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साहित्य

फांसी विरोधी अभियान : अफजल और जार्ज ऑरवेल का ‘अ हैंगिंग’

जॉर्ज ऑरवेल ने 1931 में फांसी पर ‘अ हैंगिंग’ नाम से निबंध लिखा था। इसे ‘द हिंदू’ ने अपने फांसी विरोधी अभियान के तहत 31 अगस्त 2011 को अफजल की फांसी के समय छापा था। यह निबंध आज भी उतना ही मौजूं है। आप भी पढ़िए-

<p>जॉर्ज ऑरवेल ने 1931 में फांसी पर 'अ हैंगिंग' नाम से निबंध लिखा था। इसे 'द हिंदू' ने अपने फांसी विरोधी अभियान के तहत 31 अगस्त 2011 को अफजल की फांसी के समय छापा था। यह निबंध आज भी उतना ही मौजूं है। आप भी पढ़िए-</p>

जॉर्ज ऑरवेल ने 1931 में फांसी पर ‘अ हैंगिंग’ नाम से निबंध लिखा था। इसे ‘द हिंदू’ ने अपने फांसी विरोधी अभियान के तहत 31 अगस्त 2011 को अफजल की फांसी के समय छापा था। यह निबंध आज भी उतना ही मौजूं है। आप भी पढ़िए-

जार्ज ऑरवेल : यह बर्मा में बारिशों वाली सुबह थी। जेल की ऊंची दीवारों से प्रकाश की एक बहुत पतली रेखा टीन की पीली पन्नी जैसी जेल में प्रवेश कर रही थी। हम दोहरे छड़ों वाले कैदखाने में, जो किसी जानवर के पिंजड़े जैसा था, इंतजार कर रहे थे। हर एक कैदी के लिए 10-10 फिट की जगह थी, जो तख्‍ते के एक बिस्तर, कंबल और पानी के घड़े के अलावा खाली ही था, जिनमें से कुछ में बादामी रंग वाले कैदी पालथी मारे, कंबल लपेटे बैठे थे। ये लोग अपराधी थे और इन्हें अगले एक-दो हफ्तों में फांसी पर लटका दिया जाना था।

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एक कैदी को उसके सेल से निकाला गया। वह हिंदू कैदी था, मुंडे सिर और अस्थिर तरल आंखों वाला एक कमजोर छरहरा कैदी। उसकी मूछें घनी थीं, उसके शरीर के अनुपात में कुछ ज्यादा ही घनी जो कि किसी कॉमिडी सिनेमा के पात्र की तरह दिखती थी। छह लंबे चौड़े भारतीय पहरेदार उसे घेरे हुए थे और फांसी के लिए तैयार कर रहे थे। पहरेदारों में, दो के पास संगीनों वाली राइफलें थीं, जबकि बाकी पहरेदार कैदी को हथकड़ी लगाए हुए थे। सिपाहियों ने कैदी को कस कर जकड़ रखा था मानो उन्हें यह डर था कि कैदी कभी भी छूट कर भाग सकता है। यह एक आदमी के जिंदा मछली को हाथों में पकड़ रखने जैसा था मानो पकड़ ढीली हुई नहीं कि मछली हाथ से गई। जबकि कैदी बहुत ही समर्पित भाव से तमाम गतिविधियों को चलने दे रहा था, जैसे उसे पता ही न हो कि क्या होने वाला है।

आठ बजे का गजर बज चुका था। गजर की आवाज भीगी हुई हवा के साथ जेल के हर एक बैरक में पहुंच चुकी थी। जेल अधीक्षक, जो कि कैदियों से अलग खड़ा था और इस पूरी प्रक्रिया को दर्प के साथ संचालित कर रहा था, ने घंटे की तरफ सर उठाया। भूरे मूंछों और कर्कश आवाज वाला जेल अधीक्षक फौज का डॉक्टर रह चुका था। ‘भगवान के लिए जल्दी करो फ्रांसिस’- उसने उकताते हुए कहा, ‘इस समय तक कैदी को फांसी हो जानी चाहिए थी, तुमलोगों की तैयारी अभी तक पूरी नहीं हुई?’

