Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

सियासत

भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू की फांसी पर डॉ आंबेडकर ने मराठी अखबार में क्या लिखा था? पढ़ें

मनोज अभिज्ञान-

अपने मराठी पाक्षिक अखबार ‘जनता’ में 13 अप्रैल 1931 को लिखे संपादकीय में डॉ. आंबेडकर भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव की फांसी को बलिदान के रूप में रेखांकित करते हैं और अपने संपादकीय को ‘तीन बलिदान’ शीर्षक देते हैं। संपादकीय का निष्कर्ष ये है कि ये तीनों व्यक्तित्व ब्रिटेन की आंतरिक राजनीति के शिकार बने। इसी कारण से वे कहते हैं कि यह न्याय नहीं था, बल्कि अन्याय हुआ।

संपादकीय में डॉ. आंबेडकर लिखते हैं:

“अगर सरकार को यह उम्मीद हो कि इस घटना से ‘अंग्रेजी सरकार बिल्कुल न्यायप्रिय है या न्यायपालिका के आदेश पर हुबहू अमल करती है’ ऐसी समझदारी लोगों के बीच मजबूत होगी और लोग उसका समर्थन करेंगे तो यह सरकार की नादानी है, क्योंकि इस बात पर किसी को भी यकीन नहीं है कि यह बलिदान ब्रिटिश न्याय देवता की शोहरत को अधिक उज्ज्वल और पारदर्शी बनाने के इरादे से किया गया है। खुद सरकार भी इस समझदारी के आधार पर अपने आप को सन्तुष्ट नहीं कर सकती है। फिर बाकियों को भी इसी न्यायप्रियता के आवरण में वह किस तरह सन्तुष्ट कर सकती है? न्याय देवता की भक्ति के तौर पर नहीं बल्कि विलायत के कन्जर्वेटिव/राजनीतिक रूढिवादी/पार्टी और जनमत के डर से इस बलिदान को अंजाम दिया गया है, इस बात को सरकार के साथ दुनिया भी जानती है।

‘हमारी जान बख्श दें’ ऐसी दया की अपील इन तीनों में से किसी ने भी नहीं की थी। हां, फांसी की सूली पर चढ़ाने के बजाए हमें गोलियों से उड़ा दिया जाए, ऐसी इच्छा भगत सिंह ने प्रगट की थी, ऐसी ख़बरें अवश्य आई हैं। मगर उनकी इस आखिरी इच्छा का भी सम्मान नहीं किया गया।

कुल मिलाकर यही कि जनमत की परवाह किए बगैर, गांधी-इर्विन समझौते का क्या होगा, इसकी चिन्ता किए बिना विलायत के कंजर्वेटिव के गुस्से का शिकार होने से अपने आप को बचाने के लिए, भगत सिंह आदि की बलि चढ़ायी गई। यह बात अब छिप नहीं सकेगी, यह बात सरकार को पक्के तौर पर मान लेनी चाहिए।”

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन