अमर उजाला अपना अमृत महोत्सव मना रहा है, उसके दो निर्दोष पत्रकार जेल में हैं!

अमर उजाला अख़बार पौध से वटवृक्ष बन गया। इस शानदार सफ़रनामा को आज टीम अमर उजाला सेलीब्रेट कर रही है। लेकिन सच्चाई ये है कि पचहत्तर सालों के सफ़र में आज अमर उजाला रंगीन उजला साफ़ सुथरा चिकना सुंदर सजीला तो हुआ है पर उसके तेवर ख़त्म हो गए हैं।

अमर उजाला के दो निर्दोष पत्रकार कई दिनों से जेल में बंद हैं। अमर उजाला उन्हें अब तक बाहर निकलवाने और दोषी अफ़सरों को दंडित कराने में नाकाम रहा है। तो पचहत्तर साल का निचोड़ ये है कि अमर उजाला नख दंत विहीन हो चुका है। ये अपनी रीढ़ ख़त्म कर चुका है। ये एक सामान्य कारोबारी प्रोडक्ट बन गया है जिसका छपना न छपना दोनों अब जनता के लिए पाठक के लिए कोई ख़ास ज़रूरी नहीं है।

अमृत उत्सव मना रहे अमर उजाला के मालिकों, मैनेजरों, संपादकों को एक बार जेल में बंद अपने निर्दोष पत्रकारों के चेहरे को ज़रूर याद कर लेना चाहिए। इन पत्रकारों के परिजनों को जीवन यापन के लिए, हिम्मत बंधाने के लिए अमर उजाला ने क्या किया, कोई संपादक जाकर मिला, किसी मैनेजर ने मदद राशि पहुँचाई… इस बारे में ज़रूर बताना चाहिए, खबर फ़ोटो छापकर ताकि पाठक भी कह सकें कि अमृत महोत्सव मना रहे अमर उजाला में अभी सरोकार व रीढ़ बाक़ी है!



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