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जेल प्रधान फ्रांसिस ने हकलाते हुए कहा ‘यस सर! यस सर!! सब कुछ तैयार है, जल्लाद प्रतीक्षा कर रहा है, हम सजा को मुकम्मल कर सकते हैं।’

‘अच्छा है जल्दी करो, जब तक फांसी नहीं हो जाती बाकी कैदियों को सुबह का नाश्ता नहीं मिलेगा।’

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हम फांसी को देखने के लिए तैयार थे। दोनों राइफलधारी पहरेदार कैदी के आजू-बाजू चल रहे थे जबकि दो पहरेदार पहले की ही तरह कैदी को कस कर जड़के हुए थे। मैजिस्ट्रेट और बाकी लोग उनके पीछे थे। हम दस गज ही चले होंगे कि अचानक, बिना किसी आदेश या पूर्वसूचना के, एकाएक सब कुछ थम गया। एक अशुभ घटना घट गई थी- ईश्वर जाने कहां से एक कुत्ता रास्ते में आ गया था। लगातार भौंकता हुआ वह कुत्ता इतने सारे लोगों को एक साथ देख कर दोहरा हुआ जा रहा था। वह घने बालों वाला कुत्ता था। एक क्षण तो वह हमारे आस-पास घूमता रहा और फिर इससे पहले कि कोई उसे पकड़ पाता, वह कैदी की ओर लपका और उसके चेहरे को चूमने लगा। हर कोई अचंभित था।

‘इस नीच को यहां किसने आने दिया, कोई इसे बाहर करो’ जेल अधीक्षक ने झल्लाते हुए कहा।

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छह पहरेदारों के दल में से एक आगे बढ़ा और कुत्ते को पकड़ने की कोशिश करने लगा, पहरेदार के बरताव से लग रहा था कि वह इसके लिए प्रशिक्षित नहीं किया गया है, जब तक वह कुत्ते तक पहुंचता, कुत्ता उसकी पहुंच से निकल चुका था। एक युवा यूरेशियन जेलर ने जमीन से कुछ ढेले उठाए और कुत्ते पर निशाना साधा, पर कुत्ता उससे भी बच निकला और वापस हमारे बीच आ गया। उसके भौंकने की आवाजें हमारे कानों में गूंज रही थीं। कैदी और उसे जकड़े हुए दो सिपाही यह सब कुछ ऐसे देख रहे थे मानो यह भी फांसी होने से पहले की कोई रस्म हो। किसी ने कुत्ते के गले में रुमाल का पट्टा डाल कर उसे पकड़ा और बाहर किया।

फांसी का तख्ता हमसे चालीस गज की दूरी पर रहा होगा। मुझे तख्ते की ओर बढ़ते कैदी के भूरे रंग की पीठ नजर आ रही थी। बंधे हुए बाजुओं वाले उस कैदी की चाल में अनाड़ीपन तो था लेकिन वह काफी स्थिर लग रहा था। यह उस भारतीय की ठसक भरी चाल थी जिसने कई दिनों से अपने ठेहुनों को सीधा नहीं किया था। उसके पांव भीगी हुई बजरी पर अपने निशान छोड़ रहे थे। और एक बार तो वह खुद ही रास्ते के कीचड़ से बचने के लिए थोड़ा बच कर चला था।

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यह सब बहुत अनूठा था, लेकिन तब तक जब तक मेरे दिमाग में यह खयाल नहीं आया था कि एक स्वस्थ और सजग आदमी को मारने का क्या मतलब होता है। जब कैदी ने खुद को कीचड़ से बचाया, तो मेरा साक्षात्कार एक विडंबना से हुआ। एक अच्छे-खासे जवान मर्द को फांसी पर लटकाने का क्या तर्क है, क्या यह एक न्यायिक चूक नहीं है। आने वाले कुछ समय में उसकी मृत्यु नहीं होनी थी, वह हमारी ही तरह जिंदा रहने वाला था। उसके शरीर के सभी हिस्से ठीक काम कर रहे थे। आंतें भोजन पचा रही थीं, नाखून बढ़ रहे थे, रोम छिद्रों से पसीना निकल रहा था, कोशिकाएं अपनी गति से निर्मित हो रहीं थीं- सभी अंग अभी तक एक मूर्ख की भांति लगातार मेहनत कर रहे थे। संभवतः उसके नाखून तब भी बढ़ते रहें, जब वह फांसी के तख्ते पर चढ़ जाए, और जब उसकी जिंदगी एक झटके के साथ सेकेंड के दसवें हिस्से में हवा में घुल जाए।

उसकी आंखों ने पीले तख्ते और सीमेंटी दीवारों को देखा, उसका मस्तिष्क अब भी काम कर रहा है। वह पूर्वानुमान लगा सकता है, समझ सकता है- वह कीचड़ से बच सकता है। हम लोग एक साथ देख, सुन और समझ रहे हैं, महसूस कर रहे हैं एक ही दुनिया के बारे में एक ही तरह से। और दो मिनट से भी कम समय में, एक झटके के साथ हमारे बीच का एक चला जाएगा- एक मस्तिष्क, एक दुनिया कम हो जाएगी।

