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आज के अखबार : अदाणी के खिलाफ कांग्रेस अलग पड़ गई है, भाजपा के लिए भ्रष्टाचार (अब) मुद्दा नहीं!

संजय कुमार सिंह

अखबारों में यह खबर छपने के बाद कि महारष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिन्दे ने देवेन्द्र फडणविस के लिए रास्ता साफ कर दिया है और कहा है कि मुख्यमंत्री के मामले में वे प्रधानमंत्री तथा गृहमंत्री का निर्णय मानेंगे। मुख्यमंत्री अपने गांव चले गये हैं और मुंबई में संबंधित उम्मीदवारों की बैठक नहीं हो पाई। आज यह खबर इंडियन एक्सप्रेस में पहले पन्ने पर दो कॉलम की खबर है और द टेलीग्राफ में लीड है। हिन्दुस्तान टाइम्स में यह सिंगल कॉलम की खबर है। इसमें बताया गया है कि शिन्दे के सतारा की तरफ चले जाने से राज्य में सरकार बनाने का काम फंस गया है और महायुति ने शुक्रवार को होने वाल बैठक रद्द कर दी। खबर के अनुसार इससे इन अटकलों को दम मिला है कि शिवसेना प्रमुख नाराज हैं और गृहमंत्री, विधानसभा अध्यक्ष का पद और केंद्र में बेटे के लिए मंत्रिमंडल में स्थान चाहते हैं।  इससे आप समझ सकते हैं कि भ्रष्टाचार दूर करने का वादा कर सत्ता में आये नरेन्द्र मोदी खुद क्या कर रहे हैं। उल्लेखनीय है कि केंद्र में कांग्रेस की सहयोगी पार्टी पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाये गये थे और वह साबित नहीं हुआ। अभी अगर सरकार बनाने के लिए इस तरह दबाव में है तो वह यूं ही नहीं होगा। किसी ने लिखा नहीं है लेकिन ईवीएम से बहुमत हासिल करने के आरोपों के बीच इस दबाव का अपना महत्व है जो अब मुद्दा नहीं है।

टाइम्स ऑफ इंडिया में यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है। यहां सेंकेंड लीड बताती है कि अदाणी विवाद पर केंद्र ने कहा है कि मामला निजी कंपनियों और अमेरिकी न्याय विभाग के बीच है। यह दावा और सोच अपनी जगह सही है लेकिन आप जानते हैं कि देश की किसी भी कंपनी को भविष्य में विदेशी बाजार से पैसों की आवश्यकता हो सकती है। भारतीय बाजार की छवि अच्छी हुई और इस तरह की बदनामी से भारतीय कंपनियां पाक साफ निकल सकें तो न सिर्फ उन्हें फायदा होगा बल्कि भविष्य में दूसरी भारतीय कंपनियों को भी इसका लाभ मिलेगा। कुल मिलाकर, यह भारतीय पूंजी बाजार और व्यवसायों के साथ सरकारी व्यवस्था की बदनामी का मामला है और एक उदाहरण के रूप में याद किया जायेगा। खास कर इसलिए कि खबरें छप चुकी हैं कि नरेन्द्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद से ही अपने विदेशी दौरों पर पत्रकारों को साथ ले जाना बंद कर दिया है और उनके साथ दौरे पर देश के भिन्न उद्यमी/व्यवसायी रहे हैं। खबर तो यह भी है कि प्रधानमंत्री ने विदेशों में कतिपय औद्योगिक घरानों की सिफारिश की है। ऐसे में भ्रष्टाचार के दम पर व्यवसाय चलाने के आरोपों को निराधार नहीं कहा जा सकता है और सरकार के पास मौका था कि वह इस मामले में देश को बदनामी से बचाती। देश हित में यह सरकार की जिम्मेदारी है। सत्तारूढ़ दल के रूप में उसे इसकी जरूरत नहीं है और उसे फिर भी आम जनता का भरपूर समर्थन है, उसकी लोकप्रियता कम नहीं हो रही है फिर भी उसे यह काम करना चाहिये था। नहीं करना उसकी राजनीतिक मजबूरी और चाल हो सकती है। मजबूती या गैर जरूरी तो नहीं ही है।

