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सियासत

जिस गौतम अदाणी को अमेरिका खोज रहा है, उसके साथ भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी केरल में मंच साझा करते हैं!

विनोद चंद-

आप भारत के सबसे बेशर्म नेता का नाम जानते हैं? मेरे लिए, वह कोई और नहीं बल्कि नरेंद्र मोदी हैं। अमेरिकी सरकार के न्याय विभाग ने हेग कन्वेंशन के तहत गौतम अदाणी को समन जारी किया है। यह समन एक वायर फ्रॉड के एक मामले में है, जिसमें गौतम अदाणी और उनके भतीजे सागर अदाणी पर अमेरिकी निवेशकों से पैसे लेने और फिर सौर ऊर्जा परियोजनाओं का काम पाने के लिए भारत में अधिकारियों को रिश्वत देने का अभियोग अमेरिकी अदालत में है।

अमेरिकी न्याय विभाग के पास विश्वसनीय सबूत हैं। इसने भारत सरकार को समन भेजा, जिसने गुजरात उच्च न्यायालय को निष्पादन के लिए समन भेजा।

यह समन अभी तक तामील नहीं हुआ है, जैसा कि अमेरिकी न्याय विभाग द्वारा भारत सरकार को भेजे गए अनुस्मारक से स्पष्ट है। फिर भी, भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी केरल में गौतम अदाणी के साथ मंच साझा करते हैं।

अगर यह गौतम अदाणी को स्पष्ट संरक्षण का सबूत नहीं है, तो मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि इसके लिए और क्या सबूत चाहिए। ऐसा लगता है जैसे मोदी आपके मुंह पर कह रहे हैं कि मैं इस कथित भ्रष्ट व्यक्ति के बगल में खड़ा रहूंगा, जो करना है कर लो।
भ्रष्टाचार को खत्म करने वाले के रूप में सावधानीपूर्वक बनाई गई उनकी छवि तार-तार हो चुकी है, लेकिन उन्हें इसकी परवाह नहीं है। जानते हैं क्यों? उन्होंने आपको हिंदू मुस्लिम नैरेटिव में उलझा दिया है और उन्हें पता है कि यह आपके लिए उस भ्रष्टाचार से ज्यादा महत्वपूर्ण है जिसका वे समर्थन कर रहे हैं…..और संरक्षण दे रहे हैं।


संजय कुमार सिंह-

मेरा मानना है कि इसीलिए पीएम नरेंद्र मोदी अपना काम करने में लगे हैं। ना खाउंगा, ना खाने के बावजूद। यह कुर्सी पाने के लिए था और उस पर बने रहने के लिए केरल में प्रधानमंत्री ने कहा, ‘कई लोगों की नींद हराम कर देगा आज का यह इवेंट, जहां मैसेज जाना था पहुंच चुका है’। ऐसा तब कहा गया है जब प्रधानमंत्री किसी राज्य में जायें तो वहां के मुख्यमंत्री, सांसद, विधायक आदि का वहां होना आम बात है। नहीं होते तो उसे भी मुद्दा बनाया जाता है और थे तो उसपर भी राजनीति। संदेश उस तक पहुंचा जिसे कुछ समझ में नहीं आता है या वो संपादक हैं जिन्हें नहीं समझने और बताने के पैसे मिलते हैं।


विष्णु नागर-

हमारे प्रधानमंत्री जी आगामी सितंबर में 75 वर्ष के हो जाएंगे मगर उनके व्यवहार से लगता नहीं कि उनकी उम्र इतनी होने जा रही है। बचकानापन अभी तक उनका गया नहीं है। गरिमा उन्हें छू नहीं गई है। केरल के तिरुवनंतपुरम में विझिंगम अंतरराष्ट्रीय बंदरगाह का उद्घाटन करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा:’ मैं मुख्यमंत्री से कहना चाहता हूं कि आप इंडिया गठबंधन के मजबूत स्तंभ हैं। शशि थरूर भी यहां बैठे हैं। आज का यह इवेंट कई लोगों की नींद हराम कर देगा।’

अरे भाई, केरल में बंदरगाह का उद्घाटन हो रहा है। एक महत्वपूर्ण अवसर है। उसके महत्व के अनुरूप बात होनी चाहिए। फिर जिसने यह बंदरगाह बनाया है,वह अडानी, प्रधानमंत्री जी का बेहद सगा है।इस नाते उन्हें वहां होना ही था ( वैसे भी उद्घाटन- भाषण ही उनका सबसे प्रिय कर्म है)।राज्य के मुख्यमंत्री के नाते पिनराई विजयन को भी वहां होना था, जिनकी मंजूरी के बगैर यह बन नहीं सकता था तो स्वाभाविक है कि श्रेय लेने के लिए वह भी आए।वह मोदी को श्रेय क्यों लूटने दें? उन्हें भी चुनावी राजनीति करनी है।

वामपंथ के आखिरी गढ़ को किसी भी तरह बचाने की जिम्मेदारी अकेले उनके कंधों पर है।और थरूर तिरुवनंतपुरम से सांसद हैं तो उन्हें भी वहां होना था। सबकुछ प्रचलित प्रथा के अनुसार हुआ,जो मोदी के पहले भी होता था।इसमें नींद हराम होने जैसी बात क्या है? क्या संसदीय लोकतंत्र में यह आम बात नहीं रही है?क्या विजयन और थरूर को वहां इसलिए नहीं होना चाहिए था कि इस समय देश का प्रधानमंत्री भाजपा का है?

