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मोदी सरकार ने अख़बारों की विज्ञापन दरों में 26% वृद्धि की है, उम्मीद है यहां काम कर रहे पत्रकारों की सैलरी भी बढ़ेगी!

रवीश कुमार-

मोदी सरकार ने अख़बारों के विज्ञापन की दरों में 26 प्रतिशत की वृद्धि की है। यह आप जनता का पैसा है। जनता को पता नहीं कि किसी अख़बार को विज्ञापन देने और नहीं देने का फार्मूला क्या है। उम्मीद है इन अख़बारों में काम कर रहे पत्रकारों की सैलरी भी कुछ बढ़ेगी। हम यह भी नहीं जानते कि एक अखबार के राजस्व में सरकार, बाज़ार और सब्सक्रिप्शन का कितना हिस्सा है। सब्सक्रिप्शन का मॉडल कितना बड़ा है?

सरकार अपने पैसे से इन अख़बारों को बचा रही है और ये सरकार को। एक दो अख़बार भी नहीं हैं जिनमें ढंग की ख़बर और विश्लेषण छपते हों। दस अख़बार पलट जाइये तो तीन चार ख़बरें मिलती हैं। हिन्दी के अख़बारों की हालत किसी से छिपी नहीं है।

सारा ज़ोर शान बघारने पर है और चुनाव में कौन जीतेगा इसे पहले बता देने पर है। बाकी ख़बर और पत्रकारिता का स्तर ज़ीरो है। जनता के पैसे से ये अख़बार चल रहे हैं अपनी ख़बरों के भरोसे नहीं।

इन सबके बीच हम लोग हैं। कोई सपोर्ट नहीं है। कब विलुप्त हो जाएँगे पता नहीं। यह बहुत बड़ी बात है कि इसी दौर में द वायर, स्क्रोल और न्यूज़लौंड्री ने यहां तक का सफर तय किया है। बिना सरकार की मदद के तौर पर। अगर इन्हें विज्ञापन का सपोर्ट मिलता तो आज ये बड़े संस्थान होते।

क्या कोई भी अख़बार बिना सरकार के विज्ञापन के दम पर अपनी साख के भरोसे चल कर दिखा सकता है? उसे ठीक से पता है कि पाठकों में उसके प्रति कोई विश्वास नहीं है। उसके पाठक पैसा नहीं देंगे और अगर सरकार नहीं देगी तो अखबार बंद हो जाएंगे।

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