प्रतिवादियों तक नोटिस पहुंचाया जा सके। यदि अडानी आपराधिक केस से राहत पा लेते हैं और केवल सिविल कार्रवाई का सामना करते हैं, तो अमेरिका में उनके लिए जोखिम काफी कम हो जाएगा।
जानकारों के अनुसार, ट्रंप प्रशासन के साथ मिलकर अभियोजन रुकवाने, जांच खत्म करवाने या सजा को पलटवाने की कोशिशें अब एक आम चलन बन चुकी हैं। अडानी के समर्थन में कई रिपब्लिकन सांसद भी आगे आए हैं और उन्होंने अटॉर्नी जनरल बॉन्डी से अपील की है कि मामला खारिज किया जाए और इसकी जांच की जाए कि यह केस दायर क्यों किया गया।
इस बीच, अडानी के अमेरिकी प्रतिनिधियों ने यह भी संकेत दिया है कि वे अमेरिका में उनके व्यापारिक हितों को आगे बढ़ाने में लगे हुए हैं। लॉबिंग फर्म क्विन इमैनुएल उरक्वार्ट एंड सुलिवन के वकील विलियम बर्क, जिन्होंने मेयर एडम्स का भी प्रतिनिधित्व किया था, अडानी की कंपनियों की ओर से लॉबिंग के लिए पंजीकृत हो चुके हैं।