ऐसी छिछली बात एक महत्वपूर्ण बंदरगाह के उद्घाटन के मौके पर कहना यह बताता है कि उम्र और पद के कारण व्यक्ति में जो परिपक्वता आना चाहिए,वह दुर्भाग्य से प्रधानमंत्री के हिस्से में आई नहीं है और अब आएगी भी क्या?

दो बातें और।किसी को आपत्ति इस पर हो सकती है कि वामपंथी सरकार ने अडानी के सहयोग से यह बंदरगाह क्यों बनाया, यह एक अलग वैचारिक बहस है। दूसरा थरूर साहब कभी इधर ,कभी उधर का संकेत देते रहते हैं। राजनीति की दुनिया में न कोई नैतिकता बची है, न सिद्धांत ,तो हो सकता है थरूर साहब कांग्रेस का दामन छोड़ दें, जहां अब वह असुविधा महसूस करने लगे हैं मगर थरूर ने अपनी ढेरों किताबों के जरिए अपनी एक बौद्धिक के रूप में भी छवि बनाई है, उसके बावजूद अगर वह भाजपा में जाते हैं तो यह उनके लिए शर्मनाक होगा।

वैसे थरूर साहब विजयन जी की भी एक बार तारीफ करके अपनी पार्टी को संकट में डाल चुके हैं।और मान लो थरूर पार्टी बदल ही रहे हैं तो इसका संकेत इस कार्यक्रम में इस तरह देना मोदी जी की परिपक्वता तथा पद की गरिमा का परिचायक नहीं है। वैसे मोदी जी इन बातों को ठेंगे पर रखते हैं।


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सत्येंद्र पी एस-

भारत की विदेश नीति अब पूरी तरह विफल नजर आ रही है। ट्रम्प के सत्ता में आने के पहले तक भारत दोतरफा खेलने की कोशिश कर रहा था, रूस के साथ मजबूती से नज़र आ रहा था। चीन के साथ बार्डर वाला मामला भी सैटल हो गया था कि चीन ने जितना कब्जा कर लिया, वह कर लिया, आगे अब नहीं करेगा।

तब तक ट्रम्प नाम का जीव नमूदार हुआ कि साफ साफ खेलो। अमेरिका के साथ हो तो रूस से रिलेशन खत्म करो, हमसे सम्बन्ध बनाओ, हम तेल देंगे। भारत छितरा गया। इस कदर की ट्रम्प ने रावण की तरह अट्टहास लगाया कि लोग नाक रगड़ रहे हैं समझौता करने को। तब भी बात नहीं बनी तो पाकिस्तान को भिड़ा दिया कि हिन्दू मुस्लिम करा दो।

अब भारत लिबरल के बजाय लिबिरहा नजर आ रहा है। शायद भारत के शासकों को संदेश दे दिया गया है कि हिन्दू मुस्लिम करके सत्ता में बने रहो, इससे ज्यादा उछलकूद की जरूरत नहीं है।

भारत भी उसी दिशा में चल रहा है। 4 कौवे मारने से आगे कुछ करना होता तो चुनावी मंच से पाकिस्तान को नेस्तनाबूद नहीं किया जाता। खामोशी से बैठते। रणनीति बनाते। विदेसी साथियों को लाइनअप करते और चढ़ बैठते। पकर पकर नहीं करते कि हम ये उखाड़ लेंगे, वो तोप मार देंगे।

खैर…

यह भी ठीक ही है। अटल के शासन में पाकिस्तान चढ़ आया तो उसके सैनिकों को बाहर निकालने में हमारे सैकड़ों सैनिक मारे गए और उसी को विजय बता दिया। फिर पाकिस्तान में घुसकर 3 कौवे और 5 कबूतर मार आए। उसको विजय बता दिया।
आज की दही जलेबी और कचौड़ी सब्जी। भारत अब पाकिस्तान को वैश्विक मंच से अलग थलग करेगा! अमेरिका से समझौते करेगा। रूस से तेल खरीदना बन्द करेगा और जनसभाओं में पाकिस्तान को ललकारेगा, टीवी चैनल पर युद्ध करेगा।

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