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फांसी का तख्ता जेल से अलग एक छोटी सी जगह में बना हुआ था जिसके चारों तरफ कांटे वाली झाड़ियां फैली हुई थीं। यह ईटों के एक त्रिविमीय शेड की तरह था, जिसके बीच में लकड़ी का एक तख्ता था, ऊपर दो बिंबों और क्रॉस्बार की सहायता से एक रस्सी टंगी हुई थी। सफेद बालों वाला बूढ़ा जल्लाद, जो जेल की वर्दी पहने हुए था, अपनी मशीन के पास इंतजार कर रहा था। हम जैसे ही तख्ते के पास पहुंचे, जल्लाद ने हमें दासों की तरह नमस्कार किया। फ्रांसिस के इशारे पर दो सिपाही, जो कैदी को अब पहले से भी ज्यादा कस कर जकड़े हुए थे, कैदी को तख्ते पर ले गये। जल्लाद ने कैदी के गले में फंदा डाल दिया।

हम तख्त से चालीस गज की दूरी से सब कुछ देख रहे थे। जेल के कर्मचारी तख्त के आस-पास एक गोल घेरा बना कर खड़े हो गये। और जब सब कुछ तैयार हो गया, तब कैदी ने अपने ईश्वर को याद करना शुरू किया, वह बहुत तेज आवाज में बार बार ‘राम-राम-राम’ पुकार रहा था। उसकी आवाज में कोई जल्दबाजी नहीं थी और न ही वह किसी मदद के लिए कुहर रहा था। वह स्थिर और सस्‍वर था। उसकी आवाज घंटे की ध्वनि की तरह ठनकदार थी। सिर्फ कुत्ता ही रोते हुए उसकी आवाज को जवाब दे रहा था। जल्लाद ने उसके चहरे को सूती कपड़ों के बने नकाब से ढंक दिया। लेकिन वह नकाब भी कैदी की आवाज को दबा नहीं पायी और ‘राम-राम-राम’ की ध्वनि गूंजती रही।

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जल्लाद वापस अपनी मशीन के पास आ गया था और उसने मशीन का लीवर पकड़ लिया। समय रीत रहा था। कैदी की स्थिर आवाज हरेक क्षण बिना लड़खड़ाए हम तक पहुंच रही थी- राम! राम! राम! जेल अधीक्षक सर झुकाए, अपनी छड़ी से धीरे धीरे जमीन को कुरेद रहा था। शायद वह राम-राम की आवृत्तियों को गिन रहा था। कैदी को एक खास गिनती तक इसकी इजाजत मिली होगी, शायद पचास या सौ। सब के चेहरे तनाव से रंगे हुए थे। भारतीयों के चेहरे खराब कॉफी की तरह भूरे पड़ गये। दो संगीनें हवा में हल्के-हल्के हिल रही थीं। हम नकाब से ढके उस चहरे को देख रहे थे, जो फांसी के फंदे पर टंगा हुआ था, उसकी आवाज हम सुन रहे थे- हर बार एक आवृत्ति और जीवन का एक सेकंड और। ओह, इसे जल्दी लटका दो, खत्म करो इसे, इस असहनीय आवाज को बंद करो। हम सब के दिमाग में यही चल रहा था।

‘चलो!’ जेल अधीक्षक ने सउत्साह कहा, उसने अपना मन बना लिया था।

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क्लिक की एक आवाज और फिर चारों तरफ मरघट की शांति। कैदी खत्म हो चुका था, फंदा अपने में ही उलझ गया था। कुत्ते को छोड़ दिया गया। वह भौंका और कंटीली झाड़ियों की तरफ भाग गया, वह हमारी तरफ डरी हुई निगाहों से देख रहा था। हम मृतक का परीक्षण करने फांसी के तख्‍ते के पास गए। उसके पंजे बिलकुल सीधे जमीन की तरफ झुके हुए थे और पूरा शरीर धीरे-धीरे दायें बायें घूम रहा था, मानो पत्थर की किसी मूर्ति को रस्सी पर लटका दिया गया हो।