दि एशियन एज में अदाणी का प्रचार और मजबूती से है। तीन कॉलम की एक खबर का शीर्षक है, अदाणी पर विपक्ष में फूट : टीएमसी ने कहा संसद को चलने दिया जाये। आप जानते हैं कि अदाणी की धुर विरोधी, महुआ मोइत्रा टीएमसी की सांसद है। पिछली बार अदाणी के मामले में सवाल करने और इस मामले में भाजपा के सांसद निशिकांत दुबे से भिड़ जाने के बाद संसद की उनकी सदस्यता खत्म कर दी गई थी जबकि संसद में एक सांसद द्वारा दूसरे सासंद को गाली देने के मामले में कार्रवाई नहीं हुई। यह अलग बात है कि गाली देने वाले सासंद को टिकट नहीं मिला और गाली सुनने वाले सांसद चुनाव जीत नहीं पाये लेकिन महुआ मोइत्रा फिर जीत कर आई हैं। क्योंकि अभी ऐसा कोई नियम नहीं है। मुझे आश्चर्य नहीं होगा अगर ऐसा कोई नियम बन जाये। पर वह बाद की बात है और अभी मुद्दा नहीं है। निशिकांत दुबे झारखंड में जहां से सांसद हैं वहीं अदाणी का बांग्लादेश वाला प्लांट है। ऐसी स्थिति में दि एशियन एज ने खबर दी है कि अदाणी मामले में कांग्रेस अलग थलग पड़ गई है और दूसरे भी चाहते हैं कि फोकस ‘प्रासंगिक’ मुद्दों पर रहे।

यह वही देश है जहां 2014 के चुनाव में भ्रष्टाचार और काला धन चुनावी मुद्दा था। मंहगाई और डॉलर की बढ़ती कीमत पर आरोप लगाये जाते थे सरकार को कटघरे में खड़ा किया जाता था। आरोप लगाया गया था कि स्विस बैंक में इतना काला धन है कि वापस आ जाये तो सबको 15 लाख मिल सकते हैं। अन्ना हजारे जैसे ईमानदार नेता उभरे जो गाहे-बगाहे और हाल तक ‘अपने शिष्य’ अरविन्द केजरीवाल के खिलाफ बोलते रहे हैं पर 100 दिन में स्विस बैंक का काला धन वापस आने या नोटबंदी के बाद 50 दिन में सपनों का भारत बनने पर कुछ नहीं बोलते। फिर भी भ्रष्टाचार के मुद्दे पर वही कांग्रेस अलग-थलग पड़ गई है। महंगाई, डॉलर का मूल्य, भ्रष्टाचार और चुनावी चंदे के लिए इलेक्टोर बांड मुद्दा नहीं बना। नोटबंदी से फायदा तो छोड़िये भारी नुकसान हुआ पर यह सब मुद्दा ही नहीं है। यह भाजपा की राजनीतिक श्रेष्ठता हो सकती है पर उससे जनता को क्या मिला वह भी मुद्दा नहीं है।

महाराष्ट्र में सरकार इसीलिए जरूरी है और इसी लिए जैसे तैसे सरकार बनाई गई और अब तो उसके लिए जैसे-तैसे बहुमत ही मिल गया है। लेकिन मीडिया ने जो रंग बदला है वह आश्चर्यजनक है। अदाणी के मुद्दे पर संसद नहीं चल पा रही है फिर भी खबर सुर्खियों में नहीं है। पहले संसद नहीं चलती थी तो विपक्ष का मुद्दा होता था। वह सरकार के खिलाफ आवाज उठाने के कारण होता था अब सुर्खी तो छोड़िये, हेडलाइन मैनेजमेंट होता है और संसद की कार्यवाही न चले तो पैसे बर्बाद होते हैं। इसमें नाचने-गाने वालों की लोकप्रियता का फायदा उठाने के लिए उन्हें सांसद के वेतन-भत्ते दिलाकर समर्थन हासिल करना भ्रष्टाचार तो छोड़िये मुद्दा भी नहीं है। सवाल कीजिये तो जवाब यही होता कि कांग्रेस भी करती थी। सवाल यह है कि कांग्रेस जो करती थी वही करना तो भाजपा बेहतर कैसे? 10 साल बाद दिख रहा है कि कांग्रेस भष्टाचार का विरोध करते हुए अलग-थलग पड़ गई है और भाजपा के लिए भ्रष्टाचार मुद्दा ही नहीं है। यही नहीं, देश हित में मीडिया को भी इसकी मांग करनी चाहिये थी। पर टाइम्स ऑफ इंडिया की मूल खबर के साथ आज सिंगल कॉलम की एक खबर का शीर्षक है, अदाणी समूह की आठ कंपनियों के स्टॉक ऊंचे मूल्य पर बंद हुए।

