Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

सुख-दुख

अज्ञेय जी पर लिखे मेरे लेख को देखकर प्रभाष जोशी ने माथा पीट लिया, बोले- यह क्या कर डाला!

शंभुनाथ शुक्ला-

कुछ पत्रकार-संपादक भाषा की शुद्धता के अत्यंत कठोर पक्षपाती होते हैं। वे बार-बार टोकते हैं कि यह शब्द यूँ लिखो अथवा वह शब्द ठीक करो। मैं मानता हूँ कि शब्द और वाक्य ऐसे लिखो जो हमें परस्पर कम्युनेट कर सकें। जैसा बोलते हो वैसा लिखो।

मैंने पत्रकारिता की कोई ट्रेनिंग नहीं ली व न ही किसी विवि का मुँह देखा इसलिए मैं आम बोलचाल के शब्दों का प्रयोग धड़ल्ले से करता हूँ। शायद इसलिए भी कि हमारे कानपुर में शुद्ध हिंदी नहीं बोली जाती और ऊपर से वहाँ अपना घर पंजाब से आए शरणार्थी लोगों के बीच था। इसलिए मैंने हिंदी वह सीखी जो वे लोग बोलते थे।

घर पर कन्नौजी-बुंदेली बोली जाती। सो शुद्ध कही जाने वाली हिंदी बोलते भी कहाँ से। स्कूल में हिंदी टेन्थ तक पढ़ी और उसमें संस्कृत थर्ड पेपर था जो व्यवहार में कभी नहीं आई। नतीजा मेरी भाषा खिचड़ी हो गई, जिसमें किसी भी अन्य भाषा का शब्द आए लेकिन क्या फ़र्क़ पड़ता है! खिचड़ी तो पाचक रहेगी ही।

जब मैं संपादक हुआ तब भी अपने रिपोर्टरों की भाषा को लेकर कभी टीका-टिप्पणी नहीं करता था, उनके न्यूज़ सेंस को जाँचता था। इसलिए हिंदी की शुद्धता हिंदी के मास्टरों पर छोड़ दो। वह लिखो, पढ़ो और बोलो जो संवाद बनाए रखे।

हिंदी में प्रभाष जी तक जनसत्ता ख़ूब फला-फूला क्योंकि वे कहते थे- जैसे बोलो वैसे लिखो। फिर इसके बाद वही जनसत्ता ‘टें’ बोल गया। लेकिन एक बात और जोड़ दूँ। एक बार सुप्रसिद्ध साहित्यकार सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन “अज्ञेय” के ७५ साल पूरे होने पर अमृत महोत्सव मनाया जा रहा था। यह आयोजन एक्सप्रेस समूह के मालिक रामनाथ गोयनका कर रहे थे।

प्रभाष जी ने उनका एक लेख मुझे दिया कि मैं इसे एडिट पेज पर लगवा दूँ। मैंने अज्ञेय जी के लेख की भाषा आम लोगों की बोलचाल में कर दी। शुक्र है कि उसे एडिट करने के बाद मैंने उसे प्रभाष जी को दिखा दिया। उन्होंने माथा पीट लिया, बोले यह क्या कर डाला।

तत्काल उन्होंने साहित्य अकादमी के सचिव इंद्रनाथ चौधरी से बात की और उस लेख की दूसरी कॉपी मँगवाई। फिर वही छपी। अज्ञेय को मैंने कभी नहीं पढ़ा क्योंकि मुझे भाषा के लिहाज़ से कभी ‘ज्ञेय’ नहीं लगे।

आप प्रेमचंद या अमृतलाल नागर की भाषा पढ़ें, कहीं भी आप उलझेंगे नहीं मगर अज्ञेय शुरू से ही कोई भारी भरकम आत्माभिमानी लगेंगे। एक बार कमलेश्वर ने बताया था कि वे ख़ुद को अर्नेस्ट हेमिंग्वे समझते थे। इसीलिए अज्ञेय रहे।

कहने का आशय यह कि बड़ा वही जो उस भाषा में लिखे जो ज्ञेय हो।


चाहे जितना बड़ा पत्रकार/संपादक रहा हो, एक समय ऐसा आता है, जब उसे अपने पेशे से अरुचि हो जाती है। दरअसल जब वह शिखर पर होता है तो उसे लगता है कि वह चौथा खंभा है जो चाहे वह कर लेगा। पर ऐसा होता नहीं है।

बाक़ी के तीन खंभे तो सांवैधानिक हैं पर यह चौथा खंभा सिर्फ़ कहने भर को है। जब तक यह चौथा खंभा पब्लिक को मोबलाइज़ नहीं कर पाता, उसकी कोई वैल्यू नहीं। और अब तो वैसे भी इसकी छवि इतनी गिर गई है कि कोई भी अपनी सुविधा से इसे पत्तलकार बोल कर चल देता है। पैसा तो अब इनके पास अपार है पर प्रतिष्ठा शून्य। कभी इस पर किसी ने नहीं सोचा, कि क्या कारण है कि अब यह पेशा सब धान बाईस पसेरी जैसा हो गया है। उसकी निष्पक्ष छवि नष्ट हो गई है।

अब न वह जनवादी रहा है न विचार के प्रति उसका जुड़ाव रह गया है। अब वह किसी न किसी का बस अंडकोष बन कर रह गया है। इसलिए इस पेशे से अरुचि होगी ही।

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन