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अखबारों की हिंदी का क्या रोना?

अजय राय-

मुझसे पहली सी मुहब्बत मेरे महबूब न मांग.. सूनसान सड़कें और दो-तीन नोटों की माला, खौफ से बेखौफ होना। सुबह अखबार में ऐसी इबारतें पढ़कर मन खट्टा होता है। इसलिए भी अटपटा लगता है कि ये पंक्तियां संपादक की हैं (यह जिम्मा वह दूसरे अखबार में सम्हल रही हैं) और किसी संपादक ने इसको सम्पादित किया होगा। यह स्थिति तब है जब अखबार के बड़े संपादक (सलाहकार) वर्तनी दुरुस्त और मानक बनाने का मेल (धमकियां) भेजते रहते हैं, और ऐसे मेल की वर्तनी भी माशाल्लाह ही होती है, वैसी ही जैसी दीये की रोशनी में विद्युतीकरण की खबर पढ़ना।

अखबारों की हिंदी का क्या रोना। वहां संपादक भाषा और वर्तनी को विद्वता का पर्याय साबित करने में लगे हैं। अंग्रेजी शब्दों के इस्तेमाल पर उप-संपादकों को चेतावनी जारी करने वाले संपादकों की भाषा की बानगी देखिए. देश के गृह मंत्री ने देश की संसद में जो बात कही, उसी सीक्वेंस में चीजें आगे बढ़ रही हैं. आजादी का सेंटीमेंट नहींय. डेवलपमेंट में कनेक्टिविटी का बड़ा रोल है।

हिंदी दिवस पर इस बार कई जगह भाषा और वर्तनी पर विमर्श सुनने को मिला। हिंदी जगत वर्तनी की अशुद्धियों को लेकर बेहद चिंतित है। आज लोग हिंग्लिस की पैड से टाइप करते हैं और मशीन के शब्दकोश के भरोसे शब्द सुधार लेते हैं।

एआई (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) के दौर में औसत यांत्रिक गद्य और कविता लिखना आसान हो गया है। बीएचयू के प्रो रामाज्ञा शशिधर ने एआई से कविता लेखन प्रतियोगिता कराई थी। उनका कहना है कि इससे संवेदना विहीन औसत कविता ही रची जा सकती है।

हिंदी में अखबार औसत दर्जे की भावहीन भाषा भी नहीं लिख पा रहे हैं। हिंदी अखबारों ने परीक्षा लेकर भाषाहीन और विचारहीन जमात तैयार की है और उनकी भाषा सुधारने के लिए दो टकिया समीक्षक तैनात किए हैं। और संपादकों की एक जमात भाषा के अखाड़े में भैंसे की तरह सींग भिड़ाये हुए हैं। उनको कौन समझाए कि भाषा भाव की संवाहक होती है और वह मशीनी नहीं होती।

अब जबकि सारे शब्द और प्रतिमान मशीनों में ठूंस दिए गए हैं तो चांद सा मुखड़ा जैसे प्रतीक क्लिक में हाजिर हो जाएंगे और वह भी शीन-काफ दुरुस्त।

बनारस के उदय प्रताप कॉलेज के हिंदी विभाग की गोष्ठी में डॉ विवेक सिंह ने एक बड़ी सटीक बात कही कि भाषा व्याकरण से आगे चलती है। पाणिनि ने जब संस्कृत के व्याकरण की रचना की तब तक प्राकृत का व्यवहार जनता में होने लगा था। प्राकृत और पालि में साहित्य रचना होने लगी थी। इनका मानक व्याकरण बना तब तक अपभ्रंष का युग आ गया। इस तरह हम हिंदी तक पहुंचे हैं।

आज फिर व्याकरण का घटाटोप भाषा को ढकने लगा है। मशीन में ठुंसा हुआ व्याकरण आज साहित्य के सामने चुनौती बन कर खड़ा है। पर भूलना नहीं चाहिए कि मशीन में सारा व्याकरण मनुष्य में भरे हैं। भाषा का विकास होगा तो यह व्याकरण बौना हो जाएगा।

भाषा का विकास साहित्य से होता है। साहित्य जीवन से रचा जाता है और जीवन मशीनी नहीं होता। वह मशीन के झांसे में तो आ सकता है, उसका गिरफ्तार नहीं हो सकता। बकौल फैज…

अनगिनत सदियों से तारीक बाहीमाना तिलिस्म
रेशमो-अलतसो-किमख्वाब में बुनवाये हुए।

(अनगिनत सदियों के काले तिलिस्म जो रेशम और सतरंगी ज़री में बुने हुए हैं ) ये महंगे कपड़े भाषा के ताने-बाने को चाहे जितना हसीन बना दें, या तो ऐश्वर्य का आतंक पैदा करते है या फिर धराऊ जोड़े की तरह आले की शोभा होते हैं।

समय का जीवन सौंदर्य तो हर दफा नया प्रतीक लेकर आता है. भाषा भाव सृजित नहीं करती भाव अपने लिए भाषा का वस्त्र बुन लेता है, संपादकों को इसको निखारने के लिए लगाना होगा वरना वे मजदूरी भले कमा लें मशीन को तो हरा न पाएंगे। नए प्रतीकों और उपमानों के बगैर तो प्रेम भी बासी और उबासी भरा हो जाता है..इस बात को अज्ञेय ने बीसवीं सदी में ही समझ लिया था…बाजरे की कलगी का उदाहरण द्रष्टव्य है-

हरी बिछली घास।
दोलती कलगी छरहरी बाजरे की।
अगर मैं तुमको ललाती साँझ के नभ की अकेली तारिका
अब नहीं कहता,
या शरद के भोर की नीहार-न्हायी कुँई,
टटकी कली चंपे की, वग़ैरह, तो
नहीं कारण कि मेरा हृदय उथला या कि सूना है
या कि मेरा प्यार मैला है।
बल्कि केवल यही : ये उपमान मैले हो गए हैं।
देवता इन प्रतीकों के कर गए हैं कूच।

जीवन के 30 साल पत्रकारिता को देने वाले अजय राय करीब 25 साल अमर उजाला से जुड़े रहे हैं।

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