इससे लगता है कि पूंजी बाजार भी अदाणी के मामले में निश्चिंत है और उसे अमेरिकी आरोपों की चिन्ता नहीं है। दूसरी ओर, संभावना यह भी है कि इसका कारण समूह को सरकार द्वारा मिल रहा समर्थन और संरक्षण हो। कंपनी ने आरोपों से इनकार किया है, अपनी बात विस्तार से और जोर-शोर से रखी है। सरकार भी उसके साथ है। ऐसे में शेयर भाव जो घटे थे उन्हें बढ़ना ही था। वैसे भी शेयर बाजार में आम पूंजी धारक ऐसे ही कमाते हैं। जब कीमतें कम हों तो खरीद लो, ज्यादा हो तो बेच दो। जो जितना जोखिम लेता है उतना ही कमाता है (या नुकसान उठाता है) पर नुकसान के बारे में कहा जाता है कि उतना ही जोखिम लीजिये जितना बर्दाश्त कर सकते हैं। ऐसे लोगों को अगर एक बार नुकसान हो जाये तो अगली बार उसकी भरपाई हो जाती है। नुकसान नवसिखुओं को होता है जो जल्दबाजी में रहते हैं। ऐसे में अखबारों का सब सामान्य दिखाना मायने रखता है। सरकार ने तो कहा ही है।

जीडीपी के विकास दर 21 महीने में सबसे सुस्त

आज की एक महत्वपूर्ण खबर जीडीपी के विकास की रफ्तार पिछले 21 महीने में सबसे सुस्त गुजरी तिमाही में रही है। यह रफ्तार नोटबंदी और जीएसटी के बाद काफी कम हो गई थी और अब फिर पटरी पर आने के रास्ते में यह झटका है। यह खबर आज जैसे-जितनी छपी वह अपनी जगह है, महत्वपूर्ण यह है कि सरकार हर महीने यह जरूर बताती है कि जीएसटी की वसूली बढ़ रही है और इसलिए सब चंगा सी। इस क्रम में जीडीपी बढ़ने की रफ्तार दो साल में सबसे कम होना बड़ी खबर है। अमर उजाला ने इसे टॉप पर छापा है। इंडियन एक्सप्रेस, द हिन्दू में यह लीड है, टाइम्स ऑफ इंडिया में यह दो कॉलम की खबर है, हिन्दुस्तान टाइम्स में सेकेंड लीड है। नवोदय टाइम्स में भी यह लीड है। दि एशियन एज और टेलीग्राफ ने भी पहले पन्ने पर सिंगल कॉलम की खबर से बताया है, भारत में अर्थव्यवस्था की गाड़ी धीमी लेन में चल रही है। भारत में जो हो रहा है और अखबार जो माहौल बनाने की कोशिश कर रहे हैं उसमें तथ्य यह है कि बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना अपदस्थ हुईं तो भारत सरकार ने उन्हें शरण दी और भारत सरकार वहां के हिन्दुओं की चिन्ता लगातार जताती रही है फिर भी यह आरोप लगाता है कि वहां के मुसलमान भारत में घुसपैठ कर जाते हैं। और बात इतनी ही नहीं है, भारत की पूरी जनता जानती है कि बुलडोजर न्याय किसके लिये है फिर भी घुसपैठ हो रही है और तमाम कोशिशों के बावजूद बांग्लादेश में हिन्दू सुरक्षित नहीं हैं और विदेश मंत्रालय ने कहा है कि बांग्लादेश के लिए लिये जरूरी है कि व अल्पसंख्कों की सुरक्षा सुनिश्चित करे। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अपनी मीडिया और प्रचारक आश्रित रणनीति है। दि एशियन एज की आज की लीड का शीर्षक है, “मोदी ने कहा : अस्तित्व बचाना सुनिश्चित करने के लिए विपक्ष झूठ बोल रहा है, अफवाह फैला रहा है”। इसलिए अगर आपको लग रहा था कि कांग्रेस भ्रष्ट है और उसे सत्ता से बेदखल करके भाजपा ईमानदार सरकार देगी, भ्रष्टाचार दूर करेगी, महंगाई पर नियंत्रण लगायेगी तो वह सब कुछ नहीं हुआ है। हां, भाजपा सत्ता में मजबूती से बैठी हुई है और ईवीएम के बारे में जो शिकायतें आ रही हैं उससे साफ है कि सत्ता में आने से पहले इसका विरोध करने वाली भाजपा अब क्यों शांत है। आम आदमी यही समझता है कि भाजपा सरकार चला रही है जबकि वह राजनीति कर रही है और चुनाव लड़ने में ही व्यस्त है। दिल्ली के चुनाव होने हैं और फिर वही तरीके अपनाये जायेंगे इसलिए इस बार चौपट कानून व्यवस्था पर केजरीवाल ने पहले ही सवाल दाग दिये हैं और विधानसभा चुनाव में अपनी स्थिति मजबूत कर रही है। लेकिन खबर मुख्य धारा में नहीं है।

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