मुंबई। अडाणी ग्रुप का भारतीय बैंकों और वित्तीय संस्थानों पर निर्भरता पिछले साल की तुलना में और बढ़ गई है। अब समूह के कुल 2.6 लाख करोड़ रुपये से अधिक के कर्ज़ का लगभग 50% हिस्सा भारतीय बैंकों से लिया गया है। पिछले साल यह आंकड़ा 40% था।
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, जून 2025 तक समूह का कुल दीर्घकालिक कर्ज़ 2,65,717 करोड़ रुपये हो गया, जो एक साल पहले के 2,21,576 करोड़ रुपये से करीब 20% अधिक है। इनमें भारतीय रुपये में लिए गए लोन का हिस्सा 1,32,859 करोड़ रुपये और अमेरिकी डॉलर लोन का हिस्सा 1,32,859 करोड़ रुपये है।
भारतीय बैंकों का बढ़ता हिस्सा
- पीएसयू बैंकों का कर्ज़: 13% से बढ़कर 19%
- प्राइवेट बैंकों का कर्ज़: 2% से बढ़कर 3%
- एनबीएफसी और वित्तीय संस्थान: 19% से बढ़कर 25%
- घरेलू संस्थागत निवेशक: 6% पर स्थिर
- डॉलर बॉन्ड और विदेशी बैंक
अडाणी ग्रुप के कुल डॉलर बॉन्ड का हिस्सा घटकर 31% से 23% रह गया है, जबकि विदेशी बैंकों का हिस्सा 28% से बढ़कर 27% पर पहुंचा।
मुनाफे के साथ कर्ज़ भी बढ़ा
वित्त वर्ष 2025 में अडाणी ग्रुप ने 89,806 करोड़ रुपये का रिकॉर्ड EBITDA दर्ज किया, जो 8.2% अधिक है। शुद्ध मुनाफा 40,565 करोड़ रुपये और कैपिटल बेस 12.5 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचा। इसके बावजूद समूह का नेट डेब्ट-टू-EBITDA रेश्यो 2.6 बना हुआ है, जिससे लीवरेज सीमित रहा।
अंतरराष्ट्रीय स्थिति
वैश्विक स्तर पर अडाणी ग्रुप अब भी भारत का सबसे बड़ा जारीकर्ता है जिसने 144A/Reg S रूट से 9 अरब डॉलर के बॉन्ड्स जारी किए हैं, जिनकी परिपक्वता 30 साल तक की है। बीते सात सालों में समूह ने 2.7 अरब डॉलर का पुनर्वित्तन किया है।
अडाणी एयरपोर्ट्स ने भी 125 मिलियन डॉलर का लोन लिया और बाद में उसका पुनर्वित्तन कराया गया।
विशेषज्ञों के मुताबिक, अडाणी ग्रुप का भारतीय बैंकों पर बढ़ता बोझ और विदेशी बाजारों में बॉन्ड उधारी दोनों ही देश की वित्तीय व्यवस्था पर बड़ा असर डाल सकते हैं।
इस मामले पर वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी सिंह ने टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट साझा करते हुए टिप्पणी की है-
हमारे बैंकों और वित्तीय संस्थानों (जिनमें सारी जमा पूंजी आम अवाम की लगी है) का देश के सबसे बड़े सरकार समर्थित व्यापारी अड़ानी ग्रुप के कुल करीब दो लाख साठ हज़ार करोड़ रुपये के क़र्ज़ का हिस्सा आधा हो गया है और यह लगातार बढ़ रहा है।

पिछले साल भर में यह करीब बीस फ़ीसदी बढ़ा है। मोदीजी की कृपा से देश के संसाधनों को देशवासियों के ही पैसे से ख़रीद कर निजी कर लेने की योजना को व्यापार कहा जाता है।
पूछा जाता है कि भ्रष्टाचार कहां है? लाख दो लाख के लिए रोज़ कोई न कोई बैंक किसानों की ज़मीन कुर्क कर लेता है, छोटा व्यापारी ज़हर खा लेता है और विद्यार्थी तरुणाई में ही डिफाल्टर हो जाता है लेकिन लाखों करोड़ रुपए जीम लेने को व्यापार कहा जाता है।



Shivkumar tyagi
August 27, 2025 at 8:19 am
अगर कुछ पता ना हो तो चुप रहो आज 70% रोजगार प्राइवेट सेक्टर से आता है