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अख़बार तो ग़ायब होने लगे गुरुजी!

रवि एस श्रीवास्तव-

एक बदलाव जो हमारे आंखों के सामने से गुजर गया अभी मैं दिल्ली से मंगलौर करीब 30 घंटे ट्रेन की यात्रा की कोटा रतलाम बड़ौदा सुरत पनवेल मडगांव जैसे शहर आये.

यहां तक दिल्ली जहां से ट्रेन चली एक भी अखबार वाला नहीं आया ना ही ट्रेन में कोई अखबार पढ़ते दिखा जबकि ट्रेन यात्राओं में मैं खुद चार पांच अखबार खरीदता था.

अखबार धीरे धीरे विलुप्त प्रजाति हो जा रही है रविवार को गोमतीनगर में जब अखबार खरीदने निकलता हूं तो अब अखबार नहीं मिलता. अब हाकर संभवतः एक्स्ट्रा कॉपी लेकर नहीं चलते.

पहले हुसड़िया और पत्रकार पर मिल जाते थे. अब नीलकंठ के पास एक गुमटी बची है, देखते हैं कब तक अखबार की उपलब्धता रहती है.

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