जेल अधीक्षक मृत शरीर के पास गया और अपनी छड़ी से मृत शरीर को कोंचा, रस्सी पर टंगी पत्थर की मूर्ति थोड़ा डोली। ‘यह ठीक है’ जेल अधीक्षक ने कहा। वहां से पीछे हटते हुए उसने एक गहरी सांस ली। अचानक ही उसके चेहरे की अस्थिरता गायब हो चुकी थी। उसने अपनी कलाई घड़ी में झांका, आठ बज कर आठ मिनट। ‘भगवान का शुक्र है सब कुछ समय पर ही निपट गया।’

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सिपाहियों ने अपनी राइफलों से संगीनें निकाल लीं और वहां से चले गए। कुत्ता जिसे शायद अपनी गलती का एहसास हो चुका था, उन्हीं सिपाहियों के पीछे निकल गया। हम भी वहां से निकल कर, अपराधियों के सेल से होते हुए जेल के बड़े से केंद्रीय कक्ष में पहुंच चुके थे। दोषियों को पहरेदारों के आदेश पर नाश्ता मिलने लगा था। कैदी बेतरतीब तरीके से लंबी लाइनों में लगे हुए थे। हर एक के पास टीन का बना एक छोटा पैन था और दो पहरेदार बाल्टियों में चावल लेकर घूम रहे रहे थे। यहां सब कुछ सामान्य दिख रहा था, फांसी के बाद का यह एक सुखद माहौल था। हम सब एक राहत की सांसों से भरे हुए थे- आखिर काम हो गया था। कोई प्रशंसा के गीत गा रहा था, कोई यूं ही भाग रहा था, कोई बेढब तरीके से हंस रहा था। कुल मिला कर सब खुश थे।

एक यूरेशियन लड़का मेरी बगल में खड़ा था और उस रास्ते को देख रहा था जिधर से हम आये थे, उसने एक परिचित मुस्कान के साथ कहा – ‘सर, आप जानते हैं हमारे दोस्त (उसका इशारा मृतक कैदी की तरफ था) ने जब सुना कि उसकी अर्जी खारिज कर दी गयी, उसका वहीं डर के मारे पेशाब निकल गया। क्या आप नए सिगरेट केस से सिगरेट लेना पसंद करेंगे। नया खरीदा है। 2 रुपए और आठ आने में, ठेठ यूरोपियन स्टाइल का…’

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कुछ लोग जोर से हंसे- किस बात पर! यह ठीक से कोई नहीं जानता था।

फ्रांसिस जेल अधीक्षक के साथ टहलते हुए चापलूसीयत भरी अदाओं से बोल रहा था- ‘चलिए सर, सब कुछ अच्छे से निपट गया। एक ही झटके में कैदी खत्म हो गया। यह इतना आसान नहीं होता, मैं ऐसे कई मामलों को जानता हूं, जहां सजा मुकम्मल कराने के लिए डॉक्टर को फांसी के तख्‍ते के नीचे जाना पड़ा, और कैदी के टांगों को खींचना पड़ा है। कितना अपमानजनक है यह।’

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‘हां, यह बुरा है’- जेल अधीक्षक ने तड़पते हुए कहा।

‘सर, यह और भी मुश्किल हो जाता है जब कैदी प्रतिरोध कर रहा हो। मुझे याद है एक आदमी तो अपने सेल की सलाखों से ही चिपक गया था। आपको मुझे शाबाशी देनी चाहिए सर, मुझे इसे भी कैदखाने से निकालने में छह लोगों की दरकार हुई, तीन-तीन लोग दोनों पैरों के लिए।’

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हमने उससे कहा- ‘दोस्त तुम जरा सोचो तुम हमें कितना कष्ट दे रहे हो।’ लेकिन उसके कानों पर जूं तक नहीं रेंगी। ‘वो बहुत शैतान था।’

मुझे जोर की हंसी आ गई। हर कोई हंस रहा था। जेल अधीक्षक ने भी ठहाका लगाया और कहा- ‘अच्छा होगा हम यह सब भूल कर एक-एक जाम लगाएं।’ फ्रांसिस ने तत्परता से कहा ‘मेरी कार में एक विस्की की बोतल पड़ी है, मैं लेकर आता हूं।’

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हम जेल के दोहरे दरवाजों से निकल बाहर सड़क पर आ गए थे। ‘तीन-तीन लोग उन दो पैरों के लिए’ अचानक ही बर्मा के एक मैजिस्ट्रेट ने दुहराया, और हम बहुत जोर से हंस पड़े। हम फिर से हंसने लगे थे। फिर हम सबने साथ बैठ कर जाम सजाया। मृत शरीर हमसे सौ गज की दूरी पर था।

सत्येंद्र प्रकाश चौधरी के एफबी वाल से (अनुवाद : गुंजेश, NBT से साभार)

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