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पत्रकारिता का बदलता वक़्त : कागज पर छपा अख़बार पढ़ने की पुरानी आदत धीरे-धीरे छूटती चली गई!

डॉ रविंद्र राणा-

शनिवार की सुबह लंबे अरसे बाद छपा हुआ अख़बार हाथ में लिया। कई बरसों से घर में टीवी बंद पड़ा है। खबरों का प्राथमिक स्रोत अब ट्विटर जैसे सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म बन चुके हैं। ई-पेपर परचेज किए हुए हैं, लेकिन कागज पर छपा अख़बार पढ़ने की पुरानी आदत धीरे-धीरे छूटती चली गई।

फिर भी, तमाम सवालों, संदेहों और तकनीकी बदलावों के बावजूद मुझे आज भी अख़बार इसलिए ज़्यादा बेहतर लगते हैं क्योंकि उनमें हर तरह की ख़बरों की मिक्सिंग होती है। एक ही जगह पन्ने पर राजनीति, अर्थव्यवस्था, शिक्षा, खेल, संस्कृति, विज्ञान, स्थानीय समाचार सब कुछ देखने को मिल जाता है।

इंटरनेट माध्यमों की सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि वहाँ आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस (AI) पाठकों-दर्शकों की पसंद को ‘एकाकी’ बना देता है। जैसा कंटेंट आपने देखना शुरू किया, वही आपके सामने बार-बार और और गहराई से परोसा जाएगा। नतीजा यह कि पाठक एक ही तरह की सूचनाओं के घेरे में कैद होता चला जाता है।

आज अख़बारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती है – मैनपॉवर का संकट। प्रशिक्षित और अनुभवी रिपोर्टरों की कमी लगातार बढ़ रही है। अच्छे पत्रकार , जिन्हें ख़बर की ‘गंध’ पहचानने और उसे सही संदर्भ में प्रस्तुत करने का अनुभव हो, उनकी संख्या घट रही है।

असल में सबसे बड़ा संकट है वर्क कल्चर का। आज के वर्किंग जर्नलिस्ट ने बदलते मीडिया ढांचे के साथ अपने को एडजस्ट कर लिया है। लेकिन हर समय नौकरी जाने का डर, और प्रयोगधर्मी होने का जोखिम न लेने की प्रवृत्ति, पत्रकारिता को कमजोर कर रही है। रिपोर्टर सुरक्षित दायरे से बाहर निकलने से हिचकते हैं। ख़बरों में प्रयोग, नए कोण और गहराई लाने का साहस घटता जा रहा है।

हमारे समय में यह तस्वीर कुछ और थी। मैंने अपनी आँखों से देखा है कि रिपोर्टर ख़बर के लिए, उसके एंगल के लिए, स्पेस के लिए और ख़बर के निरंतर फॉलो अप के लिए संपादकों से बहस करते, यहाँ तक कि लड़ते थे।

एक ख़बर पर ‘निरंतरता’ बनाए रखना पत्रकारिता की आत्मा थी। लेकिन आज की मीडिया व्यवस्था में यह निरंतरता कमज़ोर पड़ी है। अब ख़बरें पल-पल बदलती रहती हैं और अगले दिन वही ख़बर बासी लगती है। हमने अपने सामने पत्रकारों को नौकरी के ढलते-बदलते स्वरूप में ढलते देखा है। संपादकों में भी जोखिम उठाने की प्रवृत्ति धीरे-धीरे कमज़ोर पड़ी।

आज संपादकीय स्वतंत्रता पर सबसे बड़ा दबाव है – विज्ञापन और नोटिस का। जिस तरह का वातावरण बना है, उसमें संपादक अक्सर उस ख़तरे से बचना चाहते हैं जिसमें किसी बड़े कॉरपोरेट, किसी बड़ी सत्ता या किसी विशेष वर्ग से टकराव हो।

यही कारण है कि रिपोर्टर और संपादक दोनों ही जोखिम से बचते हैं। और जब पत्रकारिता में जोखिम उठाने का साहस कम होता है, तो उसका असर सीधा पाठकों पर पड़ता है। पाठक को वही मिलता है जो ‘सुरक्षित’ है, न कि वह जो असलियत में समाज को जानने-समझने के लिए ज़रूरी है।

कोविड-19 महामारी ने अख़बार उद्योग की कमर तोड़ दी। वितरण नेटवर्क ध्वस्त हुआ, विज्ञापन अचानक बंद हो गए, और कई संस्करण बंद करने पड़े।

