रियाद, सऊदी अरब। यह तस्वीर महज़ एक औपचारिक अभिवादन नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति की जटिलताओं, अवसरवाद, और परिभाषाओं के बदलते मानकों का एक गहरा प्रतीक बन चुकी है। इसमें अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक ऐसे व्यक्ति से हाथ मिला रहे हैं, जिसे कभी अमेरिका ने “इस्लामिक आतंकवादी” घोषित कर उसके सिर पर 10 बिलियन डॉलर का इनाम रखा था — और आज वही व्यक्ति अहमद अल शारा, सीरिया के राष्ट्रपति बन चुके हैं।
अतीत का ‘आतंकवादी’, वर्तमान का ‘राष्ट्रपति’
अहमद अल शारा का नाम कभी वैश्विक खुफिया एजेंसियों की वांछित सूची में सबसे ऊपर था। सीरिया में सरकार के खिलाफ चल रही लड़ाई के दौरान उन्हें एक कुख्यात इस्लामिक आतंकी के रूप में प्रस्तुत किया गया था। मगर सत्ता का समीकरण बदलते ही उनका परिचय भी बदल गया।
रूस समर्थित बशर अल असद सरकार के पतन के बाद जब नई सत्ता संरचना अस्तित्व में आई, तो अमेरिका और पश्चिमी देशों के लिए “आतंकवादी” अब “लोकतांत्रिक नेता” बन गया। आज वही अहमद अल शारा अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अमेरिका और उसके सहयोगी देशों के साथ हाथ मिला रहे हैं।
शीतल पी सिंह की टिप्पणी:
वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी सिंह इस तस्वीर को साझा करते हुए तीखी टिप्पणी करते हैं:
“अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जिनसे हाथ मिला रहे हैं, उनके सिर पर अमेरिकी सरकार ने दस बिलियन डॉलर का इनाम रखा था। अहमद अल शारा अब सीरिया के राष्ट्रपति हैं और इसके पहले दुनिया के लिए इस्लामिक आतंकवादी थे। सीरिया में रूस समर्थित सरकार के तख़्ता पलट के बाद अब ये पश्चिमी देशों के लिए हीरो हैं!”
तीसरी दुनिया और पश्चिमी धोखाधड़ी का इतिहास
तीसरी दुनिया के देश (विशेषकर एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका) सदियों से पश्चिमी शक्तियों की कूटनीतिक छल-प्रपंच, औपनिवेशिक मानसिकता और मूल्य आधारित राजनीति के दोहरे मानदंडों का शिकार रहे हैं।
- इराक में सद्दाम हुसैन,
- अफगानिस्तान में मुजाहिदीन (जिन्हें पहले अमेरिका ने समर्थन दिया और बाद में तालिबान कहा),
- लीबिया में गद्दाफी,
- और अब सीरिया में अल शारा का यह उदाहरण —
सभी इस बात की मिसाल हैं कि कैसे किसी भी व्यक्ति की छवि को राजनीतिक हितों के अनुसार गढ़ा और मिटाया जा सकता है।
आतंकवाद की परिभाषा भी राजनीतिक है?
जब सवाल यह उठता है कि कौन आतंकवादी है और कौन स्वतंत्रता सेनानी, तो यह परिभाषा स्थायी नहीं, बल्कि राजनीतिक गठबंधनों और सामरिक ज़रूरतों पर आधारित लगती है।
जिसे कल ‘ख़तरा’ बताया गया, उसे आज ‘दोस्त’ और ‘राष्ट्र निर्माता’ घोषित कर दिया जाता है।
इस तस्वीर में छिपा है तीसरी दुनिया का यथार्थ

यह तस्वीर इतिहास की धड़कती हुई नब्ज है। यह सिर्फ एक हैंडशेक नहीं, बल्कि यह दर्शाती है कि विश्व राजनीति में स्थायी न दुश्मन होते हैं, न दोस्त — सिर्फ हित होते हैं।
तीसरी दुनिया के देशों के लिए यह एक सबक है — अपनी नीति, नेतृत्व और दृष्टिकोण को विदेशी चश्मों से नहीं, बल्कि अपने अनुभवों और हितों से तय करें।