Indian Express, Business Standard, The Telegraph, Mail Today और Mumbai Mirror जैसे अख़बारों को अपने कई शहरों के संस्करण बंद करने पड़े या केवल ई-पेपर के रूप में जारी रखना पड़ा। इंडियन न्यूज़पेपर सोसाइटी (INS) के अनुसार सिर्फ पहले आठ महीनों में लगभग ₹1,878 करोड़ का नुकसान हुआ और इसका असर सीधे-सीधे लगभग 30 लाख कर्मचारियों पर पड़ा।

15% से 66% तक वेतन कटौती हुई और 20–30% संपादकीय स्टाफ को निकालना पड़ा। Deccan Chronicle और Asian Age जैसे पुराने अख़बारों ने केरल, मुंबई और कोलकाता जैसे बड़े शहरों से संस्करण बंद कर दिए।

गोवा में Gomantak Times बंद हुआ और कई पत्रकार बेरोज़गार हो गए। यह वही वक़्त था जब हमें पहली बार अहसास हुआ कि पत्रकारिता न सिर्फ विचार और साहस की लड़ाई है, बल्कि आर्थिक अस्तित्व की भी लड़ाई बन चुकी है।

डिजिटल मीडिया ने पत्रकारिता को एक नई रफ्तार दी है। उसकी पहुँच और असर बेमिसाल है। लेकिन इसकी समस्याएँ भी उतनी ही गहरी हैं: फेक न्यूज़ का फैलाव, जो किसी भी समय समाज को गुमराह कर सकता है।

एल्गोरिदम आधारित ‘फ़िल्टर बबल’, जिसमें पाठक केवल वही देखता है जो उसे पसंद है। गहराई का अभाव – डिजिटल स्पेस में खबरें अक्सर सतही स्तर पर छूकर आगे बढ़ जाती हैं।

आज स्थिति यह है कि डिजिटल मीडिया के ‘ट्रेंड’ अख़बारों और टीवी की एजेंडा-सेटिंग को भी प्रभावित करने लगे हैं। भारत अब भी दुनिया का सबसे बड़ा प्रिंट मीडिया बाज़ार है। देश में लगभग 20,000 दैनिक अख़बार और कुल मिलाकर लगभग 70,000 पंजीकृत समाचार पत्र हैं। लेकिन इसके बावजूद प्रेस की स्वतंत्रता का हाल यह है कि भारत प्रेस फ़्रीडम इंडेक्स में 151वें स्थान पर है।

यह आँकड़ा इस बात का संकेत है कि मीडिया का आकार जितना बड़ा है, उतना ही वह दबाव और असुरक्षा से घिरा हुआ भी है। फिर सवाल उठता है कि भविष्य किसका है – अख़बारों का या डिजिटल माध्यमों का?

मेरे अनुभव और अवलोकन में दोनों का भविष्य है, लेकिन उनकी भूमिका अलग-अलग होगी। अख़बार अब भी उस पाठक के लिए ज़रूरी रहेंगे जो संतुलित और मिक्स्ड कंटेंट चाहता है। डिजिटल माध्यम उस पाठक के लिए महत्वपूर्ण रहेंगे जिसे ‘त्वरित सूचना’ चाहिए।

पत्रकारिता के मूल्यों की कसौटी फिर भी अख़बार ही रहेंगे क्योंकि वहाँ संपादन की परंपरा, विविधता और विश्वसनीयता अपेक्षाकृत अधिक है।

पत्रकारिता हमेशा बदलावों से गुज़रती रही है। कभी टेलीप्रिंटर आया, कभी टीवी ने धमक जमाई, और अब डिजिटल मीडिया और एआई का दौर है। लेकिन पत्रकारिता की आत्मा वही है – समाज को सत्य, विविधता और निरंतरता के साथ सूचित करना।

आज ज़रूरत इस बात की है कि अख़बार और डिजिटल दोनों ही माध्यम अपने-अपने ढंग से पत्रकारिता की इस आत्मा को बचाए रखें। पत्रकारिता तब ही मज़बूत होगी जब रिपोर्टर और संपादक दोनों जोखिम उठाने का साहस दिखाएँगे, और पाठक सिर्फ ‘मनोरंजन’ नहीं बल्कि असल ‘सूचना’ पाने पर जोर देंगे।

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